यूपी सीलिंग एक्ट के तहत निर्धारित प्राधिकारी सिविल कोर्ट नहीं, उसके आदेश को अनुच्छेद 226 के तहत दी जा सकती है चुनौती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
27 Oct 2026 11:59 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश जोत सीमा आरोपण अधिनियम, 1960 के तहत निर्धारित प्राधिकारी सिविल कोर्ट नहीं है। इसलिए उसके आदेश को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करके चुनौती दी जा सकती है।
जस्टिस सैयद कमर हसन रिजवी ने कहा कि अधिनियम की धारा 37 के तहत निर्धारित प्राधिकारी को सिविल कोर्ट की कुछ शक्तियां और विशेषाधिकार दिए जाने का मतलब यह नहीं है कि उसे सिविल कोर्ट का दर्जा मिल जाता है। इन शक्तियों का इस्तेमाल केवल निर्धारित सीमा से अधिक जमीन का निर्धारण करने के लिए किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि सिविल कोर्ट के आदेशों को सामान्यतः संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत चुनौती दी जाती है, जबकि ऐसे वैधानिक और अर्ध-न्यायिक प्राधिकारियों के आदेश, जो सिविल कोर्ट नहीं हैं, अनुच्छेद 226 के तहत चुनौती योग्य हैं।
यह फैसला सईदा फातिमा अशरफ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 10 अन्य मामले में आया। याचिका में 13 अक्टूबर 2025 को निर्धारित प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें जमीन को निर्धारित सीमा से अधिक घोषित किया गया।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार विवादित जमीन चौधरी रशीदुद्दीन अशरफ की थी। वर्ष 1939 में उनकी मृत्यु के बाद उनके चार बेटों को पंजीकृत वसीयत के आधार पर जमीन मिली और राजस्व अभिलेखों में उन्हें खातेदार के रूप में दर्ज किया गया। इसके बावजूद, सीलिंग की कार्यवाही में चारों भाइयों की जमीन को बड़े बेटे चौधरी अजीमुद्दीन अशरफ की एक ही जोत मानकर शामिल कर लिया गया।
याचिकाकर्ता के पिता चौधरी इमादुद्दीन अशरफ को वर्ष 1974 में नोटिस जारी किया गया, जबकि उनकी मृत्यु 1973 में हो चुकी थी। वर्ष 1981 में मृत व्यक्ति के नाम पर जारी नोटिस वापस लेते हुए उनके वारिसों के खिलाफ कार्यवाही करने का निर्देश दिया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि इसके बाद उन्हें कभी नया नोटिस जारी नहीं किया गया।
वर्ष 2003 में निर्धारित प्राधिकारी ने कुल 85-3-3 भूमि में से 56-5-19 भूमि को निर्धारित सीमा से अधिक घोषित कर दिया और पूरी जमीन को अजीमुद्दीन की जोत मान लिया। अपीलीय प्राधिकारी ने 29 नवंबर 2003 को इस आदेश को रद्द करते हुए मामला वापस भेज दिया। उसने निर्देश दिया कि सभी सह-खातेदारों के हिस्से अलग-अलग निर्धारित किए जाएं और नगरपालिका सीमा के भीतर आने वाली जमीन को कार्यवाही से बाहर रखा जाए।
इसके बावजूद 18 अगस्त 2011 को पारित नए आदेश में फिर अजीमुद्दीन को एकमात्र खातेदार मानकर कार्यवाही की गई। बाद में जमीन का कुछ हिस्सा खरीदने वाले लोगों की अपील 5 अक्टूबर 2018 को स्वीकार कर ली गई और उनके द्वारा खरीदी गई जमीन को सीलिंग कार्यवाही से बाहर कर दिया गया।
याचिकाकर्ता की अपील भी 4 अप्रैल 2025 को स्वीकार की गई और मामला दूसरी बार निर्धारित प्राधिकारी को वापस भेजा गया। इस बार निर्देश दिया गया कि प्रत्येक वारिस की जोत की सीमा अलग-अलग निर्धारित की जाए, अधिनियम लागू होने से पहले बेची गई जमीन तथा नगरपालिका सीमा के भीतर की जमीन को बाहर रखा जाए और निर्धारित सीमा से अधिक जमीन रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अलग नोटिस जारी किया जाए। हालांकि, निर्धारित प्राधिकारी ने 13 अक्टूबर 2025 को फिर जमीन को सीमा से अधिक घोषित कर दिया।
राज्य सरकार और प्रतिवादी संख्या चार ने हाईकोर्ट में प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए कहा कि सीलिंग अधिनियम की धारा 13 के तहत अपील का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है। उनका यह भी कहना था कि एक अन्य प्रभावित पक्ष पहले ही अपील दायर कर चुका है, जो लंबित है। राधेश्याम बनाम छबी नाथ और रोमिल जैन बनाम अशोक कुमार जैन के फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि निर्धारित प्राधिकारी सिविल कोर्ट की तरह आदेश पारित करता है इसलिए उसके आदेश को अनुच्छेद 226 के बजाय अनुच्छेद 227 के तहत चुनौती दी जानी चाहिए।
इसके विपरीत याचिकाकर्ता ने दलील दी कि वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने मात्र से हाईकोर्ट का रिट अधिकार क्षेत्र समाप्त नहीं हो जाता। किसी दूसरे पक्ष की अपील लंबित होने के कारण याचिकाकर्ता को अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल करने से नहीं रोका जा सकता। यह भी कहा गया कि अधिनियम की धारा 12 निर्धारित प्राधिकारी को केवल सीमा से अधिक जमीन तय करने का अधिकार देती है, न कि संपत्ति पर अधिकार स्वामित्व या हित का अंतिम निर्णय करने का।
जस्टिस रिजवी ने कहा कि सीलिंग अधिनियम की योजना और उद्देश्य निर्धारित प्राधिकारी को संपत्ति के अधिकार, स्वामित्व या हित का फैसला करने की शक्ति नहीं देते। उसका काम राजस्व अभिलेखों के आधार पर अनुमत सीमा से अधिक जमीन की पहचान करना है। अदालत ने माना कि प्रतिवादी की आपत्ति पहली नजर में आकर्षक लग सकती है लेकिन कानूनन स्वीकार्य नहीं है।
वैकल्पिक उपाय के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि हर मामले में याचिकाकर्ता को केवल इस आधार पर वैधानिक अपील में जाने के लिए नहीं कहा जा सकता कि ऐसा उपाय उपलब्ध है। जहां प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ हो आदेश अधिकार क्षेत्र के बिना पारित किया गया हो या अपील में भेजने से शिकायत की गई अन्यायपूर्ण स्थिति ही बनी रहने की आशंका हो, वहां हाईकोर्ट अपने रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कर सकता है।
विवादित आदेश की समीक्षा करते हुए अदालत ने पाया कि निर्धारित प्राधिकारी ने मामले को वापस भेजते समय दिए गए निर्देशों को अपने आदेश में दोहराया, लेकिन वास्तव में उनका पालन नहीं किया। उसने पहले के आदेशों को दोहराते हुए चारों भाइयों की जमीन के हिस्से अलग-अलग निर्धारित नहीं किए और शहरी क्षेत्र के भीतर आने वाली जमीन को भी अलग नहीं किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि अधिनियम लागू होने से पहले चारों भाई वयस्क और स्वतंत्र खातेदार थे तथा राजस्व अभिलेखों में अलग-अलग दर्ज थे। इसलिए उनके खिलाफ अलग-अलग कार्यवाही करना आवश्यक था। अपीलीय प्राधिकारी ने हिस्सों को अलग करने की शर्त को सही रूप से अनिवार्य माना था।
अदालत ने कहा कि वापस भेजे गए मामले में निर्धारित निर्देशों का पालन न करने से कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग हुआ पुनर्विचार संबंधी आदेश का गंभीर उल्लंघन हुआ और न्यायिक अनुशासन की अवहेलना हुई।
के.पी. द्विवेदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जिस प्राधिकारी को कोई मामला पुनर्विचार के लिए वापस भेजा जाता है उसे उस आदेश में निर्धारित सीमाओं के भीतर ही काम करना चाहिए। प्राकृतिक न्याय का अर्थ केवल सुनवाई का अवसर देना नहीं है, बल्कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना भी है।
अदालत ने कहा कि सीलिंग अधिनियम की प्रकृति ऐसी है जिसके तहत जमीन राज्य के अधिकार में जा सकती है। इसलिए अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन अनिवार्य है। निर्धारित सीमा से अधिक जमीन राज्य द्वारा अपने कब्जे में ली जा सकती है लेकिन इससे पहले कानून के अनुसार आवश्यक विवरण तैयार करना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को फिर से अपील में भेजने से मामला दोबारा निर्धारित प्राधिकारी के पास लौट सकता है और अनावश्यक देरी होगी। खातेदारों को और मुकदमेबाजी में उलझाना न्याय के हित में नहीं होगा।
इन सभी कारणों से हाईकोर्ट ने 13 अक्टूबर 2025 का विवादित आदेश रद्द कर दिया और मामले को कानून के अनुसार नए सिरे से निर्णय लेने के लिए निर्धारित प्राधिकारी के पास वापस भेज दिया। प्राधिकारी को निर्देश दिया गया कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तारीख से छह महीने के भीतर, यथासंभव, मामले का निस्तारण करे।
अदालत ने रिट याचिका स्वीकार की।

