पुलिस मुठभेड़ की कहानी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट को संदेह, CBI जांच के आदेश
Amir Ahmad
25 Aug 2026 5:04 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक कथित पुलिस मुठभेड़ की कहानी पर गंभीर सवाल उठाते हुए मामले की जांच CBI को सौंपने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने पुलिस मुठभेड़ों में सामने आने वाले उस कथित पैटर्न पर भी सवाल उठाया जिसमें पुलिसकर्मी अक्सर बिना घायल हुए बच निकलते हैं और पुलिस की गोली आरोपी के घुटने या उससे नीचे जाकर लगती है।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने आरोपी की ओर से दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस के दावे पर प्रथम दृष्टया गंभीर संदेह जताया। आरोपी पर हत्या के प्रयास और शस्त्र अधिनियम समेत अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। उसने निचली अदालत द्वारा आरोपमुक्त किए जाने से इनकार के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
कोर्ट ने कहा,
"दिन-प्रतिदिन ऐसा देखने को मिलता है कि जब भी पुलिस किसी व्यक्ति को पकड़ती है तो अक्सर एक और FIR दर्ज हो जाती है जिसमें आरोप होता है कि गिरफ्तारी के समय आरोपी ने पुलिस टीम पर अंधाधुंध गोलीबारी की। आमतौर पर पुलिसकर्मियों की वर्दी तक को एक गोली नहीं छूती और सभी सुरक्षित बच जाते हैं। पुलिस एक गोली चलाती है और वह आरोपी के घुटने या उससे नीचे लगती है।"
अभियोजन के अनुसार पुलिस की एक टीम दुष्कर्म के मामले में आरोपी की तलाश कर रही थी। आरोपी के नेपाल भागने की कोशिश करने की सूचना के बाद 13 पुलिसकर्मी एक सरकारी वाहन से उसकी तलाश में निकले थे। बाद में 10 सदस्यों वाली स्वाट टीम भी अभियान में शामिल हो गई, जिससे मौके पर शामिल पुलिसकर्मियों की संख्या 23 हो गई।
FIR में आरोप लगाया गया कि आरोपी ई-रिक्शा से मौके पर पहुंचा और भागने की कोशिश करते हुए पुलिस टीम पर गोली चला दी। इसके बाद थाना प्रभारी ने आत्मरक्षा में दो गोलियां चलाईं जो आरोपी के दोनों पैरों में लगीं।
हाईकोर्ट ने इस घटनाक्रम को प्रथम दृष्टया स्वीकार करना कठिन बताया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में सवार थे तो यह तभी संभव लगता है, जब उनमें से आधे वाहन की छत पर बैठे हों।
कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि 10 सदस्यीय स्वाट टीम और 13 अन्य पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद ई-रिक्शा से जा रहे एक व्यक्ति को पुलिस रोक नहीं सकी।
FIR में किसी अन्य वाहन का भी उल्लेख नहीं था जबकि पुलिस का दावा था कि अलग-अलग टीमों में बंटने के बाद सभी पुलिसकर्मी कथित मुठभेड़ स्थल पर फिर एकत्र हुए। हाईकोर्ट ने कहा कि यह तथ्य भी पुलिस की कहानी पर गंभीर संदेह पैदा करता है।
कोर्ट ने थाना प्रभारी द्वारा आरोपी पर गोली चलाने की परिस्थितियों की भी जांच की। थाना प्रभारी ने व्यक्तिगत रूप से कोर्ट के सामने बताया कि उसने करीब 15 मीटर की दूरी से चांदनी रात में गोली चलाई थी।
कोर्ट ने इस बयान की तुलना मेडिकल रिपोर्ट से की जिसमें घाव अपेक्षाकृत छोटे बताए गए। थाना प्रभारी ने इसका कारण बताते हुए कहा कि 9 एमएम की गोली का अगला हिस्सा पतला होता है, इसलिए घाव छोटा हो सकता है।
हाईकोर्ट इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ। कोर्ट ने थाना प्रभारी की निशानेबाजी क्षमता का आकलन कराने का निर्देश दिया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या वह रात में करीब 15 मीटर की दूरी से केवल हथियार लोड किए जाने की आवाज सुनकर 9 एमएम की सर्विस पिस्तौल से सटीक निशाना लगा सकता था।
कोर्ट ने पुलिस मुठभेड़ के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम महाराष्ट्र राज्य में दिए गए दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया। इन दिशा-निर्देशों में स्वतंत्र जांच, फोरेंसिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने और पुलिसकर्मियों के आचरण की जांच पूरी होने से पहले तत्काल वीरता पुरस्कार देने पर रोक जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।
हाईकोर्ट ने पाया कि प्रथम दृष्टया इन अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मामले की स्वतंत्र एजेंसी से विस्तृत जांच जरूरी है।
इसके बाद कोर्ट ने CBI को FIR में दर्ज घटनाक्रम की सत्यता की जांच करने और तीन महीने के भीतर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। साथ ही आरोपी को आरोपमुक्त करने से इनकार करने वाले निचली अदालत के आदेश पर फिलहाल रोक लगाई गई।
राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया।
मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी।


