बुजुर्ग पिता की देखभाल करने भर से बेटे पर अनुचित प्रभाव का आरोप नहीं, वसीयत रद्द नहीं कर सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
13 Oct 2026 11:38 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि केवल इस आधार पर किसी वसीयत को रद्द नहीं किया जा सकता कि वसीयत करने वाला व्यक्ति अधिक उम्र का था और उसके पक्ष में वसीयत पाने वाला बेटा उसकी देखभाल करता था तथा उसकी संपत्ति का प्रबंधन संभालता था। पिता-पुत्र का रिश्ता और पिता की वृद्धावस्था अपने आप यह साबित नहीं करते कि बेटे ने अपने प्रभाव का अनुचित इस्तेमाल किया।
जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने कहा कि अनुचित प्रभाव का निर्धारण प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल पिता के बुजुर्ग होने और बेटे के साथ रहने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बेटा पिता की इच्छा को नियंत्रित करने की स्थिति में था।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वसीयत में अनुचित प्रभाव का आरोप लगाने वाले व्यक्ति को इसे साबित करना होता है। किसी व्यक्ति के पास दूसरे को प्रभावित करने की क्षमता होना और वास्तव में उस पर अनुचित प्रभाव डालना दो अलग-अलग बातें हैं।
अदालत ने सावित्री एवं अन्य बनाम कार्त्यायनी अम्मा एवं अन्य और स्वर्णलता एवं अन्य बनाम कलावती एवं अन्य के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि वसीयत का उद्देश्य सामान्य उत्तराधिकार के क्रम से अलग संपत्ति का बंटवारा करना होता है। इसलिए किसी स्वाभाविक उत्तराधिकारी को संपत्ति से वंचित कर देना अपने आप में वसीयत को संदिग्ध मानने का आधार नहीं है।
अदालत ने कहा कि यह तय करना न्यायालय का काम नहीं है कि वसीयत करने वाले व्यक्ति ने अपनी संपत्ति का उचित या अनुचित बंटवारा किया। किसी व्यक्ति को अपनी संपत्ति अपनी इच्छा के अनुसार बांटने का अधिकार है, बशर्ते वसीयत कानून की आवश्यक शर्तों को पूरा करती हो।
अदालत ने पारिवारिक संबंधों के संदर्भ में कहा कि भारतीय समाज में माता-पिता और बच्चों के बीच देखभाल तथा सम्मान की परंपरा रही है। ऐसे में केवल पिता-पुत्र के रिश्ते और पिता की अधिक उम्र के आधार पर यह मान लेना उचित नहीं कि बेटे ने अनुचित प्रभाव डालकर वसीयत कराई।
यह मामला भानु दत्त पाठक की ओर से दायर मुकदमे से जुड़ा था। उन्होंने अपने दादा शंकर दत्त पाठक की छह दिसंबर 1971 को उनके बेटे हरि दत्त पाठक के पक्ष में बनाई गई वसीयत रद्द करने और संपत्ति में अपना आधा हिस्सा दिलाने की मांग की थी।
शंकर दत्त पाठक की मृत्यु वसीयत बनाने के करीब छह महीने बाद छह मई 1972 को हुई थी। मुकदमा दायर किए जाने के समय भानु दत्त पाठक केंद्र सरकार में कार्यरत थे और लखनऊ स्थित केंद्रीय भूजल बोर्ड में निदेशक थे। वह गांव से दूर रहते थे। उन्हें वसीयत की जानकारी तब हुई, जब हरि दत्त पाठक ने उसके आधार पर संपत्ति में नामांतरण कराने के लिए आवेदन किया।
वादी का कहना था कि उसके दादा वर्ष 1949 से मृत्यु तक उसे नियमित रूप से पत्र लिखते थे और उससे छोटी-छोटी धनराशि भी स्वीकार करते थे। दोनों के बीच संबंध अच्छे थे। वादी ने आरोप लगाया कि वृद्धावस्था में दादा कमजोर हो गए और प्रतिवादी उन पर निर्भरता का फायदा उठाते थे।
उसने यह भी तर्क दिया कि वसीयत में उसे संपत्ति से वंचित करने का कोई उचित कारण नहीं बताया गया। वसीयत में उसके द्वारा दादा की देखभाल नहीं करने और घर पर ध्यान नहीं देने संबंधी उल्लेख को उसने दबाव का परिणाम बताया। उसने आरोप लगाया कि वसीयत गवाहों, दस्तावेज लेखक और उप-पंजीयक की मिलीभगत से धोखाधड़ी करके तैयार कराई गई। हालांकि, सुनवाई के दौरान वसीयत पर दादा के हस्ताक्षर को लेकर उठाई गई आपत्ति छोड़ दी गई।
प्रतिवादियों की ओर से कहा गया कि शंकर दत्त पाठक ने भानु दत्त पाठक की शिक्षा का खर्च उठाया और उन्हें उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका भी भेजा था। लेकिन वर्ष 1949 में सरकारी नौकरी मिलने के बाद वादी परिवार से अलग रहने लगा था। प्रतिवादियों के अनुसार, वादी ने अपनी मां की भी देखभाल नहीं की, जो प्रतिवादियों के साथ रहती थीं और जिनकी मृत्यु गांव में हुई।
बचाव पक्ष ने कहा कि वसीयत शंकर दत्त पाठक ने स्वयं पढ़ी थी, दो गवाहों के सामने उस पर हस्ताक्षर किए थे और उसे विधिवत पंजीकृत कराया था। वसीयत को छिपाकर नहीं रखा गया।
मूल मुकदमे की सुनवाई करने वाली अदालत ने वसीयत रद्द की थी। उसका मानना था कि वसीयत बनाते समय शंकर दत्त पाठक की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी और हरि दत्त पाठक ने अनुचित प्रभाव डालकर वसीयत कराई। ट्रायल कोर्ट ने इस बात को भी संदेह का आधार माना कि वसीयत के गवाह गांव के निवासी नहीं थे, दस्तावेज को वसीयतकर्ता को पढ़कर सुनाए जाने का प्रमाण नहीं था और पिता-पुत्र के बीच भरोसे का संबंध था।
हालांकि, प्रथम अपीलीय अदालत ने इस फैसले को पलट दिया। उसने कहा कि वसीयत बनाने के बाद शंकर दत्त पाठक करीब छह महीने तक जीवित रहे और इस दौरान उन्होंने पत्र भी लिखे। अदालत ने यह भी माना कि उनकी देखभाल प्रतिवादी कर रहे थे और केवल अनुमान के आधार पर पंजीकृत वसीयत रद्द नहीं की जा सकती।
इसके बाद मामला दूसरी अपील में हाईकोर्ट पहुंचा, जिसे वर्ष 1980 में कानून के चार महत्वपूर्ण प्रश्नों पर सुनवाई के लिए स्वीकार किया गया।
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 63 का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वसीयत के लिए दो या अधिक गवाहों का सत्यापन आवश्यक है। कानून यह अनिवार्य नहीं करता कि गवाह वसीयतकर्ता के गांव के ही हों या उसके रिश्तेदार अथवा संपत्ति में हिस्सेदार हों।
अदालत ने पाया कि दस्तावेज लेखक ने भी सत्यापन करने वाले गवाहों के कॉलम में हस्ताक्षर किए। उसने गवाही दी कि शंकर दत्त पाठक ने वसीयत स्वयं पढ़ी, उसके सामने उस पर हस्ताक्षर किए और फिर उसे सत्यापित करने के लिए कहा। दूसरे गवाह ने भी उसकी मौजूदगी में हस्ताक्षर किए थे। दस्तावेज लेखक वसीयतकर्ता के साथ उप-पंजीयक कार्यालय भी गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि जिरह के दौरान दस्तावेज लेखक की गवाही को गलत साबित करने वाला कोई तथ्य सामने नहीं आया। मैथ्यू ओमन बनाम सुशीला मैथ्यू और सेठ बेनी चंद बनाम कमला कुंवर के फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि सत्यापन करने वाले गवाहों के कॉलम में नाम और हस्ताक्षर होने पर दस्तावेज लेखक भी सक्षम गवाह हो सकता है। इस प्रकार वसीयत के सत्यापन की कानूनी शर्त पूरी हुई।
वसीयत बनाने के समय शंकर दत्त पाठक की मानसिक स्थिति पर हाईकोर्ट ने कहा कि वादी ने ऐसा कोई प्रमाण पेश नहीं किया, जिससे साबित हो कि वसीयत बनाते समय उनके पिता का इलाज चल रहा था या उनकी मानसिक क्षमता प्रभावित हो गई। इस संबंध में न तो किसी डॉक्टर और न ही किसी वैद्य को गवाही के लिए पेश किया गया। इस मुद्दे पर वादी के एकमात्र गवाह का प्रतिवादियों से मुकदमेबाजी संबंधी विवाद भी था।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि वसीयतकर्ता पहले स्कूल शिक्षक रह चुके थे और उन्होंने स्वयं वसीयत पढ़ी थी।
जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति की उम्र 80 वर्ष से अधिक होने के कारण यह नहीं माना जा सकता कि वह इतना कमजोर हो गया है कि वसीयत नहीं कर सकता या उसकी मानसिक क्षमता समाप्त हो गई।
अदालत ने वादी की ओर से ही प्रस्तुत किए गए पत्रों का भी उल्लेख किया। इन पत्रों में वसीयत बनाने के बाद के छह महीनों के दौरान वसीयतकर्ता घरेलू मामलों और अपने स्वास्थ्य के बारे में लिख रहे थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि वसीयत दबाव डालकर कराई गई होती तो वसीयतकर्ता बाद में पत्रों के माध्यम से अपनी परेशानी व्यक्त कर सकते थे। लेकिन वादी द्वारा पेश किए गए पत्रों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं था कि उनके पिता को वसीयत बनाने के लिए मजबूर किया गया।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि वादी यह साबित नहीं कर सका कि हरि दत्त पाठक अपने पिता पर अनुचित प्रभाव डालने की स्थिति में थे या उन्होंने अपने भरोसेमंद संबंध का दुरुपयोग किया। वादी का यह भी मामला नहीं था कि प्रतिवादी ने कभी अपने पिता की उपेक्षा की या उनकी संपत्ति का दुरुपयोग किया।
अदालत ने प्रथम अपीलीय अदालत के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया और दूसरी अपील खारिज की।
प्रक्रियागत आपत्ति पर हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा निर्णय के लिए अलग-अलग बिंदु निर्धारित नहीं किए जाने से वादी को कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ। दोनों पक्ष विवाद के मुद्दों से परिचित थे और उन्हें अपना साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर मिला था। ऐसे में केवल प्रक्रियागत अनियमितता के आधार पर गुण-दोष पर दिए गए फैसले को निरस्त नहीं किया जा सकता।
अदालत ने शेष प्रतिवादियों के संबंध में यह भी दर्ज किया कि अपील का निपटारा 19 जुलाई 2022 के फैसले में विधिवत सत्यापित समझौते के आधार पर पहले ही किया जा चुका था, जिसे डिक्री का हिस्सा बनाया गया। वर्तमान निर्णय में शेष अपील प्रतिवादी संख्या 2/2 के विरुद्ध खारिज की गई।

