अपनी गलती के कारण अंतिम चरण में टेंडर रद्द नहीं कर सकती सरकार, EPBG की राशि बढ़ाकर गलती सुधारी जा सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • अपनी गलती के कारण अंतिम चरण में टेंडर रद्द नहीं कर सकती सरकार, EPBG की राशि बढ़ाकर गलती सुधारी जा सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि टेंडर जारी करने वाली सरकारी अथॉरिटी अपनी ही गलती के कारण अंतिम चरण में पहुंच चुके टेंडर रद्द नहीं कर सकती। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि परफॉर्मेंस बैंक गारंटी (ePBG) सफल बोलीदाता की पात्रता या उसकी रैंकिंग तय करने वाली शर्त नहीं है। इसलिए टेंडर दस्तावेज में ePBG की राशि गलत दर्ज हो जाने की स्थिति में उसे ठीक किया जा सकता है और इसके लिए पूरी निविदा प्रक्रिया दोबारा शुरू करना जरूरी नहीं है।

    जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने कहा कि अपनी ही गलती के कारण टेंडर की शर्त में सुधार करना चयन प्रक्रिया की मूल प्रकृति को नहीं बदलता। यह टेंडर की प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने वाली नई शर्त जोड़ना नहीं बल्कि टेंडर जारी करने वाली अथॉरिटी की गलती को सुधारना है।

    मामला चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी परामर्श सेवाओं की निविदा का है, जिसे सरकारी ई-मार्केटप्लेस के जरिए जारी किया गया। याचिकाकर्ता को सबसे ऊंची रैंक यानी एच-1 बोलीदाता घोषित किया गया। उसकी बोली को मंजूरी मिलने के बाद महानिदेशक, चिकित्सा स्वास्थ्य, लखनऊ ने 11 अगस्त 2026 को अनुबंध भी अपलोड कर दिया था। इसके बाद केवल अनुबंध पर हस्ताक्षर होना बाकी था।

    हालांकि, 22 अगस्त 2026 को विभाग ने अपरिहार्य परिस्थितियों का हवाला देते हुए पूरी निविदा रद्द की। इसके खिलाफ सफल बोलीदाता ने हाईकोर्ट का रुख किया।

    सुनवाई के दौरान अदालत के निर्देश पर राज्य सरकार ने पहली बार बताया कि निविदा दस्तावेज में ePBG गलती से 0.75 प्रतिशत दर्ज हो गई, जबकि सरकारी ई-मार्केटप्लेस की निविदाओं में यह 3 से 5 प्रतिशत के बीच होनी चाहिए।

    सरकार की ओर से दलील दी गई कि ePBG की राशि बढ़ाना निविदा की महत्वपूर्ण शर्त में बदलाव होगा और इससे अन्य बोलीदाताओं को नुकसान पहुंच सकता है। इसके विपरीत याचिकाकर्ता ने कमी की राशि जमा करने और अनुबंध मूल्य की 5 प्रतिशत ePBG देने की सहमति जताई।

    हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में याचिकाकर्ता की योग्यता या पर्याप्त धनराशि न होने को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया गया। इसलिए मुख्य सवाल यह है कि ePBG निविदा की ऐसी अनिवार्य शर्त है, जिसके आधार पर बोली का मूल्यांकन हुआ, या यह केवल सहायक शर्त है।

    पीठ ने पोददार स्टील कॉरपोरेशन बनाम गणेश इंजीनियरिंग वर्क्स के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि निविदा की ऐसी सहायक शर्त, जिसका बोली के मूल्यांकन पर असर नहीं पड़ता उपयुक्त स्थिति में माफ या ठीक की जा सकती है।

    अदालत ने कहा कि ePBG की राशि का याचिकाकर्ता की एच-1 स्थिति तय करने में कोई योगदान नहीं था। इसलिए सरकार अपनी गलती का खामियाजा सफल बोलीदाता को भुगतने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।

    हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को भी खारिज किया कि ePBG बढ़ाने से दूसरे बोलीदाताओं को नुकसान होगा। अदालत ने कहा कि सफल बोलीदाता से अधिक सुरक्षा मांगना आखिरकार उसी पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालता है। संभावित बोलीदाताओं के इस आधार पर प्रभावित होने की दलील कि कम ePBG ने उन्हें बोली लगाने के लिए आकर्षित किया भी अदालत को स्वीकार नहीं हुई।

    अदालत ने कहा,

    “ePBG की राशि बढ़ने से प्रतिभागियों को नुकसान होगा, यह कहना पूरी तरह निराधार है।”

    हाईकोर्ट ने यह भी माना कि अनुबंध को हस्ताक्षर के लिए अपलोड किए जाने से याचिकाकर्ता को उसके निष्पादन की वैध अपेक्षा पैदा हुई। ऐसे में केवल अपनी गलती के कारण और वह भी तब जब गलती को आसानी से सुधारा जा सकता था, पूरी प्रक्रिया रद्द करना उस वैध अपेक्षा को खत्म करता है।

    अदालत ने कहा,

    “इतने विलंबित चरण में ऐसी वजह से पूरी प्रक्रिया रद्द करना जो स्वयं पैदा की गई गलती है और जिसे सुधारा जा सकता है, उस वैध अपेक्षा को खत्म करता है, जबकि इसके विपरीत कोई सार्वजनिक हित, वित्तीय असंभवता या अनुबंध पूरा न कर पाने की स्थिति न तो बताई गई और न ही साबित की गई।”

    हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 22 अगस्त 2026 को टेंडर रद्द करने का आदेश निरस्त किया। अदालत ने याचिकाकर्ता को एक सप्ताह के भीतर ePBG की शेष राशि जमा करने का निर्देश दिया। इसके बाद टेंडर को बहाल माना जाएगा और दो सप्ताह के भीतर अनुबंध पर हस्ताक्षर के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।

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