शून्य बकाया कह देने से नहीं खत्म होगी राज्य की देनदारी, विभाग की पुरानी स्वीकारोक्ति भी देखेगा कोर्ट: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
5 Sept 2026 12:41 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी ठेकेदार के बकाये को लेकर राज्य सरकार बाद की जांच के आधार पर भले ही कुछ भी बकाया नहीं होने का दावा करे लेकिन अदालत उस दावे को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं कर सकती। अदालत को विभाग की अपनी पिछली स्वीकारोक्ति और बाद में जारी की गई रकम का मिलान कर वास्तविक बकाया देखना होगा।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अभ्देश कुमार चौधरी की पीठ ने कहा कि विभाग के एकतरफा और अपने हित में किए गए शून्य देनदारी का दावा स्वीकार करने के बजाय उसके पुराने आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से जांच करना जरूरी है।
मामला बहराइच के चिलवरिया गांव की पांच फर्मों से जुड़ा है। एक ही परिवार के सदस्यों द्वारा संचालित इन फर्मों ने जिले में खंड स्तर पर आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए भोजन के पैकेट उपलब्ध कराए। इन सामानों के लिए आदेश सरकारी ई-बाजार के माध्यम से दिए गए लेकिन भुगतान प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। भुगतान पोर्टल की सीमा जारी नहीं होने भुगतान सलाह तैयार नहीं हो पाने और एकल नोडल खाता नहीं खुलने के कारण धनराशि लैप्स हो गई और फर्मों के बिलों का भुगतान नहीं हो सका।
पहले दौर की याचिकाओं के निस्तारण के बाद याचिकाकर्ताओं को दोबारा निदेशक, बेसिक शिक्षा के समक्ष अपना पक्ष रखने की स्वतंत्रता दी गई। इसके बाद 15 जनवरी 2025 के आदेश में प्रमुख मामले में विभाग ने 35,02,521 रुपये के दावे के मुकाबले 14,15,896 रुपये की देनदारी स्वीकार की थी। इसी आदेश को वर्तमान याचिकाओं में चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि आदेश मनमाना और कारणरहित है तथा इसमें जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी और खंड शिक्षा अधिकारियों की उन रिपोर्टों को नजरअंदाज कर दिया गया, जिनमें पूरी रकम के दावे का समर्थन किया गया। उन्होंने दलील दी कि राज्य की ओर से स्वीकार की गई बकाया राशि का भुगतान न करना मनमाना है। ऐसी स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट अदालत राहत दे सकती है।
राज्य की ओर से कहा गया कि बिल विवादित हैं और बाद में खंड स्तर पर दोबारा सत्यापन कराया गया। 11 मई 2026 की जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की रिपोर्ट में फर्मों के सामने बकाया राशि 'शून्य' बताई गई। राज्य ने यह भी बताया कि फर्मों की ओर से मांगी जा रही रकम लगातार बढ़ती गई। जुलाई 2025 में यह मांग 1,24,44,909 रुपये थी, जो मार्च 2026 तक बढ़कर 4,25,29,576 रुपये हो गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रत्येक याचिकाकर्ता के मामले में तीन अलग-अलग आंकड़े सामने आए मांगी गई रकम, विभाग के आदेश में स्वीकार की गई रकम और बाद के सत्यापन के बाद जारी की गई रकम। ऐसे में पूरी रकम का निर्धारण केवल हलफनामों के आधार पर करना संभव नहीं है। यह विवादित तथ्य का विषय है जिसके लिए साक्ष्य की जरूरत होगी।
हालांकि, विभाग द्वारा अपने ही आदेश में स्वीकार की गई रकम के उस हिस्से को अदालत ने अलग माना जो अब तक भुगतान नहीं किया गया। पीठ ने कहा कि विभाग की अपनी स्वीकारोक्ति के आधार पर तय रकम का भुगतान बाकी होने की स्थिति में उसके लिए अलग से साक्ष्य की जरूरत नहीं है।
पीठ ने स्पष्ट किया,
“यह कोई ऐसा विवादित आंकड़ा नहीं है, जिसके लिए साक्ष्य की जरूरत हो। यह स्वयं प्रतिवादियों की विभागीय स्वीकारोक्ति है, जो उनके अपने आदेश में दर्ज है और उनके भरोसे की गई सत्यापन प्रक्रिया के बावजूद अब तक बकाया है।”
अदालत ने पाया कि पांच में से दो याचिकाओं में विभाग की ओर से जारी रकम, उसी विभाग द्वारा पहले स्वीकार की गई देनदारी से कम थी। इसलिए इन दोनों मामलों में बकाया अंतर की रकम का भुगतान करने का निर्देश दिया गया।
प्रमुख याचिका में जारी 37,94,906 रुपये की रकम याचिकाकर्ता के कुल दावे से अधिक पाई गई। वहीं अन्य मामलों में विभाग की स्वीकार की गई रकम और बाद में किए गए भुगतान के बीच अंतर का हिसाब लगाकर राहत तय की गई।
पूरे बढ़े हुए दावे पर रिट अदालत से भुगतान की मांग को हाईकोर्ट ने स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि जहां मूल देनदारी की रकम ही विवादित हो और पक्षकार इस बात पर सहमत न हों कि वास्तव में कितनी रकम देय है, वहां रिट याचिका के माध्यम से तथ्य का विस्तृत निर्धारण नहीं किया जा सकता। ऐसे विवाद का फैसला दीवानी मुकदमे में साक्ष्य के आधार पर होना चाहिए।
पीठ ने इस संबंध में हाइकोर्ट के उन फैसलों का उल्लेख किया, जिनमें राज्य के साथ अनुबंध से जुड़े गंभीर तथ्यात्मक विवादों को रिट क्षेत्राधिकार में तय करने से इनकार किया गया।
अदालत ने अधिक रकम पर 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की मांग भी खारिज की। उसका कहना था कि ब्याज का अधिकार मूल रकम के निश्चित रूप से देय और भुगतान योग्य होने के बाद ही पैदा होता है। यानी ब्याज का अधिकार मूल रकम के निश्चित होने पर निर्भर है और उससे पहले पैदा नहीं हो सकता।
हालांकि, अदालत ने अधिकारियों के आचरण पर भी टिप्पणी की और कहा कि उनका व्यवहार पूरी तरह संतोषजनक नहीं रहा। विभाग के पहले आदेश और बाद की सत्यापन रिपोर्ट में अलग-अलग आंकड़े सामने आए।
जिन दो मामलों में स्वीकार की गई देनदारी का कुछ हिस्सा बाकी पाया गया उसमें हाईकोर्ट ने संबंधित रकम दो महीने के भीतर जारी करने का निर्देश दिया। इस रकम पर 15 जनवरी 2025 से वास्तविक भुगतान की तारीख तक नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
बाकी तीन याचिकाओं में अदालत ने कोई अतिरिक्त भुगतान निर्देश जारी नहीं किया। हालांकि राज्य को अधिक भुगतान हो जाने की स्थिति में उसकी वसूली समायोजन या अन्य तरीके से हिसाब करने की स्वतंत्रता दी गई।
अदालत ने 15 जनवरी 2025 का आदेश रद्द करने और उससे अधिक रकम के भुगतान की मांग खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं को विवादित अतिरिक्त रकम के लिए दीवानी मुकदमा दायर करने का रास्ता खुला रखा। साथ ही मुकदमे के लिए परिसीमा की गणना में परिसीमा अधिनियम की धारा 14 का लाभ देने की भी स्वतंत्रता दी गई।


