सुनवाई का अवसर दिए बिना सूचना अधिकारी पर जुर्माना नहीं लगाया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
13 July 2026 1:07 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act), 2005 की धारा 20 के तहत सूचना देने में देरी पर लोक सूचना अधिकारी (PIO) पर जुर्माना लगाने से पहले उसे सुनवाई का उचित अवसर देना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि केवल बिना आधार के राय बनाकर दंड नहीं लगाया जा सकता, बल्कि उपलब्ध अभिलेखों और तथ्यों के आधार पर विधिसम्मत राय बनाना आवश्यक है।
यह फैसला जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सुनाया।
मामले में याचिकाकर्ता एक खंड शिक्षा अधिकारी होने के साथ-साथ लोक सूचना अधिकारी भी है। उन्होंने विभिन्न कारणों से समय पर सूचना उपलब्ध नहीं कराई थी, हालांकि बाद में सूचना दे दी गई। इसके बावजूद राज्य सूचना आयोग ने एकपक्षीय आदेश पारित करते हुए उन पर RTI Act की धारा 20(1) के तहत 25 हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया। इस आदेश के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी गई, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई भी दंड, जिसके नागरिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना नहीं लगाया जा सकता। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता को नोटिस जारी किया गया था या अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया।
खंडपीठ ने कहा कि धारा 20(1) के तहत जुर्माना लगाने की प्रक्रिया की शुरुआत सक्षम प्राधिकारी द्वारा विधिसम्मत राय बनाने से होती है। यह राय व्यक्तिगत धारणा या अनुमान पर नहीं, बल्कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर बननी चाहिए। साथ ही, संबंधित लोक सूचना अधिकारी के स्पष्टीकरण और उसके आचरण का भी परीक्षण किया जाना आवश्यक है।
अदालत ने कहा,
"जुर्माना लगाने से पहले संबंधित प्राधिकारी के लिए यह आवश्यक है कि वह उपलब्ध रिकॉर्ड और लोक सूचना अधिकारी के स्पष्टीकरण के आधार पर राय बनाए। बिना नोटिस और सुनवाई के ऐसा दंड नहीं लगाया जा सकता।"
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 20(1) के तहत केवल रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस सामग्री पर संबंधित अधिकारी को अपना पक्ष रखने का अवसर देना भी उतना ही आवश्यक है। यदि सुनवाई का अवसर नहीं दिया जाता तो दंडात्मक कार्रवाई कानून के अनुरूप नहीं मानी जा सकती।
अदालत ने पाया कि इस मामले में राज्य सूचना आयोग ने न तो याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी किया और न ही जवाब दाखिल करने या यह साबित करने का अवसर दिया कि सूचना देने में हुई देरी के पीछे उचित कारण था। ऐसे में आयोग के पास जुर्माना लगाने के लिए आवश्यक वैधानिक आधार मौजूद नहीं था।
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक को प्रतिकूल कार्रवाई से पहले सुने जाने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। चूंकि जुर्माना लगाने से नागरिक परिणाम उत्पन्न होते हैं, इसलिए सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के मनोहर बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि RTI Act की धारा 20 के तहत दंड लगाने से पहले संबंधित अधिकारी को उचित सुनवाई का अवसर देना और यह जांचना आवश्यक है कि सूचना देने में देरी या सूचना न देने के पीछे कोई उचित कारण था या नहीं।
इन्हीं आधारों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सूचना आयोग के 25 हजार रुपये के जुर्माने तथा पुनर्विचार याचिका खारिज करने का आदेश रद्द किया।


