यूपी पुलिसकर्मियों को राहत: सजा के खिलाफ पुनर्विचार में देरी माफ की जा सकती है, इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

Amir Ahmad

10 Sept 2026 5:48 PM IST

  • यूपी पुलिसकर्मियों को राहत: सजा के खिलाफ पुनर्विचार में देरी माफ की जा सकती है, इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के अधीनस्थ रैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों को राहत देते हुए कहा कि विभागीय सजा के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दाखिल करने में हुई देरी को माफ किया जा सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश पुलिस अधिकारियों के अधीनस्थ रैंक के दंड एवं अपील नियम, 1991 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 के तहत देरी माफ करने की शक्ति को समाप्त करता हो।

    जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की पीठ ने कहा कि नियमों में न तो पुनर्विचार प्राधिकारी की देरी माफ करने की शक्ति को स्पष्ट रूप से खत्म किया गया और न ही देरी माफ करने के लिए कोई अधिकतम सीमा तय की गई है। इसलिए नियम 23(1) में पुनरीक्षण के लिए तय तीन महीने की अवधि को पूर्ण और कठोर समयसीमा नहीं माना जा सकता।

    मामला एक कांस्टेबल से जुड़ा है, जिस पर बिना अनुमति ड्यूटी से अनुपस्थित रहने का आरोप लगा। विभागीय कार्रवाई के बाद उसे 30 नवंबर 2004 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उसकी वैधानिक अपील भी खारिज हो गई। इसके बाद उसने उत्तर प्रदेश पुलिस अधिकारियों के अधीनस्थ रैंक के दंड एवं अपील नियम, 1991 के नियम 23 के तहत मेरठ के पुलिस महानिरीक्षक के समक्ष 6 जुलाई 2006 को पुनरीक्षण दाखिल किया। पुनरीक्षण दाखिल करने में करीब डेढ़ साल की देरी हुई थी। पुलिस महानिरीक्षक ने इसे समयसीमा से बाहर बताते हुए खारिज किया।

    कांस्टेबल ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की, लेकिन एकल पीठ ने 8 मई 2026 को याचिका खारिज की। एकल पीठ का मानना था कि पुनरीक्षण तीन महीने की निर्धारित अवधि के बाद दाखिल किया गया और संबंधित प्राधिकारी के पास देरी माफ करने की शक्ति नहीं थी। इसके बाद कांस्टेबल ने एकल पीठ के आदेश के खिलाफ अंतर-न्यायालय अपील दाखिल की।

    डिवीजन बेंच ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि राज्य की ओर से ऐसा कोई प्रावधान नहीं बताया गया, जिसमें नियमों के तहत परिसीमा अधिनियम को स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया हो। अदालत ने कहा कि नियम 23 या नियमों के किसी अन्य प्रावधान में देरी माफ करने पर रोक नहीं लगाई गई और न ही ऐसी कोई अंतिम सीमा तय की गई, जिसके बाद देरी किसी भी परिस्थिति में माफ न की जा सके।

    अदालत ने नियम 23(1) के पहले प्रावधान को भी महत्वपूर्ण माना। इस प्रावधान के तहत यदि किसी अपीलीय आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण दाखिल नहीं किया गया है तो पुनरीक्षण प्राधिकारी स्वयं उस आदेश का रिकॉर्ड मंगा सकता है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि नियम में इस्तेमाल किए गए शब्दों से स्पष्ट है कि पुनरीक्षण प्राधिकारी की यह स्वतः संज्ञान वाली शक्ति तीन महीने की निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद ही इस्तेमाल की जा सकती है। इससे यह संकेत मिलता है कि तीन महीने की अवधि को पूर्ण और अपरिवर्तनीय समयसीमा नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने कहा कि परिसीमा अधिनियम की धारा 29(2) के तहत किसी विशेष या स्थानीय कानून में निर्धारित समयसीमा पर परिसीमा अधिनियम की धाराएं 4 से 24 लागू होती हैं, जब तक संबंधित कानून ने उन्हें स्पष्ट रूप से बाहर न किया हो। इनमें धारा 5 भी शामिल है, जो पर्याप्त कारण होने पर देरी माफ करने की अनुमति देती है।

    अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर, देहर पावर हाउस सर्किल बनाम एक्साइज एंड टैक्सेशन ऑफिसर मामले में दिए गए सिद्धांत का भी उल्लेख किया। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि उस फैसले का आधार मौजूदा मामले में लागू नहीं होता, क्योंकि वह सिद्धांत उन कानूनों पर लागू होता है जो न केवल समयसीमा तय करते हैं बल्कि देरी माफ करने की शक्ति पर स्पष्ट रूप से पूर्ण या सशर्त रोक भी लगाते हैं। आम तौर पर इस तरह के प्रावधान आधुनिक कर कानूनों में देखने को मिलते हैं।

    हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा नियमों में ऐसी कोई रोक नहीं है। इसलिए केवल तीन महीने की समयसीमा तय होने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि उसके बाद दाखिल पुनरीक्षण में देरी किसी भी स्थिति में माफ नहीं की जा सकती।

    पीठ ने एकल पीठ के फैसले में कानून के सिद्धांत से जुड़ी स्पष्ट गलती पाई और अंतर-न्यायालय अपील तथा मूल रिट याचिका दोनों को मंजूर कर लिया। अदालत ने 8 मई 2026 के एकल पीठ के आदेश के साथ-साथ 22 अगस्त 2006 को पारित उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसके जरिए कांस्टेबल का पुनरीक्षण समयसीमा के आधार पर खारिज किया गया था।

    कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि पुनरीक्षण दाखिल किए जाने के बाद करीब 20 साल बीत चुके हैं और राज्य की ओर से देरी माफ किए जाने का विरोध करने के लिए कोई विशेष परिस्थिति नहीं बताई गई। ऐसे में मामले को केवल देरी के सवाल पर फिर से पुनरीक्षण प्राधिकारी के पास भेजने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

    हाईकोर्ट ने देरी को माफ मानते हुए संबंधित पुनरीक्षण प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह अब कांस्टेबल की पुनरीक्षण याचिका पर उसके गुण-दोष के आधार पर फैसला करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि फैसला कारणयुक्त और स्पष्ट आदेश के जरिए किया जाना चाहिए।

    इस फैसले से उन पुलिसकर्मियों को राहत मिल सकती है, जिनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के बाद पुनरीक्षण दाखिल करने में निर्धारित तीन महीने की अवधि से देरी हो गई है। हालांकि, देरी माफ होना स्वतः अधिकार नहीं है और प्रत्येक मामले में देरी के कारण तथा परिस्थितियों के आधार पर संबंधित प्राधिकारी को निर्णय लेना होगा।

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