खनन पट्टा समाप्त करने में राज्य की देरी का बोझ पट्टाधारक पर नहीं डाला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

20 July 2026 1:49 PM IST

  • खनन पट्टा समाप्त करने में राज्य की देरी का बोझ पट्टाधारक पर नहीं डाला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि रॉयल्टी का भुगतान न करने के कारण राज्य सरकार के पास खनन पट्टा समाप्त करने का आधार मौजूद है, तो उत्तर प्रदेश उपखनिज (रियायत) नियमावली, 1963 के नियम 58 के तहत कार्रवाई करने में राज्य की बिना कारण देरी मनमानी मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में केवल राज्य की देरी के कारण बाद में देय हुई किस्तों का भुगतान करने के लिए पट्टाधारक को बाध्य नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने कहा कि यदि सक्षम प्राधिकारी के पास पट्टा समाप्त करने का अधिकार होने के बावजूद वह समय पर उसका उपयोग नहीं करता, तो इससे पट्टाधारक को गंभीर नुकसान होता है। एक ओर वह पट्टे से बाहर नहीं निकल सकता और दूसरी ओर उसकी देनदारी लगातार बढ़ती रहती है। ऐसे में बिना कारण बताए कार्रवाई में देरी करना मनमाना आचरण है।

    मामले में याचिकाकर्ता फर्म को नवंबर 2018 में फतेहपुर जिले के ग्राम कुर्रा कनक में लगभग 40 हेक्टेयर क्षेत्र में बालू और मोरम खनन के लिए पांच वर्ष का पट्टा दिया गया था। सुरक्षा राशि और पहली रॉयल्टी किस्त जमा करने के बाद खनन शुरू हुआ। इस बीच अवैध खनन की शिकायत हुई, लेकिन जिला प्रशासन और राज्य स्तरीय जांच में याचिकाकर्ता के क्षेत्र में किसी भी अवैध खनन की पुष्टि नहीं हुई।

    इसके बाद याचिकाकर्ता ने दावा किया कि नदी का प्रवाह बदल जाने से पट्टे का कुछ हिस्सा जलमग्न हो गया और कुछ क्षेत्र बांदा जिले की ओर चला गया है, जिससे खनन संभव नहीं रह गया। उसने खनिज की निर्धारित मात्रा कम करने की मांग भी की। हालांकि, याचिकाकर्ता के अनुरोध पर कराए गए लगातार तीन सर्वेक्षणों में न तो पट्टे के क्षेत्र में कोई कमी पाई गई और न ही किसी प्रकार का सीमा विवाद सामने आया।

    इस बीच याचिकाकर्ता ने 1 जनवरी 2019 और 1 अप्रैल 2019 को देय दूसरी और तीसरी रॉयल्टी किस्त जमा नहीं की। इसके बाद कई मांग नोटिस और कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। अंततः 1 जनवरी 2020 को जिला मजिस्ट्रेट ने पट्टा समाप्त कर दिया और फर्म को दो वर्ष के लिए काली सूची में भी डाल दिया।

    हाईकोर्ट ने यह मानने से इनकार किया कि खनन करना असंभव हो गया। कोर्ट ने कहा कि प्रशासन ने कभी भी खनन कार्य में बाधा नहीं डाली और बार-बार सर्वेक्षण की मांग केवल रॉयल्टी भुगतान की जिम्मेदारी से बचने का प्रयास थी।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि नियमावली, 1963 और पट्टा अनुबंध राज्य सरकार को पट्टा समाप्त करने का अधिकार तो देते हैं, लेकिन यदि पट्टाधारक किसी कारणवश खनन नहीं कर पा रहा हो तो उसे स्वयं पट्टे से बाहर निकलने का कोई अधिकार नहीं दिया गया। इस कारण वह पूरी तरह राज्य की कार्रवाई पर निर्भर रहता है।

    खंडपीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में राज्य को नियम 58 के तहत समय पर कार्रवाई करनी चाहिए। यदि प्राधिकारी निर्धारित समय के भीतर पट्टा समाप्त नहीं करता, तो उसे यह बताना होगा कि देरी क्यों हुई। यदि देरी दुर्भावनापूर्ण या अनुचित पाई जाती है तो यह अधिकारों का दुरुपयोग और संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत मनमानी कार्रवाई होगी।

    कोर्ट ने पाया कि इस मामले में प्रशासन ने यह नहीं बताया कि नोटिस का पालन न होने के बावजूद नियम 58 के तहत तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं की गई। यदि समय पर पट्टा समाप्त कर दिया जाता, तो 1 जुलाई 2019 और 1 अक्टूबर 2019 को देय रॉयल्टी किस्तें देय ही नहीं होतीं।

    इसी आधार पर हाईकोर्ट ने वसूली आदेश को आंशिक रूप से रद्द करते हुए 1 जुलाई 2019 और 1 अक्टूबर 2019 की किस्तों की मांग को निरस्त किया। साथ ही याचिकाकर्ता द्वारा पहले से जमा 70 लाख रुपये को 1 जनवरी 2019 और 1 अप्रैल 2019 की देय किस्तों में समायोजित करने का निर्देश दिया।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने खनन पट्टा समाप्त करने का आदेश बरकरार रखा। कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि फर्म पर लगाया गया दो वर्ष का काली सूची में डालने का प्रतिबंध अब समाप्त हो चुका है। इसलिए यदि वह अन्य सभी शर्तें पूरी करती है तो भविष्य की खनन नीलामियों में भाग लेने से उसे नहीं रोका जा सकता।

    Next Story