वन विभाग के दैनिक वेतनभोगियों को न्यूनतम वेतन न देने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, यूपी सरकार पर लगाया ₹1 लाख जुर्माना
Amir Ahmad
30 Oct 2026 3:46 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश वन विभाग के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान का लाभ देने से इनकार करने पर राज्य सरकार के रवैये को बेहद निंदनीय बताया।
अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर पहले ही कानून की स्थिति स्पष्ट कर चुका है, इसके बावजूद विभाग गरीब कर्मचारियों के वैध अधिकारों से उन्हें वंचित करने के लिए तरह-तरह के आधार तलाश रहा है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की दोनों विशेष अपीलें खारिज करते हुए उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया।
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की पीठ ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट का कानून इस विषय पर स्पष्ट हो और रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ न हो, जिससे यह लगे कि याचिकाकर्ता अंतिम सुनवाई में सफल नहीं होगा, तो रिट अदालत अंतरिम चरण में भी ऐसा आदेश दे सकती है, जो अंतिम राहत के समान हो।
पीठ ने कहा कि अंतिम सुनवाई तक न्यूनतम वेतनमान का लाभ रोकने से कर्मचारी को गंभीर आर्थिक कठिनाई और नुकसान होता, जबकि वह कानूनी रूप से इस लाभ का हकदार है।
मामले में कर्मचारी का कहना है कि वह जुलाई 2009 से सोनभद्र जिले के ओबरा स्थित प्रभागीय वन कार्यालय में चौकीदार, वॉचर और प्रभारी के रूप में काम कर रहा है। इसके बावजूद उसे हर महीने केवल 6,162 रुपये दिए जा रहे थे, जबकि वन विभाग के नियमित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रतिमाह है।
एकल जज ने 8 जुलाई 2026 के आदेश में राज्य सरकार को कर्मचारी को नियमित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के लिए स्वीकार्य न्यूनतम वेतनमान हर महीने देने का निर्देश दिया था।
हालांकि, आदेश में स्पष्ट किया गया कि कर्मचारी को कोई भत्ता या वेतनवृद्धि नहीं मिलेगी। इस आदेश में हाईकोर्ट के पूर्व फैसले केशव प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य पर भरोसा किया गया। राज्य सरकार ने इसके खिलाफ विशेष अपीलें दाखिल कीं।
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि दैनिक वेतनभोगियों के वेतन के संबंध में वन विभाग द्वारा 24 सितंबर 2024 को जारी दिशा-निर्देशों को पवनीश गिरि बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में अवैध घोषित नहीं किया गया था।
उस मामले में समन्वय पीठ ने इन्हें सरकारी आदेश के बजाय प्रशासनिक निर्देश माना था और उनकी वैधता पर लंबित रिट याचिका में विचार होना था।
सरकार ने यह भी कहा कि एकल जज ने उसे सुनवाई का अवसर दिए बिना आदेश पारित किया, अंतरिम चरण में अंतिम राहत नहीं दी जा सकती और केशव प्रसाद के फैसले का कोई बाध्यकारी महत्व नहीं है। इसके अलावा, कर्मचारी की नियुक्ति किसी स्वीकृत पद पर नहीं, बल्कि मौसम के अनुसार थोड़े समय के लिए की गई।
दूसरी ओर, कर्मचारी की ओर से कहा गया कि विभाग के दिशा-निर्देश पहले ही अवैध ठहराए जा चुके हैं। पुट्टी लाल मामले में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को उन सभी दैनिक वेतनभोगियों को न्यूनतम वेतनमान देने का निर्देश दिया था, जो नियमित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के समान काम करते हैं।
यह भी बताया गया कि एकल जज ने राज्य सरकार के निर्देशों पर विचार करने और उसे सुनने के बाद ही आदेश पारित किया। इसी तरह का लाभ केशव प्रसाद को भी दिया जा चुका है।
हाईकोर्ट ने बताया कि 30 सितंबर 2026 को उसने वन विभाग के प्रमुख सचिव से यह स्पष्ट करने को कहा था कि जब विवाद पर सुप्रीम कोर्ट तक फैसला हो चुका है, तो राज्य सरकार ने अपील क्यों दाखिल की। प्रमुख सचिव ने 6 अक्टूबर 2026 को दाखिल हलफनामे में कर्मचारी को आकस्मिक पौधरोपण संरक्षण कर्मी बताया था।
विवाद के इतिहास पर गौर करते हुए पीठ ने कहा कि पुट्टी लाल मामले में दैनिक वेतनभोगियों को बिना भत्तों और वेतनवृद्धि के न्यूनतम वेतनमान देने का निर्देश दिया गया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा।
हरि शंकर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में अवमानना कार्यवाही के दौरान विभाग की यह दलील भी स्वीकार नहीं की गई थी कि यह लाभ केवल नियमितीकरण के पात्र कर्मचारियों तक सीमित होना चाहिए।
अदालत ने उप निदेशक, सामाजिक वानिकी प्रभाग बनाम लक्ष्मी चंद्र मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के आदेशों को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक निर्देश दिया था कि यदि आदेशों का पालन नहीं किया जाता है तो वन विभाग के प्रमुख सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को वेतन नहीं दिया जाएगा।
पीठ ने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम जगजीत सिंह और सभा शंकर दुबे बनाम प्रभागीय वन अधिकारी मामलों का भी हवाला दिया। इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अस्थायी कर्मचारियों को भी उसी पद पर कार्यरत नियमित कर्मचारियों के वेतनमान का न्यूनतम वेतन पाने का अधिकार है।
हाईकोर्ट ने कहा कि 24 सितंबर 2024 के विभागीय दिशा-निर्देश पुट्टी लाल फैसले के विपरीत हैं और इसलिए स्पष्ट रूप से अवैध हैं। उन्हें कर्मचारी के दावे को खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
राज्य सरकार की यह दलील भी रिकॉर्ड के विपरीत पाई गई कि उसे सुनवाई का अवसर नहीं मिला था। अदालत ने कहा कि अपीलकर्ताओं ने विभागीय निर्देश दाखिल किए थे, दो बार समय मांगा था, लेकिन जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया।
अंतरिम चरण में अंतिम राहत देने के सवाल पर अदालत ने अशोक कुमार बाजपेयी बनाम डॉ. रंजना बाजपेयी और देवराज बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसलों का उल्लेख किया।
पीठ ने कहा कि दुर्लभ और असाधारण मामलों में, जहां प्रथम दृष्टया मामला बेहद मजबूत हो और अंतरिम राहत नहीं देने पर अंतिम सुनवाई के बाद भी राहत देने का कोई व्यावहारिक अर्थ न बचे, वहां अंतरिम स्तर पर अंतिम राहत दी जा सकती है।
अदालत ने यह भी पाया कि केशव प्रसाद को वही लाभ दिया गया था, जिससे मौजूदा कर्मचारी को वंचित रखा जा रहा था।
पीठ के अनुसार, राज्य सरकार का यह रवैया मनमाना और अवैध था तथा वह समान स्थिति वाले कर्मचारियों के मामलों में चुनिंदा तरीके से व्यवहार कर रही थी।
कर्मचारी की नियुक्ति रुक-रुककर होने की दलील को भी हाईकोर्ट ने निराधार बताया। प्रमुख सचिव के हलफनामे के साथ लगाए गए विवरण से पता चला कि कर्मचारी ने 2019 से 2025 के बीच हर साल पांच से बारह महीने तक काम किया था। फरवरी 2026 तक भी उसने दो महीने काम किया था।
अदालत ने भगवान दास बनाम हरियाणा राज्य का हवाला देते हुए कहा कि जब काम की प्रकृति समान हो, तो योजना या नियुक्ति का अस्थायी होना न्यूनतम वेतनमान के अधिकार को खत्म नहीं करता।
पीठ ने कहा कि करीब 30 साल बीत जाने के बावजूद उत्तर प्रदेश वन विभाग के दैनिक वेतनभोगियों को अपने वैध न्यूनतम वेतनमान के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है।
राज्य सरकार ने इस अधिकार से उन्हें वंचित करने के लिए हर संभव प्रयास किया है। अदालत ने विभाग के रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के बार-बार निर्देशों के बावजूद कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान न देना मनमाना और अवैध है तथा इसमें दुर्भावना की झलक मिलती है। पीठ ने इसे बेहद निंदनीय स्थिति बताया।
अंततः हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की दोनों विशेष अपीलें खारिज कर दीं और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया। प्रत्येक अपील में 50,000 रुपये संबंधित कर्मचारी को एक महीने के भीतर देने का निर्देश दिया गया।

