फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 14 साक्ष्य और प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों से छूट नहीं देती: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मां को सौंपी बच्चे की कस्टडी

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    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट एक्ट 1984 की धारा 14 के तहत परिवार न्यायालयों को भारतीय साक्ष्य कानून के कठोर नियमों से जो सीमित छूट दी गई, उसका मतलब यह नहीं है कि वे साक्ष्य के सामान्य सिद्धांतों और प्राकृतिक न्याय के नियमों का पालन करने से मुक्त हो जाते हैं।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि पिता के केवल हलफनामे के आधार पर बच्चे की कस्टडी का फैसला नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब पिता ने जिरह के लिए खुद को पेश ही नहीं किया हो।

    जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने बच्चे की कस्टडी से संबंधित फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मां को कस्टडी सौंपने का निर्देश दिया।

    अदालत ने कहा कि भले ही फैमिली कोर्ट साक्ष्य कानून से पूरी तरह बंधा न हो, फिर भी उसे साक्ष्य के सामान्य सिद्धांतों और प्राकृतिक न्याय के नियमों का पालन करना होगा। धारा 14 का उद्देश्य कुछ परिस्थितियों में साक्ष्य कानून के प्रासंगिकता और स्वीकार्यता संबंधी जटिल नियमों की कठोरता को कम करना है, न कि एक आदर्श कानूनी व्यवस्था में निहित साक्ष्य और प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों को समाप्त करना।

    हाईकोर्ट ने कहा कि जिरह का अवसर न देना प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है। अदालत ने टिप्पणी की कि निचली अदालत ने प्रतिवादी के हलफनामे में दिए गए बयानों को बिना जिरह का अवसर दिए सच मान लिया। यह दृष्टिकोण न केवल गलत था, बल्कि इसमें स्पष्ट कानूनी त्रुटि भी थी।

    मामले के अनुसार पति-पत्नी का विवाह 19 फरवरी 2007 को वाराणसी में हुआ था। उनके दो बेटे हुए। बड़े बेटे यथार्थ शर्मा का जन्म 2011 में और छोटे बेटे अनिकेत उर्फ समर्थ शर्मा का जन्म 2013 में हुआ।

    3 अप्रैल 2016 को पति अपनी पत्नी को उसके मायके वाराणसी में छोड़कर बड़े बेटे को अपने साथ ले गया। पति की तलाक याचिका 15 दिसंबर 2022 को खारिज कर दी गई। इसी दिन पत्नी की वैवाहिक अधिकारों की बहाली संबंधी याचिका स्वीकार की गई। हालांकि, पति ने न तो पत्नी को वापस अपने साथ रखा और न ही अदालत के आदेश का पालन किया। यह भी आरोप लगाया गया कि विवाह कायम रहते हुए पति ने सुमनलता शर्मा नामक महिला से दूसरी शादी कर ली।

    पत्नी ने 2017 में अभिभावक और वार्ड अधिनियम, 1890 की धारा 25 के तहत आजमगढ़ फैमिली कोर्ट में बच्चे की कस्टडी के लिए कार्यवाही शुरू की थी। फैमिली कोर्ट ने 23 जुलाई 2024 को उसकी याचिका खारिज की और उसे बच्चे से मिलने का अधिकार दिया। इसके बाद पत्नी ने फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 19 के तहत हाईकोर्ट में अपील दायर की। उसने कहा कि आदेश के बावजूद उसे अपने बेटे से एक बार भी मिलने नहीं दिया गया।

    हाईकोर्ट ने पाया कि पति अपील की सुनवाई में पेश नहीं हुआ। वह मध्यस्थता केंद्र में भी उपस्थित नहीं हुआ और दिसंबर 2024 में नोएडा स्थित अपना पता छोड़कर चला गया, लेकिन उसने अपना नया पता नहीं बताया। अदालत ने कहा कि विवादित आदेश पारित होने के तुरंत बाद उसका इस तरह गायब हो जाना पत्नी के मुलाकात के अधिकार को विफल करने की कोशिश प्रतीत होता है।

    अदालत ने यह भी पाया कि फैमिली कोर्ट के सामने पिता के हलफनामे के अलावा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था, जिससे यह पता चलता कि बच्चे के कल्याण का ध्यान किस तरह रखा जा रहा है। पिता की आय और बच्चे की पढ़ाई के संबंध में भी कोई जानकारी प्रस्तुत नहीं की गई। मुकदमे के दौरान पिता की अपनी चूक के कारण उसका साक्ष्य बंद कर दिया गया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने मां के इस कथन पर अनुचित भरोसा किया कि वह साढ़े तीन साल से अपने बेटे से नहीं मिली थी। अदालत के अनुसार, मां अपनी इच्छा से बच्चे से दूर नहीं रही थी, बल्कि उसे बच्चे से मिलने से रोका गया था। ऐसे में इस तथ्य को उसके खिलाफ इस्तेमाल करना गलत था।

    अदालत ने पाया कि मां को बच्चे की कस्टडी देने से मुख्य रूप से इसलिए इनकार किया गया, क्योंकि उसकी अपनी कोई आय नहीं थी और वह अपने रिटायर पिता पर निर्भर थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आर्थिक आत्मनिर्भरता को कस्टडी तय करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।

    इस संबंध में अदालत ने गौरव नागपाल बनाम सुमेधा नागपाल मामले का उल्लेख किया, जिसमें पिता को बच्चे की शिक्षा का खर्च उठाने का निर्देश दिया गया। इससे स्पष्ट होता है कि बच्चे की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए पिता की जिम्मेदारी को ध्यान में रखा जा सकता है।

    हाईकोर्ट ने मौसमी मोइत्रा गांगुली बनाम जयंत गांगुली मामले का भी हवाला दिया। इसमें कहा गया कि किसी अभिभावक की बेहतर आर्थिक स्थिति या बच्चे के प्रति उसका प्रेम प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन ये निर्णायक कारक नहीं हैं।

    अदालत ने अथर हुसैन बनाम सैयद सिराज अहमद एवं अन्य मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि पिता की दूसरी शादी अपने आप में बच्चे की कस्टडी देने से अयोग्य ठहराने का आधार नहीं है, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण पहलू हो सकता है, जिस पर विचार किया जाना चाहिए।

    हाईकोर्ट ने कहा कि पिता ने न्यायिक आदेशों का पालन नहीं किया और मां के पक्ष में उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया से बचने की कोशिश की। बच्चे के भविष्य पर विचार करते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि वह अपनी मां, छोटे भाई और नाना-नानी के साथ बड़ा होगा। भले ही उसे भौतिक सुविधाएं कुछ कम मिलें, लेकिन उसे बेहतर नैतिक और चारित्रिक मूल्य मिल सकते हैं।

    इन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार की और फैमिली कोर्ट का 23 जुलाई 2024 का फैसला तथा आदेश रद्द किया। अदालत ने पिता को निर्देश दिया कि वह एक महीने के भीतर नाबालिग बेटे की कस्टडी मां को सौंप दे।

    पिता को प्रत्येक शनिवार दोपहर 3 बजे से शाम 5 बजे तक वाराणसी के जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में बच्चे से मिलने का अधिकार दिया गया।


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