प्राधिकरण की गलती से विज्ञापन रद्द होने पर आवंटी को निवेश की भरपाई जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • प्राधिकरण की गलती से विज्ञापन रद्द होने पर आवंटी को निवेश की भरपाई जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी प्राधिकरण की अपनी गलती के कारण विज्ञापन रद्द किया जाता है और आवंटी की ओर से किसी शर्त का उल्लंघन नहीं हुआ है, तो प्राधिकरण को आवंटी द्वारा किए गए निवेश की भरपाई करनी होगी।

    कोर्ट ने हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड के रिटेल आउटलेट की डीलरशिप के लिए चयनित एक व्यक्ति को 15,78,486 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

    जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राहत देते हुए कहा कि जब आवंटी ने आशय पत्र में निर्धारित शर्तों को पूरा करने के लिए अपनी ओर से निवेश किया हो और आशय पत्र वापस लेने का कारण उसकी कोई गलती न हो, तो उसे अपने नुकसान का बोझ उठाने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता।

    मामले के अनुसार, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने 25 नवंबर 2018 को गाजीपुर जिले में राज्य राजमार्ग-99 पर रिटेल आउटलेट की डीलरशिप के लिए विज्ञापन जारी किया। याचिकाकर्ता ने आवेदन के साथ 10,000 रुपये जमा किए और 1 फरवरी 2019 को आयोजित लॉटरी में उसका चयन हुआ।

    इसके बाद 2 अगस्त 2019 को जारी आशय पत्र में उसे साइट को सड़क के स्तर तक विकसित करने और 1.5 मीटर ऊंची रिटेनिंग वॉल तथा चारदीवारी बनाने की शर्त दी गई। पत्र में यह भी कहा गया था कि शर्तें पूरी नहीं करने पर बिना किसी पूर्व सूचना के आशय पत्र वापस लिया जा सकता है।

    हालांकि, 11 मार्च 2021 को याचिकाकर्ता को सूचित किया गया कि संबंधित स्थान का आवंटन रद्द कर दिया गया।

    कॉर्पोरेशन की ओर से पेश वकील ने विज्ञापन की सामान्य शर्तों के खंड 14 का हवाला दिया। इसके तहत कंपनी को बिना कारण बताए अपने विवेक से विज्ञापन रद्द करने का अधिकार था।

    कॉर्पोरेशन ने यह भी दलील दी कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 2(2) के तहत 6 मार्च 2018 को जारी अधिसूचना के माध्यम से संबंधित सड़क को राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित किया जा चुका था। यह अधिसूचना विज्ञापन जारी होने से पहले की थी, इसलिए संबंधित स्थान के लिए विज्ञापन जारी करना त्रुटिपूर्ण था।

    कॉर्पोरेशन की ओर से यह भी कहा गया कि आशय पत्र अपने आप में अंतिम और बाध्यकारी प्रस्ताव नहीं होता, जब तक प्रस्ताव को बिना किसी शर्त के स्वीकार न कर लिया जाए और निर्धारित पूर्व शर्तें पूरी न हो जाएं।

    हाईकोर्ट ने माना कि विज्ञापन की शर्तों के खंड 14 के तहत कॉर्पोरेशन को विज्ञापन वापस लेने का अधिकार था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आशय पत्र अपने आप में पक्का प्रस्ताव नहीं होता। हालांकि, इसके जरिए ऐसा आश्वासन दिया गया था, जिसके आधार पर याचिकाकर्ता ने कदम उठाए और निवेश किया। इससे उसके पक्ष में वैध अपेक्षा का सिद्धांत लागू होता है।

    बेंच ने कहा कि संबंधित स्थान को पहले ही राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित किए जाने के बावजूद विज्ञापन जारी करना अधिकारियों की गलती थी। चूंकि याचिकाकर्ता ने किसी शर्त का उल्लंघन नहीं किया था, इसलिए उसे अपने निवेश के नुकसान की भरपाई के बिना नहीं छोड़ा जा सकता।

    कोर्ट ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता ने 1 फरवरी 2019 से 11 मार्च 2021 के बीच किए गए 15,78,486 रुपये के खर्च का पूरा विवरण रिकॉर्ड पर रखा था। उसने विकसित की गई साइट की तस्वीर भी पेश की। कॉर्पोरेशन ने अपने जवाबी हलफनामे में इन खर्चों का विशेष रूप से खंडन नहीं किया।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कॉर्पोरेशन को निर्देश दिया कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तारीख से एक महीने के भीतर याचिकाकर्ता को 15,78,486 रुपये का भुगतान किया जाए। निर्धारित समय में भुगतान नहीं होने पर वास्तविक भुगतान तक आठ प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज भी देना होगा।


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