पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट के बावजूद केस डायरी में प्रथमदृष्टया अपराध हो तो आरोपी को समन कर सकता है मजिस्ट्रेट: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

9 Sept 2026 12:12 PM IST

  • पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट के बावजूद केस डायरी में प्रथमदृष्टया अपराध हो तो आरोपी को समन कर सकता है मजिस्ट्रेट: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस जांच के बाद अंतिम रिपोर्ट यानी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करती है, लेकिन केस डायरी में प्रथमदृष्टया अपराध किए जाने का पर्याप्त आधार मौजूद है तो मजिस्ट्रेट पुलिस की रिपोर्ट को अस्वीकार कर आरोपी के खिलाफ संज्ञान लेते हुए उसे समन कर सकता है। इसके लिए मजिस्ट्रेट को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 200 और 202 के तहत शिकायत मामले की प्रक्रिया अपनाना जरूरी नहीं है।

    जस्टिस संदीप जैन ने सुप्रीम कोर्ट के राकेश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, विष्णु कुमार तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, सोनू गुप्ता बनाम दीपक गुप्ता और गुजरात राज्य बनाम अफरोज मोहम्मद हसनफत्ता के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस रिपोर्ट में भले ही आरोपी के खिलाफ कोई मामला नहीं बनने की बात कही गई हो, मजिस्ट्रेट धारा 190(1)(बी) के तहत उपलब्ध सामग्री के आधार पर अपराध का संज्ञान लेकर आरोपी को समन कर सकता है।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संज्ञान लेने और समन जारी करने के चरण में मजिस्ट्रेट को केवल यह देखना होता है कि आरोपी के खिलाफ आगे कार्यवाही के लिए प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं। इस स्तर पर आरोपी के बचाव, उसके पक्ष की सामग्री या मामले के गुण-दोष का विस्तृत मूल्यांकन करना जरूरी नहीं है।

    मामला जीतू सोनी की ओर से दाखिल याचिका से जुड़ा था। उन्होंने 18 मार्च 2015 को औरैया जिले के बिधूना थाने में सतेंद्र उर्फ चुनमुन और नारायण के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 के तहत FIR दर्ज कराई।

    शिकायतकर्ता के अनुसार, वह अपने पिता और भाइयों के साथ आभूषण की दुकान से घर लौट रहे थे। इसी दौरान दोनों आरोपी लाल रंग की पल्सर मोटरसाइकिल पर आए और पुरानी रंजिश के चलते उनके भाई अनिल सोनी पर गोली चला दी।

    अनिल सोनी का उसी दिन चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया, जिसमें गोली से लगी चोट की पुष्टि हुई। घायल और शिकायतकर्ता के धारा 161 के बयानों में दोनों आरोपियों के नाम भी सामने आए। इसके बावजूद विवेचक ने अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी। इसके खिलाफ शिकायतकर्ता ने आपत्ति याचिका दाखिल की।

    न्यायिक मजिस्ट्रेट, औरैया ने 10 जनवरी 2019 को आपत्ति याचिका स्वीकार करते हुए धारा 190(1)(बी) के तहत संज्ञान लिया और दोनों आरोपियों को समन जारी कर दिया। आरोपियों ने इसके खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दाखिल की। सेशन जज, औरैया ने 15 जुलाई 2019 को मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द करते हुए मामला दोबारा विचार के लिए भेज दिया। इसका मुख्य आधार यह था कि मजिस्ट्रेट ने केस डायरी की सामग्री के आधार पर धारा 307 के तहत अपराध बनने के संबंध में स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज नहीं किया।

    इसके बाद शिकायतकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया। आरोपियों की ओर से सुनवाई में कोई पेश नहीं हुआ और उनकी तरफ से जवाबी हलफनामा भी दाखिल नहीं किया गया।

    हाईकोर्ट ने केस डायरी में मौजूद सामग्री की जांच करते हुए पाया कि मेडिकल रिपोर्ट में गोली से लगी चोट दर्ज थी। घायल ने बताया कि उसने उपलब्ध रोशनी में दोनों आरोपियों को देखा और उनकी आवाज से भी उनकी पहचान की। उसने यह भी बताया कि भागने से पहले आरोपियों ने उसका बैग छीनने की कोशिश की। शिकायतकर्ता के बयान से भी इस घटना की पुष्टि होती थी।

    कोर्ट ने कहा कि केस डायरी में IPC की धारा 307 के तहत अपराध किए जाने का पर्याप्त प्रथमदृष्टया आधार मौजूद था। समन जारी करने के चरण में आरोपियों के बचाव की दलील या उनके पक्ष की सामग्री की जांच करने की आवश्यकता नहीं थी।

    हाईकोर्ट ने कहा कि निचली पुनरीक्षण अदालत ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश में हस्तक्षेप कर गलती की, जिसके जरिए आरोपियों को मुकदमे का सामना करने के लिए समन किया गया।

    कोर्ट ने सेशन जज का 15 जुलाई 2019 का आदेश रद्द करते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपियों को समन जारी करने का आदेश बहाल किया। इसके साथ ही संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दाखिल याचिका को मंजूर कर लिया।

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