राज्य अपनी जमीन होने के आधार पर प्राकृतिक जलस्रोतों को मनमाने ढंग से नष्ट या स्थानांतरित नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
3 Nov 2026 12:37 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य किसी मौजूदा तालाब को उसके बदले दूसरी जमीन देने की पेशकश करके न तो स्थानांतरित कर सकता है और न ही उसका विनिमय कर सकता है। तालाब की जमीन पर फायर स्टेशन का निर्माण और उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 161 के तहत जमीन का विनिमय सुप्रीम कोर्ट के हिंच लाल तिवारी बनाम कमला देवी मामले में निर्धारित कानून के तहत प्रतिबंधित है।
जस्टिस प्रशांत कुमार ने कहा कि राज्य के नाम संपत्ति दर्ज होने मात्र से उसे किसी प्राकृतिक जलस्रोत को नष्ट करने, बेचने, उसका स्वरूप बदलने या उसका विनिमय करने का असीमित अधिकार नहीं मिल जाता। तालाब का सूखना, उसका क्षरण, अतिक्रमण या उसकी भौतिक स्थिति में बदलाव अधिकारियों को उस जमीन को सामान्य संपत्ति मानकर मनमाने ढंग से इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देता। इसके बजाय, अधिकारियों का दायित्व जलस्रोत की रक्षा करना और जरूरत पड़ने पर उसे पुनर्जीवित करना है।
मामले के अनुसार, वर्ष 1987-88 में अंबेडकर नगर के आलापुर तहसील स्थित अछती गांव में एक संपर्क मार्ग बनाया गया, जो मनराज कुमारी की जमीन से होकर गुजरता था। 22 मार्च 1988 के आदेश के जरिए उपजिलाधिकारी, आलापुर ने सड़क में इस्तेमाल की गई जमीन का अधिग्रहण करने और इसके बदले उन्हें ग्राम सभा अछती की आबादी में वैकल्पिक जमीन देने का प्रस्ताव रखा। 15 अक्टूबर 1988 को जमीन के विनिमय का निर्णय लिया गया।
इसके बाद 14 मई 1990 को मनराज कुमारी ने विनिमय में मिली जमीन, गाटा संख्या 112 (मिनजुमला), जिसका क्षेत्रफल 9 बिस्वा था, मौजूदा प्रतिवादियों को रजिस्टर्ड बिक्री विलेख के जरिए बेच दी।
प्रतिवादियों के नाम हस्तांतरणीय अधिकारों वाले भूमिधर के रूप में दर्ज किए गए और उन्होंने वहां पांच कमरों का मकान तथा चारदीवारी बनवाई।
बाद में तहसीलदार ने राजस्व रिकॉर्ड से उनके नाम हटा दिए, लेकिन इस आदेश को निरस्त कर दिया गया। वर्ष 2007 में राज्य ने यह दावा करते हुए उक्त जमीन पर फायर स्टेशन का निर्माण शुरू किया कि वह तालाब की जमीन है।
प्रतिवादियों ने स्थायी निषेधाज्ञा और बेदखली के खिलाफ दीवानी मुकदमा दायर किया। अंबेडकर नगर के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) ने 5 नवंबर 2015 को उन्हें जमीन का मालिक और कब्जाधारी मानते हुए उनके पक्ष में फैसला सुनाया।
इसके बाद अतिरिक्त जिला जज ने 30 जुलाई 2018 को राज्य की पहली अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि फैजाबाद मंडल के अतिरिक्त आयुक्त द्वारा समुद्रा देवी का नाम बहाल करने का आदेश अंतिम हो चुका था।
राज्य ने सीपीसी की धारा 100 के तहत दूसरी अपील दायर की, जिसे कानून के नौ महत्वपूर्ण सवालों पर स्वीकार किया गया।
राज्य की ओर से दलील दी गई कि गाटा संख्या 112 राजस्व रिकॉर्ड में तालाब की जमीन के रूप में दर्ज है और ग्राम पंचायत के प्रबंधन में राज्य में निहित है।
प्रतिवादियों के पक्ष में की गई प्रविष्टियां कथित तौर पर धोखाधड़ी से हासिल की गई थीं और जांच के बाद रद्द कर दी गई थीं। राज्य ने कहा कि तालाब की जमीन पर भूमिधरी अधिकार नहीं मिल सकते, इसलिए उसका आवंटन या विनिमय भी वैध नहीं था।
राज्य ने यह भी दलील दी कि तालाब सार्वजनिक उपयोग की जमीन है और उसे किसी अन्य सार्वजनिक उपयोग के लिए आवंटित किया जा सकता है। इसके लिए उसने राजस्व संहिता की धारा 77(2) और जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले का हवाला दिया।
साथ ही, राज्य ने तर्क दिया कि कृषि भूमि के स्वामित्व से जुड़े विवाद राजस्व अदालत के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, इसलिए अधिनियम की धारा 331 के तहत दीवानी मुकदमा सुनवाई योग्य नहीं था।
प्रतिवादियों ने इसके जवाब में कहा कि दूसरी अपील में विचार के लिए कानून का कोई महत्वपूर्ण सवाल नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य का पूरा मामला इस गलत धारणा पर आधारित है कि मौजूदा तालाब उसकी सामान्य जमीन की तरह है। जमीन का तालाब होना ही इस मामले में निर्णायक तथ्य है। प्राकृतिक जलस्रोत केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि समुदाय का संसाधन है, जिसका पारिस्थितिक महत्व और सार्वजनिक उपयोगिता है। राज्य के नाम जमीन दर्ज होने से उसे इस पर असीमित अधिकार नहीं मिल जाता।
कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक जलस्रोत केवल इसलिए किसी सामान्य जमीन के बराबर विनिमय योग्य नहीं हो जाता, क्योंकि राज्य उसके बदले दूसरी जमीन देने या लेने का फैसला करता है।
एमसी मेहता बनाम कमलनाथ मामले में मान्यता प्राप्त सार्वजनिक न्यास सिद्धांत का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य ऐसे संसाधनों का मालिक किसी निजी संपत्ति के मालिक की तरह असीमित अधिकारों के साथ नहीं होता।
हिंच लाल तिवारी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तालाबों और जलाशयों को प्रकृति की देन मानते हुए उनके संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया था। राज्य उस जलस्रोत के क्षरण का लाभ नहीं उठा सकता, जिसकी रक्षा करना उसका अपना दायित्व है।
कोर्ट ने कहा कि राज्य पहले किसी मौजूदा प्राकृतिक संसाधन को नष्ट या स्थानांतरित करके बाद में यह दावा नहीं कर सकता कि दूसरी जमीन को तालाब के रूप में चिन्हित कर देने से सार्वजनिक हित सुरक्षित हो गया। असली सवाल यह है कि क्या राज्य के पास पहले से मौजूद सामुदायिक जलस्रोत को नष्ट या स्थानांतरित करने का कानूनी अधिकार था।
इन सवालों का जवाब राज्य के खिलाफ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि तालाब की जमीन पर फायर स्टेशन का निर्माण और धारा 161 के तहत उसका विनिमय हिंच लाल तिवारी फैसले के तहत प्रतिबंधित है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य केवल राजस्व रिकॉर्ड से प्रतिवादियों के नाम हटाकर उन्हें जमीन से बेदखल नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रतिवादियों को उनकी मूल जमीन और बदले में दी गई जमीन, दोनों से वंचित नहीं किया जा सकता। आवंटन रद्द करने या बेदखली की कोई भी कार्रवाई कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही की जानी चाहिए। राज्य की एस्टॉपेल यानी प्रतिषेध की दलील भी स्वीकार नहीं की गई, क्योंकि इसके आवश्यक तत्व मौजूद नहीं थे।
मंगू सिंह एवं अन्य बनाम राम औतार मामले का अनुसरण करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि मुकदमा दीवानी अदालत में सुनवाई योग्य था। दूसरी अपील में कोई दम नहीं पाते हुए कोर्ट ने उसे खारिज किया।

