टैंकर में खतरनाक पदार्थ था यह साबित किए बिना बीमा कंपनी लाइसेंस की कमी का हवाला नहीं दे सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • टैंकर में खतरनाक पदार्थ था यह साबित किए बिना बीमा कंपनी लाइसेंस की कमी का हवाला नहीं दे सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना के मुआवजे से जुड़ी जिम्मेदारी से बीमा कंपनी केवल यह कहकर बच नहीं सकती कि चालक के ड्राइविंग लाइसेंस पर खतरनाक या जोखिमपूर्ण पदार्थों के परिवहन की अनुमति संबंधी विशेष प्रविष्टि नहीं थी। इसके लिए बीमा कंपनी को पहले यह साबित करना होगा कि दुर्घटना के समय टैंकर में वास्तव में वही पदार्थ ले जाया जा रहा था, जिसे केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के तहत खतरनाक पदार्थ की श्रेणी में रखा गया।

    जस्टिस प्रशांत कुमार ने कहा,

    “केवल इस आधार पर कि टैंकर में स्पिरिट ले जाई जा रही थी, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह नियमों के अर्थ में खतरनाक पदार्थ का परिवहन कर रहा था।”

    मामला 27 मार्च 2015 का है। महेंद्र कुमार मोटरसाइकिल से घर लौट रहे थे और उनके साथ एक व्यक्ति पीछे बैठा था। सुल्तानपुर जिले के कमता बाजार के पास एक टैंकर ने तेज और लापरवाही से वाहन चलाते हुए उनकी मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी। हादसे में महेंद्र कुमार की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि पीछे बैठे व्यक्ति को गंभीर चोटें आईं।

    महेंद्र कुमार की उम्र 28 वर्ष थी और वह एक इंटरमीडिएट कॉलेज में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे। उनकी मासिक आय 17 हजार रुपये थी।

    परिजनों की ओर से दाखिल मुआवजा याचिका पर सुल्तानपुर के मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने माना कि हादसा पूरी तरह टैंकर चालक की तेज और लापरवाही से वाहन चलाने के कारण हुआ। अधिकरण ने यह भी माना कि मृतक की ओर से कोई लापरवाही नहीं थी तथा टैंकर विधिवत पंजीकृत और बीमित था। चालक के पास भी वैध ड्राइविंग लाइसेंस था।

    28 मार्च 2019 को अधिकरण ने परिजनों को 19 लाख 4 हजार रुपये का मुआवजा 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ देने का आदेश दिया।

    इस आदेश के खिलाफ नेशनल इंश्योरेंस कंपनी ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (MV Act) की धारा 173 के तहत हाईकोर्ट में अपील की। बीमा कंपनी की दलील थी कि चालक के पास भारी मालवाहक वाहन चलाने का वैध लाइसेंस तो था, लेकिन खतरनाक या जोखिमपूर्ण पदार्थ ले जाने के लिए आवश्यक विशेष प्रविष्टि नहीं थी।

    बीमा कंपनी ने सूचना के अधिकार के तहत क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी से मिले 28 अगस्त 2018 के जवाब का हवाला दिया। कंपनी का कहना था कि टैंकर में स्पिरिट ले जाई जा रही थी, जो एथेनॉल है और केंद्रीय मोटर वाहन नियमों की तालिका-3 में एथेनॉल से संबंधित कुछ पदार्थों को खतरनाक पदार्थों की श्रेणी में रखा गया। इसलिए चालक के लाइसेंस में आवश्यक प्रविष्टि नहीं होना बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन है।

    मुआवजा पाने वाले परिजनों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि केवल स्पिरिट ले जाए जाने से यह नहीं माना जा सकता कि वह नियमों के तहत खतरनाक पदार्थ था। उनका कहना था कि तालिका-3 में एथेनॉल से संबंधित कुछ विशेष मिश्रणों को ही शामिल किया गया और बीमा कंपनी ने मुआवजा देने से बचने के लिए यह आपत्ति बाद में उठाई।

    हाईकोर्ट ने कहा कि क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी की ओर से दी गई जानकारी से केवल इतना साबित होता है कि चालक के लाइसेंस पर खतरनाक पदार्थों के परिवहन के लिए अलग प्रविष्टि नहीं थी। उसी जवाब में यह भी प्रमाणित किया गया कि दुर्घटना की तारीख को चालक के पास भारी मालवाहक वाहन चलाने का वैध लाइसेंस था।

    अदालत ने कहा कि केवल टैंकर में स्पिरिट ले जाए जाने से यह साबित नहीं होता कि उसमें नियमों के तहत खतरनाक पदार्थ ही ले जाया जा रहा था। परिवहन संबंधी दस्तावेजों में केवल स्पिरिट ले जाए जाने का उल्लेख था। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं था, जिससे यह पता चले कि टैंकर में मौजूद पदार्थ केंद्रीय मोटर वाहन नियमों की तालिका-3 में निर्धारित किसी विशेष श्रेणी में आता है।

    जस्टिस प्रशांत कुमार ने कहा,

    “जब तक यह साबित करने वाला कोई साक्ष्य नहीं है कि परिवहन किया जा रहा विशेष पदार्थ तालिका-3 की क्रम संख्या 851 से 853 में उल्लिखित एथेनॉल की किसी निर्धारित श्रेणी में आता था, तब तक यह नहीं माना जा सकता कि वाहन खतरनाक पदार्थ ले जा रहा था और चालक के लाइसेंस पर विशेष प्रविष्टि जरूरी थी।”

    हाईकोर्ट ने माना कि बीमा कंपनी पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन साबित करने में विफल रही है। अदालत को मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के निष्कर्षों में कोई कानूनी त्रुटि नहीं मिली।

    इसके साथ ही हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी की अपील खारिज की और निर्देश दिया कि यदि अपीलकर्ता ने कोई वैधानिक राशि जमा की है तो उसे कानून के अनुसार समायोजन के लिए संबंधित अधिकरण को भेजा जाए।

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