RTE के शिक्षक-छात्र अनुपात से शिक्षकों की स्थानांतरण नीति को चुनौती नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

13 Aug 2026 3:27 PM IST

  • RTE के शिक्षक-छात्र अनुपात से शिक्षकों की स्थानांतरण नीति को चुनौती नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी शिक्षक को स्थानांतरण का कोई अंतर्निहित वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है। स्थानांतरण के मामले में शिक्षक को वही अधिकार मिल सकते हैं, जो सरकार की स्थानांतरण नीति के तहत दिए गए हों।

    कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के अंतर-जिला स्थानांतरण की नीति लागू करने के लिए तैयार की गई जिला-वार छात्र-शिक्षक अनुपात की सूची का शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की अनुसूची से कोई संबंध नहीं है।

    जस्टिस पंकज भाटिया ने कहा कि RTE Act में शिक्षकों के पक्ष में कोई अधिकार निर्धारित नहीं किया गया। अधिनियम में शिक्षकों के कर्तव्यों का उल्लेख है और उनकी सेवा शर्तों को अधिनियम की धारा 23 के प्रावधानों के अनुरूप रखने की बात कही गई।

    कोर्ट ने कहा कि शिक्षकों का स्थानांतरण किसी नियम से स्वतः उत्पन्न होने वाला अधिकार नहीं है बल्कि संबंधित सरकारी आदेश के तहत राज्य सरकार द्वारा बनाई गई नीति का परिणाम है।

    मामला उन सहायक अध्यापकों से जुड़ा था, जिन्हें संबंधित प्राधिकरणों द्वारा संचालित विद्यालयों में नियुक्त किया गया और उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा के शिक्षकों की पदस्थापना से संबंधित नियमों के तहत अलग-अलग जिलों में तैनाती दी गई। इन नियमों के तहत उनके पद सामान्य परिस्थितियों में स्थानांतरण योग्य नहीं थे सिवाय उन परिस्थितियों के जिनमें संबंधित नियम या सेवा नियम इसकी अनुमति देते हैं।

    उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा (शिक्षकों की पदस्थापना) नियमावली, 2008 के नियम 8(2)(घ) के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में नियुक्ति के पांच वर्ष के भीतर अंतर-जिला स्थानांतरण के आवेदन पर विचार नहीं किया जाता। हालांकि विशेष परिस्थितियों में महिला शिक्षकों के आवेदन पर उस जिले में स्थानांतरण किया जा सकता है जहां उनके पति या ससुराल वाले रहते हों।

    वहीं उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा (शिक्षक) सेवा नियमावली, 1981 के नियम 21 के तहत किसी शिक्षक को एक स्थानीय क्षेत्र या जिले से दूसरे स्थानीय क्षेत्र या जिले में उसके अनुरोध या सहमति के बिना स्थानांतरित नहीं किया जा सकता और ऐसे स्थानांतरण के लिए बोर्ड की मंजूरी भी आवश्यक है।

    राज्य सरकार ने 4 जून 2026 को एक शासनादेश जारी कर शैक्षणिक सत्र 2026-27 में मानवीय आधार और विशेष परिस्थितियों में शिक्षकों के अंतर-जिला स्थानांतरण की अनुमति देने का नीतिगत निर्णय लिया। इसके तहत पांच श्रेणियों में आने वाले शिक्षकों को स्थानांतरण का अवसर दिया गया।

    इनमें एक श्रेणी ऐसी थी जिसमें यदि पति और पत्नी दोनों बेसिक शिक्षा विभाग के विद्यालयों में शिक्षक हैं। उनमें से कोई एक स्थानांतरण के लिए आवेदन करता है तो ऐसे शिक्षक को उस जिले में स्थानांतरित किया जा सकता है जहां छात्र-शिक्षक अनुपात कम हो।

    इसके बाद 22 जून 2026 को एक अन्य शासनादेश जारी कर 4 जून के आदेश को स्पष्ट किया गया। इसके साथ जिला-वार छात्र-शिक्षक अनुपात की सूची भी संलग्न की गई। स्थानांतरण के लिए आवेदन करने की समय-सीमा बाद में बढ़ाकर 5 अगस्त 2026 कर दी गई।

    याचिकाकर्ता शिक्षकों ने जिला-वार छात्र-शिक्षक अनुपात की सूची को मनमाना और अवैध बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका तर्क था कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम और उसकी अनुसूची के अनुसार छात्र-शिक्षक अनुपात का निर्धारण विद्यालय और कक्षा के स्तर पर होना चाहिए। राज्य द्वारा जिला-वार अनुपात तय करने से उनके लिए शासनादेश के तहत उपलब्ध स्थानांतरण के विकल्प सीमित हो गए।

    इस दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 21-ए को प्रभावी बनाने के लिए बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने सोसायटी फॉर अनएडेड प्राइवेट स्कूल्स ऑफ राजस्थान बनाम भारत संघ मामले में भी स्पष्ट किया कि इस अधिनियम का उद्देश्य केवल शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करना नहीं बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है और इसके लिए अनुसूची में निर्धारित छात्र-शिक्षक अनुपात बनाए रखना आवश्यक है।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि RTE Act की पूरी व्यवस्था को देखने पर यह स्पष्ट है कि वह शिक्षकों को स्थानांतरण का कोई अधिकार प्रदान नहीं करता। शिक्षकों का स्थानांतरण राज्य सरकार द्वारा 4 जून 2026 के शासनादेश के माध्यम से बनाई गई नीति का हिस्सा है।

    जस्टिस पंकज भाटिया ने कहा,

    “RTE Act में शिक्षकों के पक्ष में कोई अधिकार नहीं है। स्थानांतरण का निर्णय भी नियमों से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि शासनादेश में निर्धारित श्रेणियों के शिक्षकों को स्थानांतरण की सुविधा देने के लिए राज्य द्वारा लिया गया नीतिगत निर्णय है।”

    कोर्ट ने कहा कि जब किसी शिक्षक को किसी कानून के तहत स्थानांतरण का अंतर्निहित अधिकार ही प्राप्त नहीं है, तो इस मामले में उसके अधिकार केवल राज्य सरकार की 4 जून 2026 की नीति से तय होंगे।

    जिला-वार छात्र-शिक्षक अनुपात की सूची के संबंध में अदालत ने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य RTE Act की अनुसूची के तहत निर्धारित अनुपात को लागू करना नहीं है। यह सूची केवल राज्य सरकार को यह तय करने में सुविधा देने के लिए तैयार की गई कि पति-पत्नी में से कोई शिक्षक किस जिले में स्थानांतरण के लिए आवेदन कर सकता है और संबंधित जिले में शिक्षकों की संख्या के आधार पर उसका आवेदन स्वीकार किया जाए या नहीं।

    अदालत ने कहा कि स्थानांतरण जिला-वार किया जाना है, विद्यालय-वार नहीं। इसलिए किसी शिक्षक का स्थानांतरण आवेदन स्वीकार होने की स्थिति में भी वह किसी विशेष विद्यालय में नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता, बल्कि केवल संबंधित जिले में स्थानांतरण के लिए विचार किए जाने का हकदार होगा।

    कोर्ट ने कहा,

    “राज्य सरकार की नीति में ऐसा कोई दोष नहीं है, जिसमें न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता हो। याचिकाकर्ताओं के दावे को RTE Act की अनुसूची से जोड़ना गलत है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

    हाईकोर्ट ने शिक्षकों की याचिका खारिज की। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने जिला-वार छात्र-शिक्षक अनुपात की सूची को RTE Act के तहत निर्धारित शिक्षक-छात्र अनुपात की आवश्यकता के लिए मान्य नहीं किया। यह सूची केवल राज्य सरकार की स्थानांतरण नीति को लागू करने के उद्देश्य से तैयार की गई।

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