हाईकोर्ट मौखिक दलील के आधार पर किसी तीसरे पक्ष की पात्रता तय नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिंगल जज का आदेश आंशिक रूप से पलटा
Amir Ahmad
31 Oct 2026 1:02 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी रिट याचिका का फैसला ऐसे विवादित या अप्रमाणित तथ्यों पर निर्भर करता है, जिनसे किसी तीसरे पक्ष की पात्रता प्रभावित होती है, तो कोर्ट को आमतौर पर संबंधित पक्ष से जवाबी हलफनामा मंगाना चाहिए। किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ तथ्यात्मक निष्कर्ष दर्ज नहीं किया जाना चाहिए, जिसे अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिला हो।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए सिंगल जज का आदेश आंशिक रूप से रद्द किया।
कोर्ट ने कहा कि चीफ टाउन एंड कंट्री प्लानर के पद का कार्यवाहक प्रभार पाने वाले अधिकारी की पात्रता केवल अदालत में मौखिक रूप से दी गई दलील के आधार पर तय नहीं की जा सकती, खासकर तब जब उस दावे के समर्थन में कोई हलफनामा या प्रमाणपत्र पेश न किया गया हो।
मामले में अपीलकर्ता अशोक कुमार, नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर हैं। उन्होंने 4 नवंबर 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत चीफ टाउन एंड कंट्री प्लानर के पद का कार्यवाहक प्रभार प्रतिवादी नंबर 4, जो आर्किटेक्ट प्लानर हैं, को सौंपा गया था।
उत्तर प्रदेश नगर एवं ग्राम नियोजन सेवा नियम, 1987 के तहत इस पद को सीनियर प्लानर्स में से पदोन्नति के जरिए भरा जाना है। नियमों के परिशिष्ट 'बी' में इसके लिए टाउन एंड कंट्री प्लानिंग में डिग्री या पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा निर्धारित किया गया।
सिंगल जज ने 9 दिसंबर 2025 को याचिका खारिज की थी। कोर्ट ने कहा था कि परिशिष्ट 'बी' में किसी अन्य योग्यता को समकक्ष मानने का प्रावधान नहीं है और नियम बनाने वाले प्राधिकरण ने जो शर्त शामिल नहीं की है, उसे अदालत अपनी ओर से नहीं जोड़ सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) द्वारा इंस्टीट्यूट ऑफ टाउन प्लानर्स, इंडिया की एसोसिएटशिप परीक्षा को प्लानिंग में मास्टर डिग्री के समकक्ष मानने संबंधी स्पष्टीकरण केंद्र सरकार की सेवा के संदर्भ में था। किसी कानून के खिलाफ एस्टॉपल का सिद्धांत लागू नहीं होता। हालांकि, राज्य सरकार को छह महीने के भीतर सीनियर प्लानर के पद के लिए विभागीय पदोन्नति समिति गठित करने का निर्देश दिया गया।
अपील में अशोक कुमार की ओर से दलील दी गई कि रिट याचिका को जवाबी हलफनामा मंगाए बिना शुरुआती चरण में ही खारिज कर दिया गया। प्रतिवादी नंबर 4 की निर्धारित योग्यता पूरी होने का निष्कर्ष केवल अपर महाधिवक्ता की मौखिक दलील पर आधारित था।
अपील के दौरान पहली बार पेश किए गए प्रमाणपत्र में प्रतिवादी नंबर 4 की योग्यता बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय से अर्बन डेवलपमेंट प्लानिंग में मास्टर डिग्री बताई गई थी।
अपीलकर्ता का तर्क था कि यह परिशिष्ट 'बी' में निर्धारित योग्यता नहीं है। राज्य सरकार ने भी इस तथ्य का गंभीरता से विरोध नहीं किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि जिस आधार पर सिंगल जज का फैसला टिका था, वह प्रमाणपत्र सामने आने के बाद गलत साबित हो गया।
खंडपीठ ने कहा कि यदि कोई निष्कर्ष ऐसे आधार पर टिका हो, जिसे बाद में गलत दिखाया गया, तो उसके आधार पर पक्षकारों के अधिकारों का अंतिम निर्धारण नहीं किया जा सकता। निष्पक्षता की न्यूनतम मांग है कि मामले पर सत्यापित सामग्री के आधार पर दोबारा विचार किया जाए।
कोर्ट ने कहा कि जवाबी हलफनामा नहीं मंगाए जाने के कारण अपीलकर्ता को प्रतिवादी नंबर 4 की योग्यता संबंधी दलील का जवाब देने का अवसर नहीं मिला। साथ ही, जिस योग्यता के आधार पर अपीलकर्ता को अयोग्य माना गया, उसी कसौटी पर प्रतिवादी नंबर 4 की पात्रता की जांच नहीं की गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति या उसके मूल मामले को ऐसे तथ्यात्मक निष्कर्ष के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता, जिसके समर्थन में मौजूद सामग्री पर उसे अपना पक्ष रखने का अवसर ही न मिला हो।
कोर्ट ने जाहूर अहमद रादर बनाम शेख इम्तियाज अहमद और बेदंगा तालुकदार बनाम सैफुद्दुल्लाह खान मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख किया। इन फैसलों के अनुसार, किसी पद के लिए निर्धारित पात्रता और योग्यता की सख्ती से जांच की जानी चाहिए।
खंडपीठ ने कहा कि जब सिंगल जज ने समकक्ष योग्यता के दावे को स्वीकार नहीं किया, तो उनके लिए यह जांचना भी जरूरी था कि प्रतिवादी नंबर 4 के पास नियमों में स्पष्ट रूप से निर्धारित वही योग्यता है या नहीं।
कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता की योग्यता की जांच में सख्त मानक अपनाने के बाद प्रतिवादी नंबर 4 की योग्यता को बिना सत्यापन केवल मौखिक दलील के आधार पर स्वीकार करना असंगत है।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने विशेष अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली। कोर्ट ने 9 दिसंबर 2025 के आदेश को प्रार्थना संख्या 1 और 2 खारिज किए जाने की सीमा तक रद्द कर दिया और रिट याचिका को उसी सीमा तक नए सिरे से विचार के लिए बहाल किया।
राज्य सरकार और संबंधित पक्षों को तीन सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने तथा उसके बाद याचिकाकर्ता को एक सप्ताह में प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया। हालांकि, विभागीय पदोन्नति समिति गठित करने का सिंगल जज का निर्देश बरकरार रखा गया।
कोर्ट ने मौजूदा कार्यवाहक व्यवस्था को भी मामले के अंतिम परिणाम के अधीन जारी रहने की अनुमति दी। साथ ही स्पष्ट किया कि इससे प्रतिवादी नंबर 4 को कोई ऐसा अधिकार या लाभ नहीं मिलेगा, जिसके आधार पर वह पद पर बने रहने का दावा कर सकें।
यह देखते हुए कि अपीलकर्ता 31 दिसंबर 2026 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं, हाईकोर्ट ने सिंगल जज से अनुरोध किया कि बहाल की गई कार्यवाही पर यथासंभव दो महीने के भीतर फैसला किया जाए।

