निरसन कानून का लाभ नहीं मिलेगा यदि अतिरिक्त भूमि का कब्जा पहले ही लिया जा चुका हो, देरी से दायर याचिका भी खारिज: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

13 July 2026 7:19 PM IST

  • निरसन कानून का लाभ नहीं मिलेगा यदि अतिरिक्त भूमि का कब्जा पहले ही लिया जा चुका हो, देरी से दायर याचिका भी खारिज: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि शहरी भूमि (सीमा निर्धारण एवं विनियमन) अधिनियम, 1976 के तहत अतिरिक्त घोषित भूमि का कब्जा शहरी भूमि (सीमा निर्धारण एवं विनियमन) निरसन अधिनियम, 1999 लागू होने से पहले ही प्रशासन द्वारा ले लिया गया था, तो भू-स्वामी निरसन अधिनियम का लाभ लेकर उस भूमि पर अपना अधिकार बरकरार रखने का दावा नहीं कर सकता।

    हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कब्जा लिए जाने के कई वर्षों बाद ऐसे भूमि सीमा निर्धारण की कार्यवाही को चुनौती दी जाती है तो अत्यधिक देरी के आधार पर भी याचिका खारिज की जा सकती है।

    जस्टिस नीरज तिवारी और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए याचिका खारिज की

    पूरा मामला

    याचिकाकर्ताओं का कहना था कि कानपुर नगर के बरा सिरोही गांव स्थित चार भूखंडों की कुल 1.004 हेक्टेयर भूमि उनके पूर्वजों के नाम दर्ज थी। वर्ष 1976 के अधिनियम के तहत भूमि सीमा निर्धारण की कार्यवाही शुरू हुई, लेकिन उनका दावा था कि वे आज तक भूमि पर कब्जे में हैं और उन्हें कभी कोई मुआवजा भी नहीं मिला। इसलिए वर्ष 1999 के निरसन अधिनियम का संरक्षण उन्हें मिलना चाहिए।

    उन्होंने वर्ष 2000 के दो सरकारी आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि जिन मामलों में निरसन अधिनियम लागू होने तक सरकार ने भूमि का कब्जा नहीं लिया था, वहां भू-स्वामी कब्जे में बने रहेंगे।

    अपने कब्जे के समर्थन में याचिकाकर्ताओं ने सिंचाई रसीदें और भूमि के फोटोग्राफ भी प्रस्तुत किए। साथ ही राजस्व अभिलेखों से शहरी भूमि सीमा निर्धारण संबंधी प्रविष्टियां हटाने और उन्हें बेदखल करने पर रोक लगाने की मांग की।

    राज्य सरकार ने बताया कि याचिकाकर्ताओं ने अधिनियम, 1976 की धारा 6(1) के तहत आवश्यक विवरण प्रस्तुत नहीं किया। इसके बाद वैधानिक प्रक्रिया पूरी करते हुए 31 मार्च 1997 को भूमि को अतिरिक्त घोषित किया गया।

    इसके बाद धारा 10(3) की अधिसूचना जारी हुई और धारा 10(5) के तहत कब्जा सौंपने का नोटिस दिया गया। जब भूमि स्वामियों ने कब्जा नहीं सौंपा तो 11 फरवरी 1999 को धारा 10(6) के तहत दखलनामा तैयार कर भूमि का कब्जा ले लिया गया। यह पूरी प्रक्रिया निरसन अधिनियम, 1999 लागू होने से पहले पूरी हो चुकी थी।

    सरकार ने यह भी बताया कि बाद में भूमि कानपुर विकास प्राधिकरण को हस्तांतरित कर दी गई, राजस्व अभिलेखों में उसका नाम दर्ज हुआ और वहां "जवाहरपुरम" आवासीय योजना विकसित कर भूखंडों का आवंटन भी कर दिया गया।

    हाईकोर्ट की टिप्पणी

    अदालत ने दखलनामे का परीक्षण करते हुए पाया कि उस पर कब्जा सौंपने वाले व्यक्ति और कब्जा लेने वाले नायब तहसीलदार, दोनों के हस्ताक्षर मौजूद थे।

    याचिकाकर्ताओं ने इन हस्ताक्षरों पर कोई विवाद नहीं किया, बल्कि केवल यह कहा कि दखलनामे पर गवाहों के हस्ताक्षर नहीं हैं।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि स्वयं याचिकाकर्ताओं ने स्वीकार किया कि वर्ष 1998 में राजस्व अभिलेखों में भूमि कानपुर विकास प्राधिकरण के नाम दर्ज हो गई थी।

    अदालत ने पूछा,

    "जब याचिकाकर्ताओं को वर्ष 1998 में ही यह जानकारी थी कि विवादित भूमि प्राधिकरण के नाम दर्ज हो चुकी है, तब उन्होंने याचिका दायर करने में 12 वर्ष का समय क्यों लिया?"

    पीठ ने यह भी माना कि सिंचाई रसीदें और फोटोग्राफ वास्तविक कब्जे का विश्वसनीय प्रमाण नहीं हैं।

    अदालत के अनुसार, केवल शुल्क जमा कर सिंचाई रसीद प्राप्त की जा सकती है और ये दस्तावेज राजस्व अभिलेखों का स्थान नहीं ले सकते।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के असम राज्य बनाम भास्कर ज्योति शर्मा फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि भूमि स्वामी समय रहते कब्जा लिए जाने की कार्रवाई को चुनौती नहीं देता, तो समय बीतने के साथ वह कार्रवाई वैधता प्राप्त कर लेती है और यह माना जाएगा कि उसने अपने अधिकार का परित्याग किया।

    इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि विवादित भूमि का कब्जा निरसन अधिनियम लागू होने से पहले ही कानपुर विकास प्राधिकरण को सौंपा जा चुका था और याचिकाकर्ताओं ने अत्यधिक विलंब से अदालत का दरवाजा खटखटाया। इसलिए उनकी याचिका खारिज कर दी गई।

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