असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती में कोर्ट खुद तय नहीं कर सकता कि कौन-सा विषय 'संबद्ध' है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
12 Oct 2026 12:12 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी अभ्यर्थी को यह अधिकार नहीं है कि भर्ती के लिए किसी विषय को एक बार संबद्ध या प्रासंगिक मान लिए जाने के बाद भविष्य की भर्तियों में भी उसे उसी रूप में मान्यता देने की मांग करे। संबद्ध विषयों की पहचान करना शैक्षणिक विशेषज्ञता और नीतिगत निर्णय का मामला है। अदालत सक्षम प्राधिकारी के निर्णय की जगह अपना शैक्षणिक आकलन नहीं रख सकती।
जस्टिस मंजू रानी चौहान ने कहा कि पहले किसी भर्ती में जैव प्रौद्योगिकी को प्राणी विज्ञान का संबद्ध या प्रासंगिक विषय मान लिया गया, अथवा दोनों विषयों के पाठ्यक्रम में पर्याप्त समानता है, तो इससे भविष्य में भी जैव प्रौद्योगिकी को संबद्ध विषय बनाए रखने का स्थायी अधिकार पैदा नहीं होता। सक्षम प्राधिकारी विशेषज्ञों की समीक्षा और लागू नियमों के दायरे में संबद्ध विषयों की पात्रता सूची में बदलाव कर सकता है।
उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग, प्रयागराज ने 8 सितंबर 2026 को विज्ञापन संख्या 4/2026 जारी किया। इसमें प्राणी विज्ञान के संबद्ध या प्रासंगिक विषयों के रूप में पशु विज्ञान, सूक्ष्मजीव विज्ञान, आणविक एवं मानव आनुवंशिकी, पर्यावरण विज्ञान, मत्स्य विज्ञान और जीवन विज्ञान को शामिल किया गया। जैव प्रौद्योगिकी को इस सूची में जगह नहीं दी गई, जबकि उसी विज्ञापन में उसे वनस्पति विज्ञान का संबद्ध या प्रासंगिक विषय माना गया।
याचिकाकर्ता के पास UGC से मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से 55 प्रतिशत से अधिक अंकों के साथ जैव प्रौद्योगिकी में एमएससी की डिग्री है। उन्होंने जीवन विज्ञान विषय में CMIR-UGC NET भी उत्तीर्ण किया। उन्होंने विज्ञापन के उस हिस्से को रद्द करने की मांग की, जिसमें जैव प्रौद्योगिकी को प्राणी विज्ञान का संबद्ध विषय नहीं माना गया। इसके साथ ही आयोग की 12 अगस्त 2026 की बैठक के कार्यवृत्त और 20 अगस्त 2026 के शासनादेश को भी चुनौती दी गई। इसी तरह की राहत के लिए 48 अन्य याचिकाकर्ताओं ने भी याचिका दायर की, जिसमें जैव प्रौद्योगिकी और जैव रसायन को संबद्ध विषय मानने की मांग की गई।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि जैव प्रौद्योगिकी जीवन विज्ञान की एक अंतर्विषयक शाखा है, जिसमें वनस्पति और प्राणी विज्ञान दोनों शामिल हैं। उनका दावा था कि इसके पाठ्यक्रम का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा प्राणी विज्ञान से मेल खाता है। उन्होंने 2018 के UGC विनियमों का हवाला देते हुए कहा कि संबंधित, प्रासंगिक या संबद्ध विषय में मास्टर डिग्री की पात्रता का प्रावधान है। इसलिए केवल विषय के नाम के आधार पर किसी अभ्यर्थी को अपात्र नहीं ठहराया जा सकता।
याचिकाकर्ताओं ने आयोग की 31 अगस्त 2021 की प्रेस विज्ञप्ति का भी हवाला दिया। विज्ञापन संख्या 50 और 51/2021 के तहत जारी इस विज्ञप्ति में जैव प्रौद्योगिकी को प्राणी विज्ञान का संबद्ध या प्रासंगिक विषय माना गया। यह व्यवस्था बाद में राज्य सरकार ने भी स्वीकार की थी। इसके अलावा, मनीष कुमार सोनकर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं तीन अन्य मामले का उल्लेख किया गया, जिसमें प्राणी विज्ञान में नियुक्ति के लिए जीवन विज्ञान विषय में नेट की योग्यता को प्रासंगिक माना गया।
आयोग की ओर से दलील दी गई कि मौजूदा पात्रता मानदंड 12 अगस्त 2026 को हुई विशेषज्ञ समिति की बैठक की सिफारिशों पर आधारित हैं, जिन्हें राज्य सरकार ने स्वीकार किया। आयोग ने केवल सरकार द्वारा निर्धारित मानदंडों को भर्ती विज्ञापन में शामिल किया। आयोग ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने मूल सरकारी निर्णय को चुनौती दिए बिना केवल विज्ञापन को चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट कई फैसलों में शैक्षणिक मामलों में विशेषज्ञों की राय में हस्तक्षेप करने के प्रति सावधानी बरतने की बात कह चुके हैं। अदालत की भूमिका यह जांचने तक सीमित है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया कानून के अनुरूप थी या नहीं। मौजूदा मामले में अदालत को ऐसा कोई वैधानिक उल्लंघन, स्पष्ट मनमानी, दुर्भावना या निर्णय में गंभीर तार्किक दोष नहीं मिला, जिसके आधार पर राज्य सरकार के फैसले में हस्तक्षेप किया जा सके।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सवाल यह नहीं है कि शैक्षणिक दृष्टि से कोई दूसरा मत भी संभव है या नहीं, बल्कि यह है कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण कानून की दृष्टि से अस्वीकार्य है या नहीं।
हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ के एक अंतरिम आदेश पर आधारित दलील को भी खारिज किया। उस आदेश में समान भर्ती प्रक्रिया के दौरान अभ्यर्थियों को अस्थायी रूप से शामिल होने की अनुमति दी गई। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा अंतरिम आदेश केवल अस्थायी संरक्षण देता है और उससे कोई ठोस या स्थायी अधिकार पैदा नहीं होता। किसी अन्य भर्ती प्राधिकरण द्वारा जैव प्रौद्योगिकी को संबद्ध विषय मान लेने से उत्तर प्रदेश में निर्धारित पात्रता अपने आप मनमानी नहीं हो जाती।
पहले की नीति से अलग रुख अपनाने के सवाल पर अदालत ने कहा कि नीति बनाने वाला सक्षम प्राधिकारी समीक्षा के बाद किसी नीति में बदलाव कर सकता है या उसे वापस ले सकता है। किसी पुरानी नीति से एक वर्ग को पहले लाभ मिला हो, तो केवल इसी आधार पर यह साबित नहीं होता कि नई नीति उस वर्ग के साथ भेदभाव करती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि नीति में बदलाव अपने आप में मनमानी नहीं है। संवैधानिक दृष्टि से समस्या तब होती है, जब बदलाव अप्रासंगिक कारणों पर आधारित हो, उसका कोई तार्किक आधार न हो, वह लागू कानून के विपरीत हो या न्यायिक समीक्षा के किसी मान्य आधार से दोषपूर्ण साबित हो।
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री पेश नहीं कर सके कि संबद्ध विषयों के संबंध में संशोधित व्यवस्था कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण है। इसलिए हाईकोर्ट ने शासनादेश में कोई अवैधता नहीं पाई और सभी रिट याचिकाएं खारिज कीं।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता संबद्ध विषयों से जुड़ी नीति पर पुनर्विचार के लिए राज्य सरकार के सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपनी शिकायत रख सकते हैं। इस संभावित पुनर्विचार के गुण-दोष पर हाईकोर्ट ने कोई राय व्यक्त नहीं की।

