गैंग चार्ट मंजूर करने में निष्पक्षता और विवेक का पालन न होने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SP-DM को फटकारा

  • गैंग चार्ट मंजूर करने में निष्पक्षता और विवेक का पालन न होने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SP-DM को फटकारा

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बहराइच के SP और DM को गैंग चार्ट मंजूर करने में संवैधानिक अदालतों के फैसलों में तय निष्पक्षता और विवेकपूर्ण निर्णय की अनदेखी करने पर कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि गैंग चार्ट को मंजूरी देते समय अधिकारियों को आरोपी के आपराधिक इतिहास और गतिविधियों पर विचार करने के साथ अपने विवेक का इस्तेमाल करना जरूरी है।

    जस्टिस मनीष माथुर की पीठ ने पाया कि वर्ष 2021 के एक मामले में गैंग चार्ट को मंजूरी देते समय न तो SP और न ही DM ने आरोपी के आपराधिक इतिहास पर विचार करने, किसी कारण या चर्चा करने अथवा अपने विवेक का इस्तेमाल करने का कोई संकेत दिया। कोर्ट ने इसके बाद गैंग चार्ट, आरोप पत्र, संज्ञान आदेश, समन आदेश और गैंगस्टर एक्ट के तहत शुरू हुई पूरी कार्यवाही रद्द की।

    कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे भविष्य में संवैधानिक अदालतों के फैसलों का पालन करें और राज्य की कार्रवाई में निष्पक्षता सुनिश्चित करें।

    मामला बहराइच जिले के एक थाने में वर्ष 2021 में दर्ज मुकदमे से जुड़ा था। याचिकाकर्ता यूसुफ अली उर्फ दद्दन शाह ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत याचिका दायर कर उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एवं असामाजिक गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1986 की धारा 3(1) के तहत शुरू की गई कार्यवाही को चुनौती दी।

    याचिकाकर्ता का कहना था कि गैंग चार्ट में उसे तीन आपराधिक मामलों के आधार पर गैंग का सदस्य बताया गया। उसके अनुसार, गैंग चार्ट 10 नवंबर 2021 को आगे भेजा गया, 11 नवंबर को अपर SP और एसपी ने इसे मंजूरी दी तथा 15 नवंबर को DM ने भी इसे स्वीकृति दी।

    याचिका में आरोप लगाया गया कि अधिकारियों ने पहले से तैयार गैंग चार्ट पर महज औपचारिक तरीके से हस्ताक्षर किए। इससे यह स्पष्ट होता है कि चार्ट तैयार करने और मंजूर करने में वास्तविक विवेक का इस्तेमाल नहीं किया गया। याचिकाकर्ता ने 24 अक्टूबर 2003 के सर्कुलर और 2 जनवरी 2004 के शासनादेश का हवाला दिया, जिनमें आरोपी के आपराधिक इतिहास की जांच और गैंग चार्ट को अंतिम रूप देने से पहले संबंधित अधिकारियों के बीच विचार-विमर्श की आवश्यकता बताई गई।

    राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि गैंग चार्ट को मंजूरी देने वाले अधिकारी की सहमति से ही यह साबित होता है कि आवश्यक परामर्श हुआ था। यह भी दलील दी गई कि याचिकाकर्ता जिन 2021 के नियमों पर भरोसा कर रहा है, वे 27 दिसंबर 2021 को लागू हुए थे जबकि गैंग चार्ट उससे पहले तैयार हो चुका था।

    हाईकोर्ट ने कहा कि गैंग चार्ट तैयार किए जाने के समय 24 अक्टूबर 2003 का सर्कुलर और 2 जनवरी 2004 का शासनादेश लागू थे। इन्हीं के आधार पर मामले की जांच की जानी है।

    जस्टिस मनीष माथुर ने कहा कि लागू प्रावधानों के तहत एसपी को कथित गैंग के सदस्यों के आपराधिक इतिहास और गतिविधियों की जांच करनी थी। इसके बाद डीएम से परामर्श करके गैंग चार्ट को अंतिम रूप देना था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गैंग चार्ट को महज औपचारिकता के तौर पर तैयार नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब इसके आधार पर आरोपी के खिलाफ गंभीर आपराधिक परिणाम सामने आते हैं।

    पीठ ने कहा कि गैंग चार्ट को एसपी और डीएम से मंजूरी दिलाने की व्यवस्था से ही यह स्पष्ट है कि इसके पीछे उचित विचार-विमर्श और संतुष्टि दर्ज करने को महत्व दिया गया।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विनोद बिहारी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का हवाला दिया। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई के लिए मंजूरी देने वाले अधिकारी की संतुष्टि आवश्यक है। अधिकारी को अपने शब्दों में यह दिखाना चाहिए कि उसने मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार किया। मंजूरी महज सिफारिश करने वाले अधिकारी द्वारा व्यक्त किए गए विचारों की औपचारिक या पहले से तैयार भाषा की पुनरावृत्ति नहीं हो सकती।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सिफारिश, अग्रेषण और मंजूरी देने वाले अधिकारियों द्वारा शक्ति का यांत्रिक या नियमित तरीके से इस्तेमाल स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि इससे नागरिकों की स्वतंत्रता सीधे प्रभावित होती है।

    हाईकोर्ट ने क्रांति एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम मसूद अहमद खान सहित सुप्रीम कोर्ट के अन्य फैसलों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि किसी आदेश में दिए गए कारण उसकी आत्मा होते हैं। कारणों से यह पता चलता है कि अधिकारी ने किस आधार पर निर्णय लिया और चुनौती दिए जाने पर उसके निर्णय को समझने में मदद मिलती है।

    मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि SP और DM दोनों ने गैंग चार्ट को मंजूरी देते समय याचिकाकर्ता के आपराधिक इतिहास पर विचार करने, कोई कारण दर्ज करने या किसी तरह के विचार-विमर्श का कोई संकेत नहीं दिया। कोर्ट ने इसे विवेक के इस्तेमाल के अभाव का स्पष्ट उदाहरण माना।

    पीठ ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि एसपी ने 11 नवंबर को गैंग चार्ट मंजूर किया, जबकि डीएम ने चार दिन बाद 15 नवंबर को उसे मंजूरी दी। कोर्ट के अनुसार, यह भी विचार-विमर्श न किए जाने का स्पष्ट संकेत था।

    कोर्ट ने 7 दिसंबर 2022 को ट्रायल कोर्ट द्वारा लिए गए संज्ञान को भी विवेक के पूर्ण अभाव वाला माना। पीठ ने कहा कि संज्ञान आदेश भी महज नियमित तरीके से पारित किया गया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि यह बेहद चिंताजनक स्थिति है कि SP और DM जैसे वरिष्ठ सरकारी अधिकारी संवैधानिक अदालतों के उन बार-बार दिए गए फैसलों से अनभिज्ञ नजर आए, जिनमें आदेश पारित करते समय विवेक का इस्तेमाल और राज्य की कार्रवाई में निष्पक्षता सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।

    कोर्ट ने माना कि गैंग चार्ट लागू सर्कुलर, शासनादेश और संवैधानिक अदालतों के फैसलों के विपरीत तैयार किया गया। इसके आधार पर हाईकोर्ट ने गैंग चार्ट के साथ आरोप पत्र, संज्ञान और समन आदेश सहित गैंगस्टर एक्ट के तहत पूरी कार्यवाही रद्द की और याचिका मंजूर की।

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