बिना सरकारी अनुमति दूसरा विवाह करने पर यूपी के सरकारी कर्मचारी को मिल सकती है बड़ी सजा: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
9 Oct 2026 5:05 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी अनुमति के बिना दूसरा विवाह करने वाले सरकारी कर्मचारी पर बड़ी अनुशासनात्मक सजा लगाई जा सकती है।
उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली, 1956 के नियम 29 के उपनियम (1) और (2) के उल्लंघन पर सजा तय करना नियुक्ति प्राधिकारी के विवेक पर निर्भर करता है।
जस्टिस मनीष कुमार निगम ने स्पष्ट किया कि नियम 29 का उपनियम (3), जिसमें ऐसे मामले में तीन साल तक वेतनवृद्धि रोकने की न्यूनतम सजा का प्रावधान है, वर्ष 1976 में हटा दिया गया। इसके बाद इस उपनियम को दोबारा नियमावली में शामिल नहीं किया गया। इसलिए कर्मचारी यह दावा नहीं कर सकता कि इस तरह के कदाचार पर केवल मामूली सजा ही दी जा सकती है।
कोर्ट ने कहा,
“जब 1956 के नियमों के नियम 29 का उपनियम (3) वर्ष 1976 में ही हटा दिया गया था, तो यह नहीं माना जा सकता कि उपनियम (1) और (2) के उल्लंघन पर केवल तीन वेतनवृद्धियां रोकने जैसी मामूली सजा दी जा सकती है। मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर सजा तय करना नियुक्ति प्राधिकारी के विवेक पर निर्भर है।”
यह मामला उत्तर प्रदेश पुलिस की एक महिला कांस्टेबल से जुड़ा था। उसके खिलाफ 22 मार्च 2025 को उत्तर प्रदेश पुलिस अधीनस्थ श्रेणी के अधिकारियों की दंड एवं अपील नियमावली, 1991 के नियम 14(1) के तहत आरोपपत्र जारी किया गया। आरोप था कि पुलिस सेवा में आने के बाद उसने अपने पहले पति को तलाक दिए बिना दुर्गेश कुमार गौतम से विवाह कर लिया, जो 1956 की नियमावली के नियम 29 का उल्लंघन है। कांस्टेबल ने इस आरोपपत्र को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि नियम 14(1) बड़ी सजा देने की प्रक्रिया निर्धारित करता है, जबकि नियम 29 के उपनियम (3) में तीन साल तक वेतनवृद्धि रोकने की सजा तय थी, जो मामूली सजा की श्रेणी में आती है। इसलिए उसके खिलाफ अधिकतम नियम 14(2) के तहत ही कार्रवाई की जा सकती है।
इस दलील के समर्थन में कमालुद्दीन खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, प्रभात भटनागर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अनीता यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसलों का हवाला दिया गया।
वहीं, राज्य सरकार के सरकारी वकील ने दलील दी कि नियम 29 का उपनियम (3) उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी आचरण (चौथा संशोधन) नियमावली, 1976 के जरिए हटा दिया गया। याचिकाकर्ता द्वारा जिन फैसलों का हवाला दिया गया, उनमें इस संशोधन पर विचार नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने नियम 29 में हुए संशोधनों की पड़ताल करते हुए पाया कि उपनियम (2) वर्ष 1956 में जोड़ा गया, जबकि उपनियम (3) वर्ष 1964 में शामिल किया गया। वर्ष 1976 में नियम को नए सिरे से प्रतिस्थापित किया गया, जिसमें केवल उपनियम (1) और (2) रखे गए। इसके बाद उपनियम (3) को दोबारा शामिल किए जाने का कोई संशोधन अदालत के सामने नहीं रखा गया।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत सभी फैसले संशोधित प्रावधान पर विचार किए बिना दिए गए थे, इसलिए उन्हें इस मामले में बाध्यकारी मिसाल नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नियम 14(1) के तहत बड़ी सजा देने की प्रक्रिया के अनुसार विभागीय जांच शुरू होने का यह अर्थ नहीं है कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी बड़ी सजा देने के लिए बाध्य है। जांच के बाद मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर उचित सजा तय की जा सकती है।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने महिला कांस्टेबल की याचिका खारिज की।

