कार्यकारी सर्कुलर कानून से मिले वेतन के अधिकार को सीमित नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
23 July 2026 3:13 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि शिक्षा निदेशक (बेसिक) की ओर से जारी कार्यकारी सर्कुलर किसी शिक्षक को कानून के तहत मिले वेतन के अधिकार को सीमित या समाप्त नहीं कर सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि कार्यकारी निर्देश किसी वैधानिक प्रावधान पर हावी नहीं हो सकते।
जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने कहा कि 3 मई 1982 का सर्कुलर केवल सहायता अनुदान योजना को लागू करने के लिए जारी एक कार्यकारी निर्देश है। यह उत्तर प्रदेश जूनियर हाई स्कूल (शिक्षकों एवं अन्य कर्मचारियों के वेतन भुगतान) अधिनियम, 1978 की धारा 10 के तहत मिले अधिकार को सीमित नहीं कर सकता।
अदालत ने कहा,
"सुप्रीम कोर्ट जब किसी वैधानिक प्रावधान की व्याख्या करता है तो वह बताता है कि कानून का वास्तविक अर्थ हमेशा से क्या था। ऐसा निर्णय नया कानून नहीं बनाता। इसलिए किसी कार्यकारी परिपत्र के जरिए वैधानिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।"
मामला आजमगढ़ स्थित स्म्ति राम दइयी बालिका जूनियर हाईस्कूल के सहायक शिक्षक से जुड़ा है। उनकी नियुक्ति प्राथमिक अनुभाग में हुई थी। विद्यालय को पहले प्राथमिक विद्यालय और बाद में जूनियर हाईस्कूल के रूप में मान्यता मिली थी। वर्ष 1980 में विद्यालय को सहायता अनुदान योजना में शामिल किया गया, जिसके बाद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने शिक्षक की नियुक्ति को मंजूरी देते हुए उनका नाम वेतन भुगतान की स्वीकृत सूची में शामिल कर लिया था।
शिक्षक को अक्टूबर 1981 तक सरकारी कोष से वेतन मिलता रहा लेकिन इसके बाद भुगतान रोक दिया गया। बाद में इसी विद्यालय के दो अन्य शिक्षकों को हाईकोर्ट के आदेश पर वेतन मिला। राज्य सरकार की ओर से उनके पक्ष में आए फैसले के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की थी।
शिक्षक की ओर से किए गए प्रतिनिधित्व को वर्ष 1999 में खारिज कर दिया गया। उनकी याचिका भी बाद में खारिज हुई, लेकिन खंडपीठ ने वर्ष 2012 में मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया। इसके बाद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 11 अप्रैल 2013 को फिर दावा यह कहते हुए खारिज किया कि 1982 के परिपत्र का लाभ केवल कक्षा छह से आठ तक के शिक्षकों को मिलेगा।
सिंगल बेंच ने भी इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद शिक्षक ने विशेष अपील दायर की और कहा कि जब उनकी नियुक्ति पहले ही स्वीकृत हो चुकी थी, तब बाद में जारी परिपत्र के आधार पर उनका वेतन नहीं रोका जा सकता। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले का भी हवाला दिया।
खंडपीठ ने पाया कि संबंधित विद्यालय कक्षा एक से आठ तक एक ही प्रबंधन के तहत संचालित होता था। ऐसे में यह अधिनियम, 1978 की धारा 10 के दायरे में आता है और शिक्षक वेतन पाने के हकदार हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि शिक्षक ने परिपत्र की वैधता को चुनौती नहीं दी, बल्कि लगातार यह दावा किया है कि उन्हें कानून के तहत वेतन पाने का अधिकार है। इसलिए देरी के आधार पर उनका दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी और एकल पीठ को दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उस समय कानून की यही समझ थी और उन्होंने उसी के अनुसार निर्णय दिया था।
मामले का अंतिम निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, आजमगढ़ को सेवा अभिलेख और उपस्थिति पंजिका की जांच कर यह सत्यापित करने का निर्देश दिया कि शिक्षक ने किस अवधि तक विद्यालय में कार्य किया। यदि वह उस अवधि में कार्यरत पाए जाते हैं तो उन्हें नवंबर 1981 से लेकर वर्ष 2018 के संशोधन कानून के लागू होने या उनकी सेवा समाप्त होने की तिथि, जो भी पहले हो, तक का बकाया वेतन तीन महीने के भीतर अदा किया जाए।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने विशेष अपील का निस्तारण किया।


