राजस्व की संक्षिप्त कार्यवाही में प्रक्रिया का सख्ती से पालन जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमीन का नक्शा सुधारने के आदेश रद्द किए
Amir Ahmad
2 Nov 2026 12:50 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश भूमि राजस्व अधिनियम, 1901 की धारा 28 के तहत गांव के नक्शे में सुधार करने वाले राजस्व अधिकारी विवादित माप के आधार पर एक भूखंड का कुछ हिस्सा काटकर उससे लगे दूसरे भूखंड की कथित कमी पूरी नहीं कर सकते।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस धारा के तहत होने वाली संक्षिप्त कार्यवाही में वैधानिक प्रक्रिया का अधिक सख्ती से पालन जरूरी है, न कि उसमें ढील देने की छूट।
जस्टिस इरशाद अली ने कहा कि धारा 28 के तहत राजस्व अधिकारियों का अधिकार क्षेत्र सीमित है। इसलिए उन्हें कानून में निर्धारित प्रक्रिया का और अधिक सावधानी से पालन करना होगा।
धारा 28 गांव के नक्शे और फील्ड बुक के रखरखाव तथा उनमें मौजूद गलतियों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत सुधारने से संबंधित है।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने 24 नवंबर 1990 को पंजीकृत बिक्री विलेख के जरिए सुल्तानपुर जिले की मुसाफिरखाना तहसील के गांव नारा में गाटा संख्या 764 की जमीन खरीदी थी। इस जमीन पर निर्माण को लेकर याचिकाकर्ताओं और पास के गाटा संख्या 763 के मालिकों के बीच दीवानी मुकदमे लंबित थे।
गाटा संख्या 763 में जमीन खरीदने वाले प्रतिवादी नंबर 5 समर बहादुर सिंह ने धारा 28 के तहत अपर जिलाधिकारी (प्रशासन)/उप जिलाधिकारी, सुल्तानपुर के समक्ष आवेदन दिया। उनका दावा था कि राजस्व रिकॉर्ड में गाटा संख्या 763 का रकबा कम और गाटा संख्या 764 का रकबा अधिक दर्ज है।
चकबंदी के मुख्य अनुरक्षक की 4 अगस्त 2001 की रिपोर्ट के आधार पर अपर जिलाधिकारी ने 20 जुलाई 2004 को आदेश दिया कि गाटा संख्या 763 की कथित कमी गाटा संख्या 764 के अतिरिक्त रकबे से पूरी की जा सकती है। फैजाबाद के अपर आयुक्त ने 3 जुलाई 2006 को पुनरीक्षण याचिका खारिज की।
याचिकाकर्ताओं ने अपने भूखंड से लगभग 4 बिस्वा 1 धुर जमीन हटाने पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि जिस हिस्से को दूसरे भूखंड में शामिल किया जा रहा है, वहां पहले से पक्का मकान बना हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि जमीन की माप उत्तर से दक्षिण की सीधी दिशा में करने के बजाय त्रिकोणीय तरीके से की गई थी। इसके अलावा, दोनों भूखंडों से जुड़ा विवाद पहले से दीवानी अदालत में लंबित था।
प्रतिवादी नंबर 5, 6 और 8 की ओर से दलील दी गई कि धारा 28 की कार्यवाही केवल नक्शे और फील्ड बुक में सुधार तक सीमित है। इसमें मालिकाना हक या कब्जे का फैसला नहीं होता और केवल नक्शे में सुधार के आदेश से किसी को बेदखल नहीं किया जा सकता। इसके समर्थन में त्रिवेणी बहादुर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और रज्जब अली बनाम अपर आयुक्त, फैजाबाद के फैसलों का हवाला दिया गया।
हाईकोर्ट ने माना कि इन फैसलों में यह सिद्धांत दोहराया गया है कि धारा 28 के तहत कार्यवाही संक्षिप्त होती है और मालिकाना हक का फैसला दीवानी अदालत करती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसे आदेश न्यायिक समीक्षा से बाहर हो जाते हैं या राजस्व अधिकारी नक्शा सुधारने के नाम पर बिना सत्यापन के विवादित माप के आधार पर किसी दूसरे पक्ष की जमीन का क्षेत्रफल और पहचान प्रभावित कर सकते हैं।
कोर्ट ने कहा कि त्रिवेणी बहादुर सिंह का फैसला राजस्व अधिकारियों को यह अनुमति नहीं देता कि वे किसी रिपोर्ट पर यांत्रिक ढंग से कार्रवाई करें, जबकि संबंधित पक्ष माप पर आपत्ति जता रहा हो, प्रभावित हिस्से पर बने मकान की जानकारी दे रहा हो और लंबित दीवानी मुकदमे की ओर भी ध्यान दिला रहा हो।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि रज्जब अली का मामला अलग था क्योंकि उसमें जिस आधार पर आपत्ति की गई, उसे पुनरीक्षण अधिकारी के सामने उठाया ही नहीं गया। मौजूदा मामले में याचिकाकर्ताओं ने कार्यवाही के दौरान ही अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादियों की दलील को स्वीकार करने पर भी राजस्व अधिकारियों को केवल यह जांचना था कि गांव के नक्शे में वास्तव में कोई गलती है या नहीं। वे नक्शा सुधारने के नाम पर यह मानकर नहीं चल सकते थे कि गाटा संख्या 763 में बताई गई कमी का मतलब अनिवार्य रूप से गाटा संख्या 764 में उतनी ही अतिरिक्त जमीन होना है। इसके बाद वे याचिकाकर्ताओं के भूखंड से एक निश्चित हिस्सा कम भी नहीं कर सकते थे।
हाईकोर्ट ने पाया कि 20 जुलाई 2004 के आदेश और पुनरीक्षण आदेश, दोनों में याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया। अधिकारियों ने मुख्य रूप से वर्ष 2001 की रिपोर्ट पर भरोसा करके फैसला कर दिया था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह जमीन के मालिकाना हक पर कोई निष्कर्ष नहीं दे रहा है, क्योंकि ऐसा करने से लंबित दीवानी मुकदमों पर असर पड़ सकता है।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली और अपर जिलाधिकारी तथा अपर आयुक्त के दोनों आदेश रद्द कर दिए। मामले को सभी प्रभावित पक्षों को नोटिस देने के बाद नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया गया।
कोर्ट ने जरूरत पड़ने पर दोबारा जमीन की माप कराने और सभी आपत्तियों पर कारण सहित आदेश पारित करने का निर्देश दिया। यह प्रक्रिया यथासंभव छह महीने के भीतर पूरी करने को कहा गया।

