अधिकारी का नामित प्रतिनिधि चयन समिति में नहीं आया तो चयन रद्द नहीं होगा, इसी आधार पर वेतन भी नहीं रोका जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
19 Aug 2026 4:40 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा चयन समिति में अपना नामित प्रतिनिधि नहीं भेजना चयन प्रक्रिया को अवैध नहीं बनाता। केवल इस आधार पर चयनित कर्मचारी का वेतन रोका नहीं जा सकता।
जस्टिस इरशाद अली ने 1984 के उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूल नियमों का हवाला देते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने चयनित कर्मचारी को वेतन देने का निर्देश देते हुए कहा कि यदि चयन समिति के बहुमत सदस्यों ने विधि के अनुसार निर्णय लिया है तो केवल अधिकारी के प्रतिनिधि की अनुपस्थिति से चयन अमान्य नहीं हो जाता।
मामला एक मान्यता प्राप्त और सहायता प्राप्त जूनियर हाईस्कूल में चतुर्थ श्रेणी के पद पर नियुक्ति से जुड़ा था। जुलाई 2013 में रिक्त पद की सूचना जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को भेजी गई। अगस्त 2013 में साक्षात्कार तय किया गया, लेकिन अधिकारी की ओर से नामित प्रतिनिधि नहीं भेजे जाने के कारण उसे टाल दिया गया।
इसके बाद सितंबर 2013 में चयन समिति की बैठक हुई और याचिकाकर्ता को चयन सूची में प्रथम स्थान दिया गया। चयन संबंधी अभिलेख 12 सितंबर 2013 को अनुमोदन के लिए भेजे गए लेकिन अधिकारी की ओर से कोई निर्णय नहीं लिया गया।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने 18 अक्टूबर 2013 को चपरासी के पद पर कार्यभार ग्रहण कर लिया। हालांकि, उसे वेतन नहीं दिया गया। प्रबंधन की ओर से वेतन जारी करने के लिए अधिकारियों को चार बार अभ्यावेदन दिए गए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
इसके बाद कर्मचारी ने वेतन जारी कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसकी ओर से दलील दी गई कि अधिकारियों ने स्वयं अपना प्रतिनिधि नहीं भेजकर चयन प्रक्रिया में देरी की और अब उसी निष्क्रियता का आधार बनाकर चयन पर सवाल नहीं उठा सकते।
वहीं, सरकारी पक्ष की ओर से कहा गया कि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के नामित प्रतिनिधि की अनुपस्थिति में किया गया चयन नियमों के विपरीत है। इसलिए ऐसे चयन के आधार पर वेतन जारी करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज किया।
जस्टिस इरशाद अली ने 1984 के नियमों के नियम 15(5)(ii) का उल्लेख करते हुए कहा कि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के नामित प्रतिनिधि की अनुपस्थिति मात्र से चयन प्रक्रिया निरस्त नहीं होती।
अदालत ने कहा,
“केवल जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के नामित प्रतिनिधि की अनुपस्थिति से चयन प्रक्रिया अवैध नहीं होती। यदि चयन समिति के बहुमत सदस्यों ने निर्णय लिया है तो वह वैध है और केवल इस आधार पर वेतन रोकना उचित नहीं है।”
अदालत ने इसी तरह के मामलों में हाईकोर्ट के पहले के फैसलों का भी उल्लेख किया। उत्तर प्रदेश राज्य बनाम प्रवीण कुमार मिश्रा और उत्तर प्रदेश राज्य बनाम गुंजन सिंह के मामलों में भी यह माना गया था कि अधिकारी के नामित प्रतिनिधि की अनुपस्थिति अपने आप चयन को अवैध नहीं बनाती।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि नियमों के तहत यदि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को चयन संबंधी कागजात मिलने के एक महीने के भीतर कोई निर्णय नहीं लिया जाता है तो उसे अनुमोदन प्रदान किया गया माना जाता है।
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए अधिकारियों को याचिकाकर्ता का वर्तमान वेतन हर महीने नियमित रूप से जारी करने का निर्देश दिया। साथ ही उसे चपरासी के पद पर काम करने की अनुमति देने को कहा गया।
अदालत ने 18 अक्टूबर 2013 से बकाया वेतन का भुगतान करने का भी निर्देश दिया। बकाया राशि पर 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा और प्रमाणित आदेश की प्रति प्रस्तुत किए जाने के दो महीने के भीतर भुगतान करना होगा।


