कर्मचारी से उन आरोपों को गलत साबित करने की उम्मीद नहीं की जा सकती, जिन्हें प्रबंधन साबित ही नहीं कर पाया: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • कर्मचारी से उन आरोपों को गलत साबित करने की उम्मीद नहीं की जा सकती, जिन्हें प्रबंधन साबित ही नहीं कर पाया: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच में सबसे पहले प्रबंधन की जिम्मेदारी है कि वह कर्मचारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों और उन आरोपों के आधारभूत तथ्यों को साबित करे। कर्मचारी से ऐसे आरोपों को गलत साबित करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, जिन्हें प्रबंधन स्वयं साबित नहीं कर पाया।

    जस्टिस इरशाद अली ने पंजाब नेशनल बैंक के अधिकारी की बर्खास्तगी का आदेश रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने पाया कि अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोप इस आधार पर बनाए गए कि वह बैंक में सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में काम कर रहा था, लेकिन बैंक इस बुनियादी तथ्य को सिविल कोर्ट के समक्ष भी साबित नहीं कर पाया।

    कोर्ट ने कहा,

    “कर्मचारी का बचाव प्रबंधन द्वारा स्थापित किए गए मामले के आधार पर देखा जाना चाहिए। केवल इसलिए कि कर्मचारी ने आरोपों से इनकार किया है, सबूत का भार उस पर नहीं आ जाता। प्रबंधन को सबसे पहले कथित कदाचार के आवश्यक तत्व साबित करने होंगे।”

    याचिकाकर्ता वर्ष 1978 में पंजाब नेशनल बैंक में क्लर्क-कम-कैशियर के रूप में नियुक्त हुआ और 1987 में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर पदोन्नत हुआ। वर्ष 1999 में बैंक के धन में कथित धोखाधड़ी और गबन के आरोप में उसके खिलाफ दो FIR दर्ज की गईं। इसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया और निलंबित कर दिया गया।

    वर्ष 2002 में उसे आरोप पत्र जारी किया गया। इसमें आरोप लगाया गया कि लखनऊ की महानगर और विधानसभा मार्ग शाखाओं में सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में काम करते हुए उसने बंद खातों को बदले हुए नाम से दोबारा खोला, अनधिकृत रूप से खातों से रकम निकाली, मार्जिन मनी और एटीएम की रकम का गबन किया तथा बैंक के रिकॉर्ड हटा दिए।

    याचिकाकर्ता ने अपने बचाव के लिए 48 दस्तावेज मांगे थे, लेकिन उसे ये दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। उसने हाईकोर्ट का रुख किया, जिसके बाद 2012 में कोर्ट ने दस्तावेज उपलब्ध कराने या उनका निरीक्षण कराने का निर्देश दिया। इसके बाद कई दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई। विवादित दस्तावेजों की मूल प्रतियां भी पेश नहीं की गईं और जांच अधिकारी ने बैंक की बैलेंसिंग टीम के सदस्यों को बचाव पक्ष के गवाह के तौर पर बुलाने से इनकार किया।

    जांच अधिकारी ने सभी आरोप साबित मान लिए और 1 नवंबर 2012 को याचिकाकर्ता को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उसकी विभागीय अपील भी इस आधार पर खारिज कर दी गई कि उसने आरोपों को गलत साबित करने के लिए कोई नया तथ्य पेश नहीं किया।

    हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता ने कहा कि उसे कभी भी सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त नहीं किया गया। उसने बताया कि बैंक ने उसके खिलाफ सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया, जिसमें सिविल कोर्ट ने माना था कि बैंक यह साबित करने में विफल रहा कि उसने कभी सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में काम किया था। बैंक की अपील भी 2013 में खारिज हो गई।

    याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि बैंक की अपनी 'हैंडबुक ऑफ कंप्यूटरीकरण ऑफ ब्रांचेज' के अनुसार सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर का पद स्केल-2 से नीचे के अधिकारी को नहीं दिया जा सकता था, जबकि वह स्केल-1 में था। उसकी दलील थी कि विभागीय जांच में शुरुआत से ही आरोपों को साबित मान लिया गया और उससे उन्हें गलत साबित करने की अपेक्षा की गई।

    बैंक की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता ने जांच में पूरी तरह हिस्सा लिया था और प्रबंधन के गवाहों से जिरह भी की थी। बैंक ने यह भी कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से उसके सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में काम करने की भूमिका सामने आती है और हाईकोर्ट को विभागीय जांच में साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन नहीं करना चाहिए।

    हाईकोर्ट ने कहा कि वह विभागीय जांच के निष्कर्षों पर अपील की अदालत की तरह नहीं बैठता, लेकिन यह सीमित न्यायिक समीक्षा ऐसी जांच को संरक्षण नहीं दे सकती जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हो या जिसका आधार ही किसी साक्ष्य पर न हो। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की चुनौती केवल साक्ष्यों के मूल्यांकन से असहमति की नहीं थी, बल्कि वह उस बुनियादी आधार को ही चुनौती दे रहा था जिस पर पूरी विभागीय कार्रवाई खड़ी की गई।

    सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि सिविल कोर्ट के फैसले पर विभागीय कार्यवाही में सीधे तौर पर 'रेस जुडिकाटा' का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन विभागीय अधिकारियों को उस फैसले के प्रभाव पर विचार करना जरूरी है।

    कोर्ट ने कहा कि सिविल कोर्ट के फैसले का महत्व इस बात में है कि बैंक पहले ही एक सक्षम अदालत के समक्ष उस बुनियादी तथ्य को साबित करने में विफल रहा था, जिसे बाद में विभागीय कार्यवाही में याचिकाकर्ता के कर्तव्यों और कथित चूक का आधार बनाया गया।

    हाईकोर्ट ने पाया कि बैंक ने याचिकाकर्ता की सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर के पद पर नियुक्ति का कोई आदेश पेश नहीं किया और बैंक के चारों गवाहों में से किसी ने भी ऐसे नियुक्ति आदेश के बारे में कुछ नहीं कहा।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रबंधन को साक्ष्यों के जरिए यह बुनियादी तथ्य साबित करना था। याचिकाकर्ता पर यह भार नहीं डाला जा सकता कि वह साबित करे कि वह उस पद पर नहीं था, जबकि प्रबंधन स्वयं यह साबित नहीं कर पाया कि वह उस पद पर था।

    कोर्ट ने कहा कि सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर के कर्तव्यों के आधार पर लगाए गए आरोप, जिसमें संबंधित यूजर आईडी और पासवर्ड के कथित अनधिकृत इस्तेमाल का आरोप भी शामिल था, स्वतंत्र साक्ष्य से साबित किए जाने जरूरी थे। लेकिन ऐसा कोई पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आया।

    दस्तावेजों के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि जब प्रबंधन किसी दस्तावेज पर भरोसा करता है और कर्मचारी उसकी वास्तविकता पर सवाल उठाते हुए मूल दस्तावेज मांगता है, तो उसकी मांग को महज तकनीकी आपत्ति नहीं माना जा सकता। खास तौर पर तब, जब हाईकोर्ट पहले ही उन दस्तावेजों को उपलब्ध कराने का निर्देश दे चुका हो।

    कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि जिन खातों में से एक को याचिकाकर्ता द्वारा कथित तौर पर दोबारा खोलने का आरोप था, वह खाता फरवरी 1994 में बंद हो चुका था, जबकि याचिकाकर्ता ने महानगर शाखा में अक्टूबर 1994 में कार्यभार संभाला था।

    मार्जिन मनी के 14,500 रुपये के कथित गबन के आरोप पर कोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति ने कथित तौर पर यह रकम सौंपी थी, उसे गवाह के तौर पर पेश ही नहीं किया गया। रिकॉर्ड से यह भी पता चलता था कि रकम उसी व्यक्ति के खाते में जमा हुई थी और लोन भी मंजूर किया गया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि बैंक के रिकॉर्ड में किसी अनियमित प्रविष्टि या लेन-देन का होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि कथित कृत्य याचिकाकर्ता ने ही किया।

    कोर्ट ने कहा कि विभागीय अपील को इस आधार पर खारिज करना कि याचिकाकर्ता ने आरोपों को गलत साबित करने के लिए कोई नया तथ्य पेश नहीं किया, सबूत के भार को गलत तरीके से कर्मचारी पर डालना था। कोर्ट ने यह भी पाया कि अनुशासनिक प्राधिकारी ने याचिकाकर्ता की आपत्तियों पर विचार किए बिना जांच रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था।

    बैंक की ओर से जिन फैसलों पर भरोसा किया गया, उन्हें अलग करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप पर सीमित रोक तभी लागू होती है, जब वैध प्रक्रिया के जरिए कदाचार साबित हुआ हो। जब कदाचार की ही टिकाऊ पुष्टि नहीं हुई, तब सजा की आनुपातिकता का सवाल भी नहीं उठता।

    कोर्ट ने कहा,

    “सीमित न्यायिक समीक्षा का अर्थ यह नहीं है कि जहां निष्पक्ष विभागीय प्रक्रिया की बुनियादी आवश्यकताएं पूरी नहीं हुई हों, वहां न्यायिक समीक्षा ही नहीं की जा सकती।”

    मामले में कई खामियां और लंबे समय से लंबित कार्यवाही को देखते हुए हाईकोर्ट ने इसे दोबारा विभागीय जांच के लिए भेजने से इनकार किया। कोर्ट ने बर्खास्तगी के आदेश और विभागीय अपील का आदेश रद्द किया।

    हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को सेवा में लगातार कार्यरत माना जाए और उसकी सेवा में कोई ब्रेक न माना जाए। उसे वेतन निर्धारण, वेतन वृद्धि और वरिष्ठता समेत सभी परिणामी लाभ दिए जाएं। पहले से भुगतान की गई रकम का समायोजन करने के बाद बकाया मौद्रिक लाभ भी तीन महीने के भीतर जारी करने का निर्देश दिया गया।

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