सिर्फ संदेह के आधार पर पेट्रोल पंप की डीलरशिप रद्द नहीं की जा सकती, तकनीकी साक्ष्य जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

13 July 2026 7:08 PM IST

  • सिर्फ संदेह के आधार पर पेट्रोल पंप की डीलरशिप रद्द नहीं की जा सकती, तकनीकी साक्ष्य जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल इस आशंका के आधार पर कि ईंधन वितरण मशीन से छेड़छाड़ की गई है किसी पेट्रोल पंप की डीलरशिप समाप्त नहीं की जा सकती।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक ठोस तकनीकी और वैज्ञानिक साक्ष्यों से यह साबित न हो जाए कि कथित अनियमितता ईंधन की आपूर्ति में हेरफेर करने में सक्षम थी और उसका संबंध डीलर से था तब तक डीलरशिप समाप्त करने जैसी दंडात्मक कार्रवाई उचित नहीं मानी जा सकती।

    जस्टिस इरशाद अली की पीठ ने यह टिप्पणी मार्केटिंग अनुशासन दिशानिर्देश, 2012 के खंड 5.1.4 की व्याख्या करते हुए की। इस प्रावधान के अनुसार, ईंधन वितरण इकाई में ऐसा कोई अतिरिक्त या अनधिकृत उपकरण या संयोजन, जिससे ईंधन की आपूर्ति में हेरफेर की संभावना हो, "गंभीर अनियमितता" माना जाता है।

    मामले में भारतीय तेल निगम के एक पेट्रोल पंप पर संयुक्त निरीक्षण के दौरान यह पाया गया था कि पल्सर केबल को चिपकने वाले टेप से जोड़ा गया था। इसके अलावा, मदरबोर्ड पर लगी विधिक माप विज्ञान विभाग की सील में जोड़ दिखाई दिया और पल्सर की सील भी टूटी हुई मिली।

    हालांकि निरीक्षण रिपोर्ट में यह भी दर्ज था कि ईंधन वितरण इकाई के भीतर कोई अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, चिप या अन्य अनधिकृत संयोजन नहीं मिला तथा ईंधन की मात्रा में किसी प्रकार की कमी या गड़बड़ी भी नहीं पाई गई।

    डीलर का कहना था कि संबंधित ईंधन वितरण मशीन कई महीनों से खराब पड़ी थी। उसका यह भी तर्क था कि मशीन और उसके सभी आंतरिक पुर्जे भारतीय तेल निगम के स्वामित्व में हैं तथा उनकी स्थापना, मरम्मत, अंशांकन और सील लगाने का कार्य केवल निगम, उसकी अधिकृत एजेंसियां और विधिक माप विज्ञान विभाग करते हैं। ऐसे में मशीन के अंदरूनी हिस्सों तक उसकी पहुंच या नियंत्रण नहीं था, इसलिए उसके खिलाफ छेड़छाड़ का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

    वहीं, भारतीय तेल निगम का पक्ष था कि टूटी हुई सील और टेप से जुड़ी पल्सर केबल स्वयं में गंभीर अनियमितता है और इससे छेड़छाड़ की आशंका स्पष्ट होती है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि खंड 5.1.4 के तहत की जाने वाली कार्रवाई दंडात्मक प्रकृति की होती है। इसलिए यह दायित्व निगम पर है कि वह विश्वसनीय तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर यह सिद्ध करे कि मशीन के साथ ऐसी छेड़छाड़ हुई थी, जिससे ईंधन वितरण प्रभावित हो सकता था और उसका संबंध डीलर से था।

    अदालत ने अपने पूर्व के कई निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि केवल सोल्डरिंग के निशान, किसी जोड़ या बाहरी परिवर्तन से यह स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता कि ईंधन वितरण में हेरफेर किया गया। यह भी साबित करना आवश्यक है कि छेड़छाड़ कब हुई, डीलर को मशीन तक अनधिकृत पहुंच कैसे मिली और उससे ईंधन की आपूर्ति किस प्रकार प्रभावित हुई।

    मौजूदा मामले में अदालत ने पाया कि निरीक्षण के दौरान कोई अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद नहीं हुआ, ईंधन की कम आपूर्ति का कोई मामला सामने नहीं आया और निरीक्षण के समय मशीन भी काम नहीं कर रही थी। इसके बावजूद जब्त किए गए पुर्जों की कोई वैज्ञानिक या प्रयोगशाला जांच नहीं कराई गई।

    इस पर अदालत ने कहा,

    "प्रतिवादियों ने केवल इस आधार पर निष्कर्ष निकाल लिया कि टेप से जुड़ा जोड़ नहीं होना चाहिए था, इसलिए उसका उद्देश्य ईंधन वितरण में हेरफेर करना ही रहा होगा। तकनीकी साक्ष्य के अभाव में ऐसा निष्कर्ष प्रमाण का विकल्प नहीं हो सकता।"

    हाईकोर्ट ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर डीलरशिप समाप्त नहीं की जा सकती। चूंकि इस मामले में न तो कोई अतिरिक्त उपकरण मिला, न ईंधन की कम आपूर्ति साबित हुई और न ही किसी वैज्ञानिक जांच से छेड़छाड़ की पुष्टि हुई, इसलिए डीलर के विरुद्ध लगाया गया आरोप सिद्ध नहीं माना जा सकता।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ईंधन वितरण मशीन में पाई गई हर अनियमितता को छेड़छाड़ नहीं माना जा सकता। डीलरशिप समाप्त करने जैसे गंभीर नागरिक परिणाम वाले मामलों में आरोपों को ठोस, विश्वसनीय और तकनीकी साक्ष्यों से सिद्ध करना आवश्यक है।

    इन्हीं आधारों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए भारतीय तेल निगम द्वारा डीलरशिप समाप्त करने का आदेश और उसके विरुद्ध पारित अपीलीय आदेश दोनों को रद्द किया।

    Next Story