आपराधिक अदालत की हिरासत में दस्तावेज होने के आधार पर कर्मचारी को निरीक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • आपराधिक अदालत की हिरासत में दस्तावेज होने के आधार पर कर्मचारी को निरीक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि विभाग किसी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई में उन दस्तावेजों पर भरोसा करता है, जो आपराधिक अदालत की हिरासत में हैं, तो केवल इस आधार पर कर्मचारी को उनका निरीक्षण करने से वंचित नहीं किया जा सकता। विभाग की जिम्मेदारी है कि यदि वे दस्तावेज आरोप साबित करने या उनका बचाव करने के लिए जरूरी हैं, तो कर्मचारी को उन तक वैध पहुंच दिलाने के लिए उचित कदम उठाए। ऐसा करना संभव न हो तो विभाग को इसका कारण स्पष्ट करना होगा।

    जस्टिस इरशाद अली ने कहा कि संबंधित दस्तावेज आरोपों को साबित करने या उनका खंडन करने के लिए जरूरी थे, तो विभाग को उन तक वैध पहुंच सुनिश्चित करने के लिए उचित प्रयास करने चाहिए। किसी अन्य सरकारी प्राधिकरण के पास दस्तावेजों की हिरासत होना अपने आप में यह मानने का आधार नहीं हो सकता कि कर्मचारी को निरीक्षण का प्रभावी अवसर दिया गया।

    कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब किसी कर्मचारी को बड़ी सजा देने का प्रस्ताव हो, तो चार्जशीट पर उसका लिखित जवाब विभाग की ओर से आरोप साबित करने की जगह नहीं ले सकता। विभागीय जांच की वैधता इस बात से तय होगी कि वास्तव में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं, न कि जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष दर्ज किया।

    मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता की नियुक्ति वर्ष 1968 में अधीनस्थ कृषि सेवा, श्रेणी-3 में हुई थी। वह 1 अक्टूबर 1981 से गोंडा के जिला कृषि अधिकारी के अधीन परियोजना अधिकारी के पद पर कार्यरत था। 10 जनवरी 1991 को जिलाधिकारी, गोंडा ने सरकारी गोदाम को सील करने का निर्देश दिया। 24 जनवरी 1991 को मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में गोदाम दोबारा खोला गया और सूची तैयार की गई। इसमें 1,55,043.47 रुपये मूल्य के सरकारी स्टॉक की कमी पाई गई।

    इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 409, 467, 468 और 420 के तहत अपराध संख्या 37/1991 दर्ज की गई।

    याचिकाकर्ता को 4 जुलाई 1991 को निलंबित कर दिया गया। अगस्त 1991 में जारी चार्जशीट इस टिप्पणी के साथ वापस आ गई कि याचिकाकर्ता इलाज के लिए बाहर गया हुआ था।

    एक पुरानी रिट याचिका में अंतरिम आदेश के जरिए निलंबन पर रोक लगने के बाद उसे बहाल कर दिया गया। इसके बाद 12 मई 1992 को उसे चार्जशीट प्राप्त हुई।

    23 मई 1992 से याचिकाकर्ता ने उसके खिलाफ भरोसा किए गए दस्तावेजों की प्रतियां देने की बार-बार मांग की। वर्ष 1993 की शुरुआत में उसने कुछ रिकॉर्ड का निरीक्षण किया, लेकिन उसका कहना था कि अंततः उसे केवल आठ दस्तावेज दिए गए। उसके द्वारा विशेष रूप से मांगे गए 23 दस्तावेज कभी उपलब्ध नहीं कराए गए। जो दस्तावेज दिए गए, वे भी न तो पूरे थे और न ही प्रमाणित। अपराध संख्या 37/1991 से जुड़े मूल रिकॉर्ड पुलिस के पास थे और आपराधिक अदालत में पेश किए जा चुके थे।

    याचिकाकर्ता के अनुसार, विभाग के निर्देश पर निरीक्षण के लिए तय तारीखों पर वह अदालत में उपस्थित हुआ, लेकिन सीलबंद दस्तावेज खुलवाने के लिए न तो विभाग का कोई अधिकारी आया और न ही अदालत का कोई सहायक मौजूद था। इस संबंध में उसने अदालत द्वारा जारी प्रमाण-पत्र पर भी भरोसा किया।

    याचिकाकर्ता ने अपने जवाब में दर्ज किया कि उसे जरूरी दस्तावेज नहीं दिए गए हैं और दस्तावेज मिलने के बाद वह विस्तृत जवाब दाखिल करने का अधिकार सुरक्षित रखता है। इसके बावजूद जांच अधिकारी ने 22 अगस्त 1998 की रिपोर्ट में सभी आरोप साबित मान लिए।

    इसके बाद 4 मार्च 1999 को जांच रिपोर्ट के साथ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। याचिकाकर्ता ने पत्नी की बीमारी का हवाला देकर जवाब देने के लिए समय मांगा। 16 अगस्त 1999 को उसे एक और अवसर दिया गया, लेकिन उसने कोई जवाब दाखिल नहीं किया।

    अंततः 22 फरवरी 2001 को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। साथ ही 1,57,043.47 रुपये की वसूली का निर्देश दिया गया। निलंबन की अवधि को सेवा के लिए अयोग्य अवधि मानते हुए उस समय के भुगतान से भी इनकार कर दिया गया।

    राज्य की ओर से अतिरिक्त मुख्य सरकारी वकील ने दलील दी कि आरोप सरकारी स्टॉक के गबन और हेराफेरी तथा रिकॉर्ड में जालसाजी से जुड़े थे। रिट अदालत विभागीय जांच के निष्कर्षों के खिलाफ अपीलीय अदालत की तरह काम नहीं कर सकती। याचिकाकर्ता को बार-बार अवसर दिए गए, लेकिन उसने उनका लाभ नहीं उठाया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि विवाद का असली मुद्दा विभागीय साक्ष्यों की पर्याप्तता नहीं, बल्कि यह है कि बर्खास्तगी की प्रक्रिया में निष्पक्ष जांच के लिए जरूरी नियमों का पालन किया गया या नहीं। आरोपों की गंभीरता अपने आप में बर्खास्तगी के आदेश को सही नहीं ठहरा सकती। आरोप कितना गंभीर है और उसे साबित करने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया कानूनी थी या नहीं, ये दोनों अलग-अलग सवाल हैं।

    सत्येंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले पर भरोसा करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब बड़ी सजा प्रस्तावित हो और लागू नियम मौखिक साक्ष्य की मांग करते हों, तो जांच अधिकारी को चार्जशीट में नामित गवाहों को बुलाना चाहिए। कर्मचारी की मौजूदगी में उनके बयान दर्ज होने चाहिए, उसे गवाहों से जिरह का अवसर मिलना चाहिए और इसके बाद उसे अपना साक्ष्य पेश करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

    कोर्ट ने कहा कि केवल दस्तावेजों के संदर्भों पर आधारित निष्कर्ष आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। राज्य ने जांच के नतीजे पर भरोसा तो किया, लेकिन यह नहीं दिखाया कि विभागीय जांच में किसी गवाह का बयान दर्ज किया गया था।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चार्जशीट का लिखित जवाब दाखिल करना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि लागू प्रक्रिया के अनुसार नियमित जांच की गई। लिखित स्पष्टीकरण और मौखिक जांच, दोनों के उद्देश्य अलग-अलग हैं।

    हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सरोज कुमार सिन्हा मामले का भी उल्लेख किया। इस फैसले के अनुसार, जांच अधिकारी एक स्वतंत्र निर्णायक होता है, विभाग का प्रतिनिधि नहीं। कोई दस्तावेज केवल विभागीय रिकॉर्ड का हिस्सा होने से साबित नहीं माना जा सकता। इसके अलावा, कर्मचारी द्वारा लगातार मांगे जाने के बावजूद जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराना जांच को दूषित कर सकता है।

    विभाग की इस दलील पर कि कुछ दस्तावेज दिए गए थे और कर्मचारी को कई अवसर भी मिले थे, कोर्ट ने कहा कि आंशिक रूप से दस्तावेज देना पर्याप्त नहीं है। यदि आरोपों के समर्थन में इस्तेमाल किए गए महत्वपूर्ण दस्तावेज कर्मचारी को नहीं दिए गए, तो प्राकृतिक न्याय की आवश्यकताएं पूरी नहीं होतीं। इसी तरह विभाग की ओर से भेजे गए पत्रों की संख्या से निष्पक्षता साबित नहीं होती, यदि कर्मचारी की बार-बार की गई मूल मांगों पर कार्रवाई ही नहीं हुई।

    कोर्ट ने माना कि आपराधिक और विभागीय कार्यवाही अलग-अलग कानूनी क्षेत्रों में चलती हैं और केवल एफआईआर दर्ज होने से विभागीय आरोप साबित नहीं हो जाते। लेकिन इससे यह सवाल खत्म नहीं होता कि याचिकाकर्ता के खिलाफ इस्तेमाल की गई सामग्री उसकी पहुंच से बाहर क्यों रखी गई। दोनों कार्यवाहियों की स्वतंत्रता विभाग की इस जिम्मेदारी को और मजबूत करती है कि वह वैध जांच के जरिए अपने आरोप साबित करे।

    जांच रिपोर्ट के खिलाफ जवाब दाखिल नहीं करने के याचिकाकर्ता के आचरण पर हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कर्मचारी वास्तविक अवसर का इस्तेमाल नहीं करता, तो वह बाद में उसकी शिकायत नहीं कर सकता। हालांकि, ऐसा न करना पहले से अनिवार्य प्रक्रिया के उल्लंघन के कारण दोषपूर्ण हो चुकी जांच को वैध नहीं बना सकता।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिका लंबित रहने के दौरान 6 फरवरी 2004 को याचिकाकर्ता की मृत्यु हो जाने से मामला निरर्थक नहीं हो गया। बर्खास्तगी का आदेश उसके सेवा रिकॉर्ड, उसके खिलाफ तय की गई वसूली और उसके कानूनी वारिसों को मिलने वाले लाभों को प्रभावित करता रहा। रिटायरमेंट की तारीख को लेकर याचिकाकर्ता ने 31 मई 2004 और राज्य ने 31 मई 2002 का दावा किया। कोर्ट ने इस विवाद पर कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने 22 फरवरी 2001 का बर्खास्तगी आदेश रद्द कर दिया। इसके साथ ही वसूली और निलंबन अवधि के संबंध में जारी निर्देश भी निरस्त कर दिए गए।

    कोर्ट ने सेवा संबंधी और वित्तीय दावों, जिनमें कानूनी वारिसों को मिलने वाले सेवानिवृत्ति लाभ भी शामिल हैं, पर सक्षम प्राधिकारी को निर्णय लेने का निर्देश दिया। प्राधिकारी को फैसले की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने के चार महीने के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा। याचिकाकर्ता से पहले ही वसूल की गई किसी भी राशि को लौटाने के सवाल पर भी दोबारा विचार करने का निर्देश दिया गया।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बर्खास्तगी आदेश रद्द करने का आधार विभागीय जांच में हुई प्रक्रियागत खामियां हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को तथ्यात्मक रूप से झूठा घोषित कर दिया गया।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार की।


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