दो दशक से अधिक की सेवा के बाद ड्यूटी के समय के बाहर हुई घटना पर कोर्ट कर्मचारी को बर्खास्त करना हैरान करने वाली हद तक असंगत: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • दो दशक से अधिक की सेवा के बाद ड्यूटी के समय के बाहर हुई घटना पर कोर्ट कर्मचारी को बर्खास्त करना हैरान करने वाली हद तक असंगत: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दो दशक से अधिक समय तक सेवा देने वाले और जिसका पहले कोई प्रतिकूल सेवा रिकॉर्ड नहीं रहा हो ऐसे कोर्ट कर्मचारी को काम के घंटों के बाहर हुई घटना के आधार पर बर्खास्त करना हैरान करने वाली हद तक असंगत और अत्यधिक कठोर सजा है। अदालत ने कदाचार से जुड़े निष्कर्षों को बरकरार रखते हुए बर्खास्तगी की सजा रद्द की।

    जस्टिस गरिमा प्रसाद ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश अधीनस्थ न्यायालय कर्मचारी (दंड एवं अपील) नियम 1976 के नियम 7(4) के तहत अपीलीय प्राधिकारी के लिए सजा की मात्रा पर स्वतंत्र रूप से विचार करना अनिवार्य है। केवल यह कह देना कि कदाचार गंभीर था इस कानूनी आवश्यकता को पूरा नहीं करता।

    अदालत ने कहा,

    “हर कोर्ट कर्मचारी से अनुशासन और संयम की अपेक्षा की जाती है और साबित हुए आचरण के लिए सजा दिया जाना उचित था। हालांकि बर्खास्तगी के कारण याचिकाकर्ता की दो दशक से अधिक की सेवा और पेंशन संबंधी सुरक्षा समाप्त हो गई। इन तथ्यों में बर्खास्तगी साबित हुए कदाचार की तुलना में अनुचित रूप से कठोर और हैरान करने वाली हद तक असंगत है।”

    याचिकाकर्ता ने 1977 में चतुर्थ श्रेणी के पद पर सेवा शुरू की थी। पदोन्नति के बाद वह उन्नाव जिले के पुरवा स्थित सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की अदालत में डिप्टी नाजिर के रूप में कार्यरत था।

    उसके खिलाफ 1997 में चार आरोपपत्र जारी किए गए। ये आरोप 23 नवंबर 1994 को रात करीब नौ बजे पुरवा में तत्कालीन मुंसिफ मजिस्ट्रेट के आवास के पास हुई एक घटना से संबंधित थे। आरोप था कि उसने एक होमगार्ड के साथ दुर्व्यवहार किया नशे की हालत में न्यायिक अधिकारी के आवास पर पहुंचकर उनके साथ गाली-गलौज की और गश्त कर रही पुलिस ने उसे पकड़कर पुलिस अधिनियम की धारा 34 के तहत रातभर हिरासत में रखा।

    जांच अधिकारी ने होमगार्ड से दुर्व्यवहार से संबंधित पहले आरोप को साबित नहीं माना जबकि शेष तीन आरोपों को साबित पाया। इसके बाद जिला जज ने 21 दिसंबर 1998 को याचिकाकर्ता को सेवा से बर्खास्त कर दिया। निरीक्षण न्यायाधीश ने 1 दिसंबर 1999 को उसकी विभागीय अपील खारिज की।

    रिट याचिका लंबित रहने के दौरान 7 अप्रैल 2006 को याचिकाकर्ता की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को मामले में पक्षकार बनाया गया।

    याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि विभागीय जांच ऐसे दस्तावेजों पर आधारित थी, जिन्हें विधिवत साबित नहीं किया गया। कथित तौर पर उसकी चिकित्सकीय जांच करने वाले डॉक्टर और पुलिस रिकॉर्ड तैयार करने वाले अधिकारी को भी गवाही के लिए पेश नहीं किया गया। यह भी तर्क दिया गया कि जब पहला आरोप साबित नहीं हुआ, तो शेष आरोपों को स्वतंत्र रूप से बरकरार नहीं रखा जा सकता।

    इसके विपरीत राज्य की ओर से कहा गया कि रिट अदालत विभागीय अपील प्राधिकारी की तरह दोबारा साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं कर सकती।

    हाईकोर्ट ने विभागीय जांच में कोई खामी नहीं पाई। अदालत ने नोट किया कि जांच के दौरान छह गवाहों के बयान दर्ज किए गए और याचिकाकर्ता को उनसे जिरह करने का अवसर मिला। जिन दो अधिकारियों को गवाही के लिए पेश नहीं किया गया उनके संबंध में अदालत ने कहा कि वे प्रासंगिक गवाह थे लेकिन उनकी अनुपस्थिति मात्र से पूरी जांच अमान्य नहीं हो जाती।

    अदालत ने कहा,

    “ये प्रासंगिक गवाह थे लेकिन उनका पेश न होना जांच के लिए घातक नहीं था। उनकी अनुपस्थिति में मेडिकल और पुलिस दस्तावेजों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। हालांकि, इन दस्तावेजों के बिना भी मौखिक साक्ष्य और याचिकाकर्ता द्वारा की गई स्वीकारोक्तियां रिकॉर्ड पर मौजूद थीं।”

    हाईकोर्ट ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि पहला आरोप विफल होने से बाकी आरोप भी स्वतः समाप्त हो जाते हैं। अदालत ने कहा कि आरोप अलग-अलग कृत्यों से संबंधित थे और जांच अधिकारी ने प्रत्येक आरोप पर अलग से विचार किया। अनुशासनात्मक आदेश में भी उचित विचार-विमर्श किया गया।

    हालांकि अदालत ने अपीलीय आदेश में गंभीर कमी पाई। उसने कहा कि अपीलीय प्राधिकारी ने केवल यह लिखा कि रिकॉर्ड की जांच की गई और बर्खास्तगी के समर्थन में ठोस कारण मौजूद हैं। आदेश में न तो पहले आरोप के साबित न होने पर विचार किया गया और न ही शेष आरोपों की सीमित प्रकृति पर। इसके अलावा, याचिकाकर्ता की लंबी सेवा, पहले किसी प्रतिकूल रिकॉर्ड का अभाव और बर्खास्तगी की सजा जरूरत से ज्यादा कठोर होने के सवाल पर भी विचार नहीं किया गया।

    सजा की गंभीरता पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि साबित हुए आरोप एक ही घटना से जुड़े थे, जो सामान्य ड्यूटी के घंटों के बाहर हुई। इस घटना के कारण न तो किसी को शारीरिक चोट पहुंचने की बात सामने आई, न प्रतिष्ठान को कोई नुकसान हुआ और न ही याचिकाकर्ता को किसी आपराधिक मामले में दोषी ठहराया गया।

    अदालत ने माना कि असंगत सजा के मामलों में सामान्यतः मामला दोबारा विचार के लिए अनुशासनात्मक या अपीलीय प्राधिकारी के पास भेजा जाता है। लेकिन इस मामले में राहत को सीधे संशोधित करना उचित था। घटना को तीन दशक से अधिक समय बीत चुका था और मामला दोबारा भेजने से ऐसी अपील फिर से खुलती, जिसे याचिकाकर्ता स्वयं आगे नहीं बढ़ा सकता था।

    याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी के आदेश और अपीलीय आदेश को सजा की सीमा तक रद्द कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को 21 दिसंबर 1998 से 7 अप्रैल 2006 को उसकी मृत्यु तक केवल सेवा की निरंतरता, वेतन निर्धारण, सेवानिवृत्ति संबंधी लाभों और पेंशन के उद्देश्य से सेवा में निरंतर कार्यरत माना जाए।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि बर्खास्तगी के बाद याचिकाकर्ता ने वास्तव में कोई सेवा नहीं दी थी और उसके खिलाफ कदाचार के निष्कर्ष बरकरार हैं। इसलिए उसके कानूनी उत्तराधिकारी केवल 25 प्रतिशत बकाया वेतन पाने के हकदार होंगे।

    हाईकोर्ट ने उसकी विधवा को 7 अप्रैल 2006 से पारिवारिक पेंशन और उसकी पूरी स्वीकार्य बकाया राशि का हकदार माना। बकाया पेंशन में 25 प्रतिशत बकाया वेतन तक सीमित राहत के कारण कोई कटौती नहीं की जाएगी। अदालत ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे सेवा की काल्पनिक निरंतरता के आधार पर अन्य सभी सेवानिवृत्ति और मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभ भी तीन महीने के भीतर जारी करें।

    हालांकि, लंबे समय बीत जाने के कारण अनुकंपा नियुक्ति की मांग खारिज की गई।

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