विरोधी पक्ष किसी पक्षकार को मेरिट पर चुनौती जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
5 Nov 2026 11:57 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कोई पक्ष जब कोर्ट के सुपरवाइजरी अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए चुनौती दाखिल करता है, तो बाद में उसे आगे नहीं चलाना चाहने पर वह चुनौती वापस ले सकता है। ऐसा करने से चुनौती के तहत दिए गए आदेश या विरोधी पक्ष को उससे प्राप्त अधिकार प्रभावित नहीं होते।
कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि विरोधी पक्ष विवाद का मेरिट पर फैसला चाहता है, कार्यवाही जारी रखने के लिए याचिकाकर्ता को मजबूर नहीं किया जा सकता।
जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा,
“उच्चतर मंच के समक्ष चुनौती वापस लेने से अपने आप चुनौती के तहत आदेश वापस, रिकॉल, रद्द, संशोधित या निष्प्रभावी नहीं हो जाता। जहां उस आदेश से विरोधी पक्ष को कोई अधिकार या लाभ मिला है, वहां चुनौती वापस लेने से सामान्यतः निर्णय और उससे उत्पन्न अधिकार अप्रभावित रहते हैं, जब तक कि कानून के अनुसार उस आदेश को किसी अन्य तरीके से निरस्त या बदला न जाए।”
यह मामला मकान मालिकों और किरायेदारों के बीच किराये की संपत्ति को खाली कराने से संबंधित था। मकान मालिकों को निर्धारित प्राधिकारी ने 28 फरवरी 2013 को उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किराये पर देने, किराया और बेदखली का विनियमन) अधिनियम, 1972 की धारा 21(1)(a) के तहत किराये की संपत्ति रिलीज करने का आदेश दिया। किरायेदारों की धारा 22 के तहत अपील 17 दिसंबर 2021 को खारिज कर दी गई।
इसके बाद किरायेदारों ने हाईकोर्ट का रुख किया, जिसने 25 अप्रैल 2022 को दोनों आदेशों पर रोक लगाई।
याचिका लंबित रहने के दौरान किरायेदारों ने इसे वापस लेने का आवेदन दिया। उन्होंने दिवंगत जय नारायण अग्रवाल के परिवार के सदस्यों के बीच हुए पारिवारिक समझौते/मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) का हवाला दिया। किरायेदारों ने कहा कि उन्होंने 7 अप्रैल 2026 को श्री नरेंद्र कुमार अग्रवाल को श्री संजीव अग्रवाल और श्री मनीष अग्रवाल की सहमति से कब्जा सौंप दिया था।
मकान मालिकों ने याचिका वापस लेने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि 1 सितंबर 2023 से किराया नहीं दिया गया और रिलीज का आदेश अपील में बरकरार रहने के बाद उन्हें संपत्ति खाली कराने और कब्जा पाने का अधिकार मिल चुका है।
मकान मालिकों ने कब्जा सौंपने के दावे पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि श्री नरेंद्र कुमार अग्रवाल न तो सह-मालिक थे और न ही सह-मकान मालिक, और रिलीज की कार्यवाही में पक्षकार भी नहीं थे। वैकल्पिक रूप से उन्होंने किरायेदारों को बकाया किराया चुकाने का निर्देश देने की मांग की।
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 23 नियम 1 के तहत कार्यवाही वापस लेने से संबंधित सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिका वापस लेने की अनुमति देने की शक्ति का इस्तेमाल विरोधी पक्ष के पहले से अर्जित अधिकार को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में याचिका वापस लेने से न तो 28 फरवरी 2013 का आदेश समाप्त होगा और न ही 17 दिसंबर 2021 का आदेश वापस लिया जाएगा। दोनों आदेश प्रभावी बने रहेंगे। इसलिए किरायेदारों द्वारा चुनौती छोड़ देने से मकान मालिकों को कोई नुकसान नहीं होगा।
बकाया किराया चुकाने को याचिका वापस लेने की शर्त बनाने की मांग पर कोर्ट ने कहा,
“कथित बकाया राशि का भुगतान या जमा करना याचिका वापस लेने की अनुमति की शर्त बनाने के लिए इस कोर्ट को वापसी आवेदन पर फैसला करते समय विवादित मौद्रिक देनदारी के अस्तित्व और उसकी सीमा की जांच करनी होगी। मौजूदा चुनौती को आगे नहीं चलाने की याचिकाकर्ताओं की अनुमति तय करने के लिए ऐसी जांच आवश्यक नहीं है।”
कोर्ट ने याचिका वापस लेने का आवेदन स्वीकार करते हुए याचिका को वापस ली गई मानकर खारिज किया। हालांकि, कोर्ट ने उसी कारण और विवाद को दोबारा उठाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के तहत नई याचिका दाखिल करने की अनुमति नहीं दी। यह प्रतिबंध सरगुजा ट्रांसपोर्ट सर्विस बनाम स्टेट ट्रांसपोर्ट अपीलेट ट्रिब्यूनल, मध्य प्रदेश, ग्वालियर मामले में निर्धारित सिद्धांत के अधीन रहेगा।
अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिया गया। कोर्ट ने कथित तौर पर कब्जा सौंपने, कब्जा मेमो, पारिवारिक समझौते या किराये के बकाये के संबंध में कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया। इन सभी मुद्दों को सक्षम मंच के निर्णय के लिए छोड़ दिया गया।

