सिर्फ याचिकाकर्ता का निवास क्षेत्राधिकार नहीं देता: बाहर पारित आदेश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका नहीं चलेगी

Amir Ahmad

1 Sept 2026 4:11 PM IST

  • सिर्फ याचिकाकर्ता का निवास क्षेत्राधिकार नहीं देता: बाहर पारित आदेश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका नहीं चलेगी

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोहराया कि किसी याचिकाकर्ता का हाईकोर्ट के क्षेत्राधिकार में रहने मात्र से उस अदालत को ऐसे आदेश के खिलाफ रिट याचिका सुनने का अधिकार नहीं मिल जाता, जो उसके क्षेत्राधिकार से बाहर स्थित प्राधिकारी ने पारित किया हो।

    जस्टिस अनिश कुमार गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की पीठ के फैसले लेफ्टिनेंट कर्नल खजूर सिंह बनाम भारत संघ पर भरोसा करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के क्षेत्राधिकार का निर्धारण इस आधार पर होता है कि जिस प्राधिकारी के आदेश को चुनौती दी गई है, वह कहां स्थित है। केवल प्रभावित व्यक्ति का निवास स्थान क्षेत्राधिकार का आधार नहीं बन सकता।

    मामले में याचिकाकर्ता ने हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा स्थित 9 फील्ड ऑर्डनेंस डिपो में ट्रेड्समैन मेट, जिसे पहले मजदूर कहा जाता था, के पद के लिए आवेदन किया था। वह अन्य पिछड़ा वर्ग के पुरुष अभ्यर्थी के रूप में चयन प्रक्रिया के सभी चरणों में सफल रहा था।

    हालांकि, उसके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित होने के आधार पर उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई और नियुक्ति पत्र वापस ले लिया गया। इसके बाद उसने डिपो के प्रशासनिक अधिकारी की ओर से पारित आदेश रद्द कराने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।

    सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों की ओर से प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के पास मामले की सुनवाई का क्षेत्राधिकार नहीं है, क्योंकि विवादित आदेश पारित करने वाला प्राधिकारी हिमाचल प्रदेश में स्थित है। केवल याचिकाकर्ता के उत्तर प्रदेश में रहने के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट इस मामले की सुनवाई नहीं कर सकता।

    प्रतिवादियों ने सुप्रीम कोर्ट के लेफ्टिनेंट कर्नल खजूर सिंह मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार याचिकाकर्ता के निवास या स्थान पर निर्भर नहीं करता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि जिस व्यक्ति या प्राधिकारी के खिलाफ रिट मांगी गई, वह हाईकोर्ट के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र में स्थित है या नहीं।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि मामले से संबंधित दोनों प्रतिवादी प्राधिकारी कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश में स्थित हैं। वर्ष 2015 में फायरमैन, ट्रेड्समैन मेट और मल्टी-टास्किंग स्टाफ के पदों के लिए जारी विज्ञापन भी वहीं से जारी हुआ। पूरी चयन प्रक्रिया हिमाचल प्रदेश में हुई और याचिकाकर्ता के खिलाफ विवादित आदेश भी वहीं पारित किया गया।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि उसके पास याचिका सुनने का क्षेत्राधिकार नहीं है। कोर्ट ने क्षेत्राधिकार के अभाव में याचिका खारिज की।

    हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को अपनी शिकायत के निवारण के लिए सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता दी।

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