राजस्व अभिलेख रद्द नहीं हुआ तो केवल जालसाजी के आरोप से उसे फर्जी नहीं माना जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

5 Sept 2026 3:23 PM IST

  • राजस्व अभिलेख रद्द नहीं हुआ तो केवल जालसाजी के आरोप से उसे फर्जी नहीं माना जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सक्षम राजस्व प्राधिकारी या अदालत द्वारा रद्द, संशोधित या निरस्त नहीं की गई राजस्व प्रविष्टि को केवल दूसरे पक्ष के जालसाजी के आरोप के आधार पर फर्जी नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्व प्रविष्टि अपने आप में स्वामित्व का अधिकार पैदा नहीं करती लेकिन जब तक वह कायम है उसके साक्ष्यात्मक महत्व को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस अनिल कुमार-X ने स्थायी निषेधाज्ञा से जुड़े मामले में यह टिप्पणी करते हुए अपील खारिज की। अदालत ने कहा कि किसी राजस्व प्रविष्टि को गलत या फर्जी बताने वाले पक्ष को सक्षम मंच के समक्ष उस आरोप को साबित करना होगा।

    पीठ ने कहा,

    “राजस्व प्रविष्टि अपने आप में स्वामित्व पैदा नहीं कर सकती लेकिन मौजूद और चुनौतीरहित प्रविष्टि को केवल दूसरे पक्ष के आरोप के आधार पर फर्जी या विचार से बाहर नहीं किया जा सकता। उसका साक्ष्यात्मक महत्व रिकॉर्ड पर मौजूद पूरे साक्ष्य के संदर्भ में देखा जाना होगा।”

    मामला कानपुर के जूही कला गांव में स्थित मकान संख्या 127/डब्ल्यू/1807-ए और 23 बीघा 12 बिस्वा क्षेत्रफल वाली आराजी संख्या 1807 से जुड़ा था। वादी ने कानपुर विकास प्राधिकरण द्वारा उसके कब्जे में हस्तक्षेप किए जाने से रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की।

    वादी का दावा था कि विवादित जमीन उसे तत्कालीन जमींदार स्वर्गीय शिवरानी कुंवर द्वारा 7 मई 1945 को किए गए पट्टे के आधार पर मिली थी और वह 1 जुलाई 1952 से जमीन पर कब्जे में था।

    कानपुर विकास प्राधिकरण ने पट्टे को फर्जी बताते हुए दावा किया कि आराजी संख्या 1807 को 16 अक्टूबर 1958 के अवार्ड संख्या एक के तहत अधिग्रहित किया गया और 18 अक्टूबर 1958 को उसका कब्जा भी ले लिया गया। अन्य प्रतिवादियों ने आरोप लगाया कि वादी ने धोखाधड़ी करके राजस्व अभिलेखों में अपना नाम दर्ज कराया।

    ट्रायल कोर्ट ने पाया कि वादी के पक्ष में दर्ज राजस्व प्रविष्टियों में कथित जालसाजी साबित नहीं हुई। अदालत ने यह भी माना कि विवादित जमीन के अधिग्रहण का दावा पूरी तरह साबित नहीं हुआ, क्योंकि अवार्ड के पैरा 17 में आराजी संख्या 1807 की केवल दो बीघा जमीन का उल्लेख था।

    ट्रायल कोर्ट ने पट्टे को कानूनी अधिकार पैदा करने में प्रभावहीन माना लेकिन दो कमरों के निर्माण के संबंध में वादी के पक्ष में फैसला दिया क्योंकि उस हिस्से पर उसका कब्जा साबित पाया गया।

    इसके खिलाफ अपील में विकास प्राधिकरण ने दलील दी कि जब पट्टा स्वामित्व का अधिकार नहीं देता तो बाद की राजस्व प्रविष्टियां भी वादी के दावे का आधार नहीं बन सकतीं। यह भी कहा गया कि स्वामित्व की घोषणा के बिना स्थायी निषेधाज्ञा नहीं दी जा सकती।

    हाईकोर्ट ने इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट के अनथुला सुधाकर बनाम पी. बुच्ची रेड्डी के फैसले का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि स्वामित्व को लेकर इनकार होने से उस पर संदेह तभी माना जाएगा, जब ऐसी स्थिति में अधिकार की घोषणा जरूरी हो। मौजूदा मामले में वादी के पूर्ववर्ती के पक्ष में फसली 1356 की राजस्व प्रविष्टि अधिग्रहण से पहले की थी और उसे कभी रद्द नहीं किया गया।

    अदालत ने यह भी पाया कि प्राधिकरण जिस फसली 1394 की प्रविष्टि पर भरोसा कर रहा था वह अलग महाल से संबंधित थी। पीठ ने कहा कि किसी प्रविष्टि का स्रोत क्या है और वह आज भी रिकॉर्ड में कायम है या नहीं ये दोनों अलग-अलग प्रश्न हैं।

    कब्जे के सवाल पर भी हाईकोर्ट ने वादी के पक्ष में महत्वपूर्ण साक्ष्य पाया। अदालत ने कहा कि विकास प्राधिकरण की ओर से जारी वह नोटिस, जिसमें मौके पर बने निर्माण को हटाने के लिए कहा गया, स्वयं इस बात की पुष्टि करता है कि वादी द्वारा बताए गए स्थान पर निर्माण मौजूद था। आयुक्त की रिपोर्ट और बचाव पक्ष के गवाह के बयान से भी इसकी पुष्टि हुई।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला केवल उस हिस्से तक सीमित था, जिस पर वादी का कब्जा साबित हुआ था। ऐसे में केवल इसलिए निषेधाज्ञा से इनकार नहीं किया जा सकता कि वादी ने स्वामित्व की घोषणा नहीं कराई।

    पीठ ने कहा,

    “स्थायी निषेधाज्ञा के मुकदमे में जब वादी अपना कब्जा साबित कर देता है और प्रतिवादी उस कब्जे में हस्तक्षेप करने का बेहतर अधिकार साबित नहीं कर पाता तो केवल इस आधार पर राहत से इनकार नहीं किया जा सकता कि वादी ने स्वामित्व की घोषणा नहीं कराई है, खासकर तब जब उसके पक्ष की मौजूदा राजस्व प्रविष्टि कायम है।”

    इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने विकास प्राधिकरण की अपील खारिज की और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई निषेधाज्ञा बरकरार रखी।

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