पूर्व कैबिनेट मंत्री का पद मोटर दुर्घटना मुआवजे में आय का प्रमाण नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

17 Sept 2026 1:49 PM IST

  • पूर्व कैबिनेट मंत्री का पद मोटर दुर्घटना मुआवजे में आय का प्रमाण नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजे से जुड़े एक मामले में कहा कि किसी व्यक्ति की सामाजिक या पेशेवर प्रतिष्ठा के आधार पर उसकी आय तय नहीं की जा सकती। मृतक की आय का निर्धारण रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आयकर रिटर्न प्रासंगिक साक्ष्य हो सकता है, लेकिन केवल आयकर रिटर्न दाखिल कर देने से उसमें घोषित आय स्वतः प्रमाणित नहीं हो जाती।

    जस्टिस अनिल कुमार-X ने कहा कि मोटर दुर्घटना के दावे में भी साक्ष्यों के मूल्यांकन के सामान्य सिद्धांतों को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि मृतक सामाजिक या पेशेवर रूप से प्रतिष्ठित व्यक्ति था। अनुमान प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।

    मामला नंद लाल सिंह पटेल की मौत से जुड़ा था। 15 मई 1999 को इलाहाबाद-रायबरेली मार्ग पर मलाकिया गांव के पास तेज और लापरवाही से चलाए जा रहे ट्रक ने उस टाटा सूमो को टक्कर मार दी, जिसमें नंद लाल सिंह पटेल सवार थे। हादसे में उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

    मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने पाया था कि मृतक की उम्र करीब 48 वर्ष थी और वह वकील के रूप में काम करते थे। वह एक राजनीतिक दल से जुड़े थे और उत्तर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री भी रह चुके थे। अधिकरण ने आकलन वर्ष 1999-2000 के आयकर रिटर्न के आधार पर उनकी वार्षिक आय 90 हजार रुपये मानी थी।

    अधिकरण ने आय में से एक-तिहाई हिस्सा व्यक्तिगत खर्च के लिए घटाया और 13 का गुणक लागू करते हुए कुल 7,84,500 रुपये का मुआवजा निर्धारित किया। इसमें अंतिम संस्कार के लिए 2 हजार रुपये और संपत्ति के नुकसान के लिए 2,500 रुपये भी शामिल है।

    मृतक के परिजनों ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की। उनकी ओर से दलील दी गई कि मृतक के पेशे और सामाजिक स्थिति को देखते हुए अधिकरण ने उनकी आय कम आंकी है। दावा किया गया कि आयकर रिटर्न में वार्षिक आय 1.60 लाख रुपये दिखाई गई थी, जिसे गलत तरीके से स्वीकार नहीं किया गया। परिजनों ने भविष्य की संभावित आय में वृद्धि का लाभ देने और आश्रितों की संख्या को देखते हुए व्यक्तिगत खर्च के लिए एक-तिहाई के बजाय एक-पांचवां हिस्सा घटाने की भी मांग की।

    बीमा कंपनी की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि न तो दावा की गई आय और न ही संबंधित आयकर रिटर्न को विधिवत प्रमाणित किया गया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि आयकर रिटर्न निश्चित रूप से प्रासंगिक साक्ष्य है और यदि उसे विधिवत साबित किया गया हो तथा अन्य सामग्री से उसका समर्थन होता हो तो वह आय निर्धारित करने का विश्वसनीय आधार बन सकता है। लेकिन केवल आयकर रिटर्न दाखिल कर देना उसमें दर्ज आय को हर मामले में निर्णायक रूप से साबित नहीं करता।

    कोर्ट ने पाया कि दावा की गई आय के समर्थन में कोई अन्य संतोषजनक साक्ष्य उपलब्ध नहीं था। इसलिए अधिकरण द्वारा 1.60 लाख रुपये की आय को स्वीकार नहीं करना गलत नहीं था। पीठ ने यह भी कहा कि अधिकरण ने 90 हजार रुपये की जो आय मानी थी, वह भी परिस्थितियों को देखते हुए अधिक ही थी।

    भविष्य की संभावित आय में वृद्धि के दावे पर हाईकोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि 40 से 50 वर्ष की उम्र वाले स्व-रोजगार व्यक्ति या निश्चित वेतन पाने वाले व्यक्ति की प्रमाणित आय में 25 प्रतिशत की वृद्धि का सिद्धांत लागू होता है।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भविष्य की संभावित आय का लाभ उस आय पर दिया जाता है, जो पहले उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्धारित हो चुकी हो। जिस अधिक आय का दावा ही प्रमाणित नहीं हुआ, उसे बढ़ाने के लिए भविष्य की संभावित आय के सिद्धांत का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

    व्यक्तिगत खर्च के लिए एक-तिहाई के बजाय एक-पांचवां हिस्सा घटाने की मांग भी कोर्ट ने स्वीकार नहीं की। पीठ ने कहा कि दुर्घटना वर्ष 1999 की है और अधिकरण ने उस समय मोटर वाहन अधिनियम की दूसरी अनुसूची में निर्धारित पद्धति के आधार पर मुआवजा तय किया। बाद में सरला वर्मा बनाम दिल्ली परिवहन निगम मामले में तय सिद्धांतों के आधार पर उस पुराने मामले के मुआवजे की गणना को दोबारा नहीं खोला जा सकता।

    गैर-आर्थिक मदों में अधिक मुआवजा देने की मांग पर भी हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलीय अदालत को मुआवजे के पूरे पुरस्कार का समग्र रूप से परीक्षण करना चाहिए, न कि हर मद में अलग-अलग राशि बढ़ाने की प्रक्रिया अपनानी चाहिए।

    सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकरण द्वारा दिया गया मुआवजा इतना कम नहीं था कि उसमें और वृद्धि की जरूरत हो। कोर्ट ने मुआवजा बढ़ाने से इनकार करते हुए अपील में हस्तक्षेप नहीं किया।

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