बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के शिक्षकों की नियुक्ति में UGC के विशेष नियम होंगे लागू, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द किया कुलाधिपति का आदेश
Amir Ahmad
16 Oct 2026 11:36 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन और प्रबंधन विषयों के शिक्षकों की नियुक्ति के लिए निर्धारित विशेष शैक्षणिक योग्यताएं ही लागू होंगी। विश्वविद्यालय के सामान्य पात्रता नियमों के आधार पर इन विशेष योग्यताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने इस आधार पर लखनऊ विश्वविद्यालय में दो एसोसिएट प्रोफेसरों की नियुक्तियां रद्द करने के कुलाधिपति का आदेश निरस्त किया।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने डॉ. हिमांशु मोहन और डॉ. संगीता साहू की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय के प्रथम परिनियमों में बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के शिक्षकों के लिए निर्धारित विशेष पात्रता शर्तें सामान्य पात्रता मानदंडों पर प्रभावी होंगी।
मामले के अनुसार लखनऊ विश्वविद्यालय ने 10 अगस्त 2015 को बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पदों के लिए विज्ञापन जारी किया। इसके बाद 11 फरवरी 2016 को डॉ. हिमांशु मोहन और डॉ. संगीता साहू की नियुक्ति की गई।
एक अन्य अभ्यर्थी डॉ. रितु नारंग ने उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की धारा 68 के तहत कुलाधिपति के समक्ष शिकायत दर्ज कराई।
उन्होंने आरोप लगाया कि चयन समिति का गठन सही तरीके से नहीं हुआ और दोनों चयनित अभ्यर्थियों ने डॉक्टरेट शोधार्थियों तथा शोध विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करने से संबंधित आवश्यक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए। वाणिज्य संकाय के सामान्य पात्रता मानदंडों के तहत ऐसे प्रमाण जरूरी थे।
कुलाधिपति ने चयन समिति के गठन से जुड़ी आपत्ति खारिज कर दी, लेकिन शोधार्थियों के मार्गदर्शन से संबंधित प्रमाणों के मुद्दे को स्वीकार करते हुए 27 नवंबर 2017 को दोनों नियुक्तियां रद्द की।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि विश्वविद्यालय के प्रथम परिनियमों के नियम 11.03.04(जी) में प्रबंधन और बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के शिक्षकों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के वर्ष 2010 के नियमों के अनुरूप विशेष योग्यताएं निर्धारित थीं। ये प्रावधान 3 दिसंबर 2013 से लागू थे और सामान्य पात्रता मानदंडों की तुलना में अधिक विशिष्ट थे। उन्होंने यह भी कहा कि चयन प्रक्रिया के दौरान चयन समिति ने उनसे संबंधित दस्तावेज मांगे ही नहीं थे।
दूसरी ओर विरोधी पक्ष की दलील थी कि चूंकि बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग वाणिज्य संकाय के अंतर्गत आता है, इसलिए उस संकाय के सामान्य पात्रता मानदंड लागू होने चाहिए।
हाईकोर्ट ने पाया कि नियुक्तियों के समय विश्वविद्यालय में प्रबंधन या बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन का अलग संकाय मौजूद नहीं था। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी विभाग का किसी संकाय के अंतर्गत होना अपने आप में वहां नियुक्तियों के लिए निर्धारित विशेष पात्रता नियमों को निष्प्रभावी नहीं करता।
पीठ ने कहा कि प्रथम परिनियमों का नियम 11.03.01 सामान्य पात्रता मानदंड निर्धारित करता है, जबकि नियम 11.03.04(जी) प्रबंधन और बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के शिक्षकों के लिए विशेष योग्यताएं तय करता है। इसलिए विशेष प्रावधान को सामान्य प्रावधान पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अदालत ने कहा कि वर्ष 2010 के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों को प्रथम परिनियमों में शामिल किए जाने के बाद विश्वविद्यालय के लिए इन नियमों के विपरीत नियुक्तियां करना उचित नहीं था। कुलाधिपति ने नियुक्तियां रद्द करते समय इस संशोधन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
दस्तावेजों के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर चयन को अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि अभ्यर्थियों ने संबंधित प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए, खासकर तब जब चयन समिति ने चयन प्रक्रिया के दौरान उन दस्तावेजों की मांग ही नहीं की थी।
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि कुलाधिपति का 27 नवंबर 2017 का आदेश तथ्यों और कानून की गलत समझ पर आधारित है। अदालत ने आदेश निरस्त करते हुए दोनों याचिकाएं स्वीकार कर लीं। साथ ही, दोनों शिक्षकों के चयन को उचित ठहराया और उन्हें नियुक्तियों से जुड़े सभी परिणामी लाभ पाने का हकदार माना।

