आवंटन पत्र जारी होने से पहले नीलामी राशि पर ब्याज नहीं वसूल सकता DLA: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
27 July 2026 12:35 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) किसी भूखंड के सफल बोलीदाता से आवंटन पत्र जारी होने से पहले नीलामी राशि पर ब्याज नहीं वसूल सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नीलामी की शर्तों के अनुसार किस्तों का भुगतान आवंटन पत्र जारी होने के बाद ही देय होता है, इसलिए उससे पहले ब्याज या दंडात्मक ब्याज लगाने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने कहा,
"नीलामी की शर्तों से स्पष्ट है कि आवंटन पत्र जारी किए बिना सफल बोलीदाता पर कोई ब्याज नहीं लगाया जा सकता। इसलिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके आधार पर लखनऊ विकास प्राधिकरण ने देरी से भुगतान के नाम पर ब्याज लगाया हो।"
मामला
याचिकाकर्ता कंपनी रियल एस्टेट और होटल व्यवसाय से जुड़ी है। उसने वर्ष 2007 में होटल निर्माण के लिए एलडीए की ओर से आयोजित भूखंडों की नीलामी में सबसे ऊंची बोली लगाई थी। कंपनी ने 8,800 रुपये प्रति वर्गमीटर के आरक्षित मूल्य के मुकाबले 12,050 रुपये प्रति वर्गमीटर की बोली लगाई थी। नीलामी में कुल 11 लोगों ने हिस्सा लिया था।
इसके बावजूद DLA ने यह कहते हुए नीलामी रद्द कर दी कि पास के व्यावसायिक भूखंड की बोली 35,500 रुपये प्रति वर्गमीटर तक पहुंची थी इसलिए यह बोली कम है।
याचिकाकर्ता ने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी। बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ और वर्ष 2015 में DLA ने भूखंड आवंटित करने पर सहमति जताई, लेकिन 2007 से 2015 तक की अवधि का ब्याज भी जमा कराने की शर्त लगाई।
कोर्ट ने पाया कि नीलामी की क्लॉज-10 के अनुसार, सफल बोलीदाता को बोली स्वीकार होने के सात दिन के भीतर कुल राशि का 35 प्रतिशत जमा करना होता है। इसके बाद आवंटन पत्र जारी किया जाता है। आवंटन पत्र मिलने के एक महीने के भीतर 15 प्रतिशत राशि जमा करनी होती है और शेष 50 प्रतिशत राशि चार त्रैमासिक किस्तों में 15 प्रतिशत ब्याज के साथ देय होती है। यदि इन किस्तों के भुगतान में देरी होती है, तभी 18 प्रतिशत दंडात्मक ब्याज लगाया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि जब तक आवंटन पत्र जारी ही नहीं हुआ था, तब तक किस्तें देय नहीं थीं। ऐसे में उस अवधि का ब्याज वसूलना पूरी तरह अवैध है।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि भविष्य में अधिक बोली मिलने की संभावना थी, पहले से संपन्न वैध नीलामी को रद्द नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने 6 फरवरी 1997 के सरकारी आदेश का हवाला देते हुए कहा कि यदि सबसे ऊंची बोली आरक्षित मूल्य से अधिक है और उसमें किसी प्रकार की धोखाधड़ी या तथ्य छिपाने का मामला नहीं है, तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। इस मामले में 11 लोगों ने नीलामी में भाग लिया और किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी का आरोप नहीं है। इसलिए LDA द्वारा नीलामी रद्द करना मनमाना और कानून के विपरीत है।
हाईकोर्ट ने 24 दिसंबर 2024 और 11 अप्रैल, 2025 के DLA के आदेशों को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता से केवल नीलामी की शर्तों के अनुसार ही राशि वसूली जाए। साथ ही LDA को नया आदेश जारी कर नियमानुसार भूखंड का कब्जा सौंपने का निर्देश दिया।


