जाति प्रमाणपत्र खारिज करने के लिए सिर्फ साक्ष्य अभाव लिखना पर्याप्त नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द किया आदेश
Amir Ahmad
10 Aug 2026 4:47 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जाति प्रमाणपत्र के आवेदन को केवल साक्ष्य अभाव लिखकर खारिज करना वैध और कारणयुक्त आदेश नहीं माना जा सकता। विभाग की वेबसाइट पर ऐसा अस्वीकृति पत्र डाल देना भी उसे 'स्पीकिंग ऑर्डर' नहीं बनाता।
जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने कहा कि किसी प्रशासनिक आदेश में भी निर्णय के स्पष्ट कारण दर्ज होना जरूरी है। साथ ही, जिस आदेश की संबंधित व्यक्ति को जानकारी ही नहीं दी गई हो, वह उसके खिलाफ प्रभावी नहीं हो सकता।
मामला मथुरा निवासी भाई-बहन से जुड़ा था, जिन्होंने अनुसूचित जाति की धनगर जाति से संबंधित जाति प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया। उन्होंने अपने आवेदन के साथ आधार कार्ड, परिवार रजिस्टर, ग्राम प्रधान का पत्र और स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र सहित विभिन्न दस्तावेज प्रस्तुत किए।
याचिकाकर्ताओं ने 24 जनवरी 2019 के उस शासनादेश का भी हवाला दिया, जिसमें संबंधित जाति के लोगों को जाति प्रमाणपत्र जारी करने के संबंध में स्पष्टीकरण दिया गया। हालांकि, उनका आवेदन 23 फरवरी 2026 को खारिज कर दिया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्हें न तो अस्वीकृति का कोई स्पष्ट कारण बताया गया और न ही संबंधित रिपोर्ट उपलब्ध कराई गई। विभाग की वेबसाइट पर जारी अस्वीकृति पत्र में केवल 'साक्ष्य अभाव' लिखा गया।
राज्य की ओर से अतिरिक्त मुख्य स्थायी वकील ने स्वीकार किया कि आदेश में कोई विशिष्ट कारण दर्ज नहीं किया गया। हालांकि, उनका कहना था कि इसका अर्थ यह था कि याचिकाकर्ताओं ने 'धनगर' जाति का दावा साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए और आवेदन पर निर्णय लेने से पहले राजस्व विभाग ने एक रिपोर्ट भी मंगाई।
हाईकोर्ट ने इस मामले में दो प्रमुख सवालों पर विचार किया। पहला, क्या किसी प्रशासनिक प्राधिकारी द्वारा आवेदन खारिज करने से पहले संबंधित व्यक्ति को सुनवाई और कारण दिए जाना जरूरी है। दूसरा, क्या बिना कारणयुक्त आदेश के केवल विभाग की वेबसाइट पर प्रदर्शित अस्वीकृति को वैध माना जा सकता है।
पहले सवाल पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना कारण वाला आदेश कायम नहीं रह सकता। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों पर भी निर्णय लेते समय निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने की जिम्मेदारी है।
कोर्ट ने कहा,
“कारण दर्ज करना इसलिए और अधिक आवश्यक हो जाता है, ताकि प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रदर्शित हो और यह स्पष्ट हो कि निर्णय मनमाने ढंग से नहीं लिया गया।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि आवेदक को उसके आवेदन के खिलाफ इस्तेमाल की गई रिपोर्ट या सामग्री उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि वह कमियों को दूर कर सके या उस पर अपनी आपत्ति दर्ज करा सके।
हाईकोर्ट ने कहा,
“याचिकाकर्ताओं को न तो व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया गया और न ही कथित रिपोर्ट उपलब्ध कराई गई, ताकि वे कमियों को दूर कर सकें या उस पर आपत्ति दाखिल कर सकें।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी की विभागीय फाइल में दर्ज टिप्पणी या राय अपने आप में अंतिम और प्रभावी आदेश नहीं बन जाती। किसी निर्णय को प्रभावी होने के लिए संबंधित व्यक्ति तक उसका विधिवत संचार होना आवश्यक है।
कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में अस्वीकृति आदेश में यह तक स्पष्ट नहीं किया गया कि कौन-से साक्ष्य अपर्याप्त थे। ऐसे में केवल 'साक्ष्य अभाव' लिखना कानून की नजर में पर्याप्त कारण नहीं है।
हाईकोर्ट ने यह भी गंभीरता से नोट किया कि इस तरह के मामलों से संबंधित बड़ी संख्या में याचिकाएं उसके सामने आ रही हैं, क्योंकि विभागीय वेबसाइट पर बिना कारण बताए अस्वीकृति पत्र डाल दिए जाते हैं और आवेदकों को न तो विस्तृत आदेश दिया जाता है और न ही उस रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध कराई जाती है जिसके आधार पर आवेदन खारिज किया गया।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में अपील का अधिकार भी प्रभावी नहीं रह जाता, क्योंकि आवेदक को यह पता ही नहीं होता कि उसका आवेदन किस आधार पर खारिज किया गया।
इसके बाद हाईकोर्ट ने 23 फरवरी 2026 का अस्वीकृति आदेश रद्द किया और जाति प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया के लिए विस्तृत निर्देश जारी किए।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि आवेदन पर विचार करने से पहले अधिकारियों द्वारा मंगाई गई रिपोर्ट आवेदक को उपलब्ध कराई जाए। आवेदक को रिपोर्ट पर आपत्ति दाखिल करने और उसमें बताई गई कमियों को दूर करने का उचित अवसर दिया जाए। इसके बाद संबंधित प्राधिकारी को स्पष्ट कारणों वाला आदेश पारित करना होगा।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पारित आदेश की प्रति सात दिनों के भीतर आवेदक तक पहुंचाई जाए और आवेदन दाखिल होने की तारीख से दो महीने के भीतर पूरी प्रक्रिया पूरी की जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रशासन चाहे तो अपनी वेबसाइट पर अस्वीकृति आदेश और उसके आधार में शामिल रिपोर्ट का लिंक भी उपलब्ध करा सकता है, ताकि आवेदक विस्तृत कारण और रिपोर्ट डाउनलोड कर सके।
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को आदेश की प्रति राज्य के सभी जिलों, तहसील स्तर समेत संबंधित अधिकारियों को भेजने का निर्देश दिया। साथ ही, इन निर्देशों के अनुरूप तीन महीने के भीतर मानक प्रक्रिया तैयार करने पर विचार करने को कहा।
इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार की।
अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें


