पुलिस भर्ती फॉर्म में लंबित मुकदमे की जानकारी न देना अपने आप में गलत घोषणा नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द किया चयन रद्द करने का आदेश

  • पुलिस भर्ती फॉर्म में लंबित मुकदमे की जानकारी न देना अपने आप में गलत घोषणा नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द किया चयन रद्द करने का आदेश

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस भर्ती के आवेदन पत्र में अभ्यर्थी से केवल यह पूछा गया हो कि क्या उसे किसी अदालत ने दोषी ठहराया और लंबित आपराधिक मामले की जानकारी देने के लिए कोई अलग कॉलम या सवाल न हो, तो केवल लंबित मुकदमे का खुलासा नहीं करने के आधार पर अभ्यर्थी को गलत घोषणा करने वाला या जानबूझकर तथ्य छिपाने वाला नहीं माना जा सकता।

    जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी ने कहा कि अभ्यर्थी से किसी तथ्य का स्पष्ट रूप से खुलासा करने के लिए पूछा ही नहीं गया हो तो आवेदन के समय उस तथ्य की जानकारी न देना अपने आप में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय मानकों के तहत गलत घोषणा या जानबूझकर तथ्य छिपाने के बराबर नहीं माना जा सकता।

    मामला उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही पद पर भर्ती से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने 29 दिसंबर 2015 के विज्ञापन के आधार पर फरवरी 2016 में ऑनलाइन आवेदन किया था।

    आवेदन पत्र में पहले से निर्धारित घोषणा थी कि अभ्यर्थी को किसी अदालत ने कभी दोषी नहीं ठहराया। हालांकि, लंबित आपराधिक मुकदमे की जानकारी देने के लिए आवेदन पत्र में कोई अलग कॉलम नहीं था।

    विज्ञापन की धारा 7 में बोर्ड को महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने या आपराधिक मुकदमे के लंबित होने की स्थिति में अभ्यर्थिता रद्द करने का अधिकार दिया गया।

    याचिकाकर्ता ने शारीरिक दक्षता परीक्षा पास कर ली और चयन की प्रक्रिया में आगे बढ़ा। पुलिस सत्यापन के दौरान पता चला कि उसके खिलाफ वर्ष 2014 में पीलीभीत जिले के बीसलपुर थाने में भारतीय दंड संहिता की धाराओं 323, 325, 504 और 506 के तहत मामला दर्ज हुआ। मुकदमा उस समय लंबित था।

    बाद में 25 अगस्त 2018 को याचिकाकर्ता को मामले में बरी कर दिया गया। मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष के गवाहों ने कहा था कि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं थी।

    इसके बाद नए सिरे से चरित्र सत्यापन किया गया। पीलीभीत के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने याचिकाकर्ता को उपयुक्त पाया और उसे सीतापुर में प्रशिक्षण के लिए भेज दिया गया। हालांकि, सीतापुर के पुलिस अधीक्षक ने 2 जनवरी 2019 को आपराधिक पृष्ठभूमि और गलत घोषणा के आधार पर उसकी अभ्यर्थिता रद्द की।

    इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि आवेदन में की गई घोषणा तथ्यात्मक रूप से सही थी, क्योंकि उसे किसी अदालत ने दोषी नहीं ठहराया।

    यह भी बताया गया कि FIR दर्ज होने के समय याचिकाकर्ता की उम्र करीब 17 वर्ष थी और उस पर लगाए गए आरोप मामूली प्रकृति के थे। बाद में उसे मुकदमे में बरी भी कर दिया गया।

    राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि विज्ञापन की धारा 7 के तहत याचिकाकर्ता को लंबित मामले की जानकारी देनी चाहिए थी। यह भी कहा गया कि उसने आवेदन पत्र के अलावा नियुक्ति के समय दिए गए शपथपत्र में भी मामले की जानकारी छिपाई।

    राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि अनुशासित पुलिस बल में भर्ती के लिए अभ्यर्थी के चरित्र और आचरण की जांच का मानक अधिक कठोर होना चाहिए।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह बनाम भारत संघ के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने के आरोप में नियोक्ता का अधिकार असीमित नहीं है। मामले में यह देखना जरूरी है कि क्या अभ्यर्थी से संबंधित तथ्य का खुलासा करने के लिए स्पष्ट रूप से पूछा गया था, अपराध की प्रकृति क्या थी, मामले का परिणाम क्या रहा और अपराध के समय अभ्यर्थी की उम्र कितनी थी।

    अदालत ने राम कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें संबंधित सरकारी आदेश की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया गया कि प्रत्येक मामले में तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग विचार किया जाना जरूरी है।

    हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज मामला आपसी विवाद से उत्पन्न हुआ और इसमें नैतिक अधमता का कोई तत्व नहीं था।

    अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता को केवल संदेह का लाभ देकर नहीं, बल्कि मामले की सुनवाई के बाद बरी किया गया।

    अदालत ने कहा कि प्राथमिकी दर्ज होने के समय याचिकाकर्ता नाबालिग था। ऐसी स्थिति में इतनी कम उम्र में हुई गलती के कारण उसे रोजगार से वंचित करना उचित नहीं है, खासकर तब जब मामले में दोषसिद्धि हुई ही नहीं।

    हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि अभ्यर्थिता रद्द करने वाले आदेश में पीलीभीत के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक द्वारा किए गए सत्यापन का कोई उल्लेख नहीं था। आदेश में न तो अपराध की प्रकृति, न याचिकाकर्ता की उम्र और न ही मुकदमे के परिणाम पर विचार किया गया।

    अदालत ने कहा कि संबंधित अधिकारी बिना इन सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किए एक संक्षिप्त और कारणहीन आदेश के जरिए पहले से दर्ज संतुष्टि को पलट नहीं सकते।

    हाईकोर्ट ने अभ्यर्थिता रद्द करने के आदेश को मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन मानते हुए निरस्त कर दिया।

    अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को वैध रूप से चयनित मानते हुए उसे प्रशिक्षण में शामिल किया जाए या आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी किया जाए। साथ ही, लंबित मुकदमे की जानकारी छिपाने के मुद्दे पर दोबारा विचार करने से भी मना किया गया।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस फैसले को ऐसे मामलों में मिसाल नहीं माना जाएगा जहां अपराध गंभीर हो, उसमें नैतिक अधमता शामिल हो या अभ्यर्थी को अपराध में दोषी ठहराया गया हो।

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