हठधर्मिता' पर सख्त इलाहाबाद हाइकोर्ट, पेड़ों की भू-अंकन विफलता पर शीर्ष वन व उद्यान अधिकारियों को तलब 40 हजार रुपये का जुर्माना

Amir Ahmad

7 Jan 2026 3:01 PM IST

  • हठधर्मिता पर सख्त इलाहाबाद हाइकोर्ट, पेड़ों की भू-अंकन विफलता पर शीर्ष वन व उद्यान अधिकारियों को तलब 40 हजार रुपये का जुर्माना

    इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ पीठ ने वर्ष 2013 में दायर एक जनहित याचिका में राज्य अधिकारियों की उदासीनता और हठधर्मिता पर कड़ा रुख अपनाते हुए वन और उद्यान विभाग के शीर्ष अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया।

    न्यायालय ने पेड़ों के वैज्ञानिक भू-अंकन से संबंधित पूर्व आदेशों के पालन में विफल रहने पर कुल 40 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।

    जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी की पीठ ने वन विभाग के अपर मुख्य सचिव, उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के प्रमुख सचिव सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को 13 जनवरी 2026 को प्रातः 10 बजकर 15 मिनट पर न्यायालय में उपस्थित होने का आदेश दिया।

    न्यायालय ने चार पृष्ठों के आदेश में कहा कि 12 नवंबर 2025 को पारित कठोर आदेश के बावजूद राज्य की ओर से न तो यह बताया गया कि पहले लगाई गई लागत जमा की गई या नहीं और न ही इस संबंध में कोई शपथपत्र दाखिल किया गया।

    पीठ ने टिप्पणी की कि जनहित से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मामले में राज्य अधिकारियों का यह आचरण सहयोग की कमी और हठधर्मिता को दर्शाता है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

    यह जनहित याचिका जयंत सिंह तोमर द्वारा आम के क्षेत्र में स्थित पेड़ों के वैज्ञानिक भू-अंकन की प्रणाली अपनाने के संबंध में दायर की गई थी।

    इससे पूर्व न्यायालय ने राज्य सरकार से यह भी पूछा था कि क्या वह वर्ष 2013 में बंबई हाइकोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के समान कोई प्रणाली अपना सकती है। हालांकि, जनवरी, 2014 के आदेश के बाद दाखिल किसी भी शपथपत्र में इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं दिया गया।

    पीठ ने अब जिन अधिकारियों को तलब किया है, उनमें उत्तर प्रदेश सरकार के वन विभाग के अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव, प्रमुख मुख्य वन संरक्षक, उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के प्रमुख सचिव तथा लखनऊ के प्रभागीय वन अधिकारी शामिल हैं।

    न्यायालय ने 12 नवंबर, 2025 को लगाए गए 15 हजार रुपये के जुर्माने के अतिरिक्त अब 25 हजार रुपये की और लागत आरोपित की है।

    निर्देश दिया गया कि पूरी राशि अगली सुनवाई से पहले जमा की जाए। यह राशि न्यायालय के वरिष्ठ निबंधक द्वारा लखनऊ में बालक-बालिकाओं के लिए किशोर गृह संचालित करने वाली दृष्टि सामाजिक संस्थान को दी जाएगी।

    सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से बताया गया कि भू-अंकन का कार्य उद्यान विभाग के अंतर्गत आता है और यह प्रक्रिया वर्ष 2018 से चल रही है।

    हालांकि, न्यायालय इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ और प्रश्न किया कि यदि यह तथ्य सही था तो अब तक लिखित निर्देश या शपथपत्र क्यों प्रस्तुत नहीं किया गया।

    याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी रेखांकित किया कि वर्ष 2014 के आदेश में केवल भू-अंकन ही नहीं, बल्कि पेड़ों की कटाई का मुद्दा भी शामिल था, जो सीधे तौर पर वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है।

    मामले की अगली सुनवाई 13 जनवरी, 2026 को निर्धारित की गई है।

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