छोटी वाद अदालत में रेस जुडिकाटा की दलील पर शुरुआत में फैसला जरूरी नहीं, विवादित तथ्यों पर हो तो मुकदमे के साथ तय होगी: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
10 Aug 2026 4:26 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि छोटी वाद अदालत के समक्ष किसी मुकदमे में प्रतिवादी को केवल रेस जुडिकाटा की दलील उठाने के आधार पर यह अधिकार नहीं मिल जाता कि अदालत उस दलील पर मुकदमे की शुरुआत में ही फैसला करे। यदि इस दलील का फैसला विवादित तथ्यों की जांच पर निर्भर करता है तो उसे मुकदमे की अन्य विवादित बातों के साथ तय किया जा सकता है।
डॉ. जस्टिस योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने यह फैसला अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका पर सुनाया। याचिका में सहारनपुर की छोटी वाद अदालत द्वारा रेस जुडिकाटा की दलील को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय करने से इनकार करने के आदेश को चुनौती दी गई थी।
मामले में याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वे सहारनपुर के मोहल्ला कोठीवाला स्थित संपत्ति के मूल मालिक हैं। उनके अनुसार, उन्होंने वर्ष 2014 में प्रतिवादी के पति से 6 लाख रुपये उधार लिए थे और इस ऋण की सुरक्षा के लिए संपत्ति को गिरवी रखना चाहते थे। उनका आरोप था कि उनके अंगूठे के निशान लेकर 23 सितंबर 2014 को बिक्री विलेख तैयार कर दिया गया, जबकि उन्हें दस्तावेज की वास्तविक प्रकृति नहीं बताई गई।
याचिकाकर्ताओं ने इसके बाद वर्ष 2015 में सेल डीड को शून्य घोषित करने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया।
बाद में प्रतिवादी ने नोटिस के जरिए मकान मालिक और किरायेदार का संबंध होने का दावा किया और बेदखली के लिए छोटी वाद अदालत में मुकदमा दायर किया। इस मुकदमे की पैरवी उसके पति ने अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में की। वह मुकदमा खारिज हो गया।
इसके बाद प्रतिवादी ने 28 अगस्त 2023 को नया नोटिस जारी किया और फिर छोटी वाद वाद संख्या 3/2023 दाखिल कर बेदखली, किराए के बकाये और क्षतिपूर्ति की मांग की।
याचिकाकर्ताओं ने लिखित बयान में दलील दी कि नया मुकदमा सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 11 के तहत रेस जुडिकाटा से बाधित है, क्योंकि पहले के मुकदमे में संबंधित मुद्दों पर 19 अगस्त 2023 को फैसला हो चुका था।
उन्होंने आदेश 14 नियम 1 और धारा 151 के तहत आवेदन देकर मांग की कि रेस जुडिकाटा की दलील को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय किया जाए, क्योंकि यदि यह दलील स्वीकार की जाती है तो पूरा मुकदमा समाप्त हो जाएगा।
छोटी वाद अदालत ने आवेदन खारिज किया। अदालत ने माना कि छोटी वाद अदालतों की कार्यवाही में मुद्दों के औपचारिक निर्धारण और गठन से संबंधित प्रक्रिया लागू नहीं होती और रेस जुडिकाटा की दलील कानून तथा तथ्य का मिश्रित प्रश्न होने के कारण प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने इस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।
अदालत ने कहा कि प्रांतीय छोटी वाद अदालत अधिनियम, 1887 की धारा 17 के तहत सिविल प्रक्रिया संहिता छोटी वाद अदालतों पर लागू होती है, लेकिन संहिता में किए गए अपवादों के अधीन। आदेश 50 नियम 1 के तहत मुद्दों के निर्धारण और गठन की विस्तृत प्रक्रिया को छोटी वाद कार्यवाही से बाहर रखा गया, क्योंकि ऐसी प्रक्रिया इन मामलों की त्वरित और संक्षिप्त प्रकृति के अनुकूल नहीं होगी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि छोटी वाद अदालत किसी महत्वपूर्ण विवाद पर फैसला किए बिना मुकदमा निपटा सकती है।
अदालत ने कहा,
"मुद्दों के निर्धारण और गठन की प्रक्रिया को बाहर रखने का अर्थ यह नहीं है कि छोटी वाद अदालत पक्षकारों के बीच उठने वाले वास्तविक विवादों की पहचान और उनका फैसला करने की अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती है।"
अदालत ने बताया कि आदेश 20 नियम 4(1) के तहत छोटी वाद अदालत को मुकदमे में निर्धारण के लिए उठने वाले बिंदुओं को तय कर उन पर अपना निर्णय देना होता है। सुप्रीम कोर्ट के रमेश्वर दयाल बनाम बांदा मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे बिंदु मूल रूप से वही मुद्दे हैं, जो सामान्य दीवानी मुकदमे में आदेश 14 के तहत सामने आते।
हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत को सामान्य दीवानी मुकदमों की तरह औपचारिक रूप से मुद्दे तय करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उसे पक्षकारों के बीच मौजूद प्रत्येक महत्वपूर्ण विवाद की पहचान कर उस पर फैसला करना आवश्यक है।
रेस जुडिकाटा की दलील पर अदालत ने कहा कि केवल वही आपत्ति शुरुआत में तय की जा सकती है, जो स्वीकृत या निर्विवाद तथ्यों के आधार पर शुद्ध रूप से कानून का प्रश्न हो। यदि कानून का सवाल विवादित तथ्यों के निर्धारण पर निर्भर करता है, तो उसे प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय करना आवश्यक नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के नुस्ली नेविल वाडिया बनाम आइवरी प्रॉपर्टीज मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि विवादित तथ्यों के निर्धारण पर निर्भर कानून के प्रश्न को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि धारा 11 के तहत रेस जुडिकाटा की दलील भी सामान्यतः पहले मुकदमे के पक्षकारों, दावों, मुद्दों, निष्कर्षों और फैसले की जांच की मांग करती है। इसलिए हर मामले में इसे मुकदमे की शुरुआत में ही तय करना जरूरी नहीं है।
"हर रेस जुडिकाटा की दलील को मुकदमे के अन्य विवादों से पहले तय करने के लिए कोई कठोर नियम निर्धारित नहीं किया जा सकता।"
वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की दलील इस बात पर निर्भर करती है कि क्या दोनों पक्षों ने पहले और वर्तमान मुकदमे में एक ही हैसियत से मुकदमा लड़ा था और क्या दोनों मुकदमों में सीधे और मूल रूप से उठाए गए मुद्दे समान थे।
अदालत ने कहा कि इन सवालों का जवाब केवल लिखित दलीलों को देखकर या अमूर्त रूप से नहीं दिया जा सकता। इसलिए छोटी वाद अदालत ने रेस जुडिकाटा की दलील को शुरुआत में तय करने से इनकार कर कोई अधिकार क्षेत्र संबंधी गलती नहीं की।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि छोटी वाद अदालत के आदेश ने रेस जुडिकाटा की दलील खारिज नहीं की। याचिकाकर्ता मुकदमे के अंतिम निपटारे के समय इस दलील को पूरी तरह उठा सकते हैं।
अदालत ने कहा कि किसी आपत्ति को शुरुआत में तय करना है या मुकदमे के बाकी विवादों के साथ, यह ट्रायल कोर्ट के प्रक्रियात्मक विवेक का विषय है और अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट ऐसे विवेक में सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करेगा।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की। हालांकि, याचिकाकर्ताओं को रेस जुडिकाटा सहित अपनी सभी अन्य कानूनी दलीलें छोटी वाद अदालत के समक्ष उठाने की स्वतंत्रता दी गई और ट्रायल कोर्ट को मुकदमे का शीघ्र निपटारा करने का निर्देश दिया।


