एकतरफा भरण-पोषण आदेश को चुनौती में केवल नोटिस न मिलने का मुद्दा उठेगा, मेरिट पर बहस नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

1 April 2026 3:46 PM IST

  • एकतरफा भरण-पोषण आदेश को चुनौती में केवल नोटिस न मिलने का मुद्दा उठेगा, मेरिट पर बहस नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि भरण-पोषण मामले में पारित एकतरफा अंतरिम आदेश को चुनौती देते समय पक्षकार मामले के गुण-दोष (मेरिट) पर बहस नहीं कर सकता।

    कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी चुनौती का दायरा केवल यह साबित करने तक सीमित होता है कि उसे नोटिस नहीं मिला था या उसके अनुपस्थित रहने का पर्याप्त कारण था।

    यह टिप्पणी जस्टिस गरिमा प्रसाद की पीठ ने पति द्वारा दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए की।

    मामले में ट्रायल कोर्ट ने घरेलू हिंसा कानून के तहत पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण के रूप में प्रति माह 4000 रुपये देने का आदेश दिया था।

    यह आदेश एकतरफा पारित हुआ था जिसे वापस लेने की पति की मांग ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज की थी कि उसे विधिवत नोटिस दिया गया लेकिन वह अदालत में उपस्थित नहीं हुआ।

    बाद में सेशन कोर्ट ने भी उसकी अपील खारिज की, जिसके बाद उसने हाइकोर्ट का रुख किया।

    हाईकोर्ट में पति की ओर से दलील दी गई कि पत्नी बिना कारण घर छोड़कर चली गई थी और वह स्वयं बच्चों का खर्च उठा रहा है। साथ ही यह भी कहा गया कि पत्नी शिक्षित है और स्वयं अपना पालन-पोषण कर सकती है।

    वहीं, पत्नी ने आरोप लगाया कि पति और ससुर शराब के आदी हैं और उसे मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना दी जाती थी, जिसके चलते उसे बार-बार घर से निकाला गया।

    दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत दोनों ने स्पष्ट रूप से यह तथ्य दर्ज किया कि पति को नोटिस मिला था लेकिन वह पेश नहीं हुआ।

    अदालत ने कहा,

    “जब पुनर्विचारकर्ता को विधिवत नोटिस मिलने के बावजूद वह ट्रायल कोर्ट में उपस्थित नहीं हुआ तो अब उसे मामले के गुण-दोष पर दलील देने की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसी स्थिति में चुनौती का दायरा केवल नोटिस न मिलने या अनुपस्थित रहने के पर्याप्त कारण तक ही सीमित रहता है।”

    अदालत ने यह भी कहा कि वैवाहिक संबंध स्वीकार होने के बाद पति का यह कानूनी और नैतिक दायित्व है कि वह पत्नी का भरण-पोषण करे।

    आर्थिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने पाया कि पति हर महीने क्रेडिट कार्ड पर लगभग 9000 रुपये खर्च कर रहा है और बच्चों के खर्च भी वहन कर रहा है, जिससे उसकी आर्थिक क्षमता स्पष्ट होती है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि 4000 रुपये प्रति माह की राशि भोजन, कपड़े और मेडिकल जैसी जरूरतों के लिए उचित और सीमित है और इसे न तो अत्यधिक कहा जा सकता है और न ही मनमाना।

    अदालत ने यह भी पाया कि पत्नी के पास स्वतंत्र आय का कोई ठोस प्रमाण नहीं है।

    इन सभी तथ्यों के आधार पर हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि या कानूनी कमी न पाते हुए पति की याचिका खारिज की। हालांकि उसे मुख्य वाद में भाग लेने और मेरिट के आधार पर अपना पक्ष रखने की स्वतंत्रता दी गई।

    Next Story