93 वर्षीय महिला का DNA टेस्ट कराने का आदेश, संपत्ति विवाद में बेटी की मातृत्व जांच जरूरी: राजस्थान हाइकोर्ट
Amir Ahmad
12 Feb 2026 4:44 PM IST

राजस्थान हाइकोर्ट ने एक बेहद असाधारण और भावनात्मक मामले में 93 वर्षीय महिला का DNA टेस्ट कराने का आदेश दिया ताकि यह तय किया जा सके कि संपत्ति में हिस्सा मांगने वाली याचिकाकर्ता वास्तव में उसकी बेटी है या नहीं। कोर्ट ने साफ कहा कि कानून में पितृत्व को लेकर तो अनुमान की व्यवस्था है लेकिन मातृत्व को लेकर कोई वैधानिक अनुमान नहीं है।
जस्टिस बिपिन गुप्ता की पीठ ने इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर बताते हुए कहा कि यह शायद दुर्लभतम मामलों में से एक है, जहां कोई मां किसी बच्चे को अपना मानने से इनकार कर रही है।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा,
“आज के भौतिकवादी युग में किसी बच्चे के माता-पिता होने का दावा करना या उससे इनकार करना आसान हो गया, लेकिन किसी बच्चे के लिए यह साबित करना बेहद कठिन है कि अमुक व्यक्ति ही उसका माता या पिता है। जब कानून में महिला के संदर्भ में मातृत्व को लेकर कोई अनुमान नहीं है तो ऐसे में बच्चा कैसे साबित करे कि वही उसकी जन्मदात्री मां है?”
यह मामला एक संपत्ति विवाद से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वह अपने पिता की पैतृक कृषि भूमि में हिस्से की हकदार है। उसके पिता ने वर्ष 2014 में इस संपत्ति को लेकर एक वसीयत दर्ज कराई थी। याचिकाकर्ता का कहना है कि पैतृक संपत्ति में वसीयत वैध नहीं हो सकती, इसलिए उसे और उसकी मां को आधा-आधा हिस्सा मिलना चाहिए।
हालांकि, मां और दो अन्य पक्षकारों ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता उनकी बेटी ही नहीं है।
इस पर याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट में आवेदन देकर अपनी कथित मां का DNA टेस्ट कराने की मांग की थी ताकि उसका मातृत्व साबित किया जा सके। ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि जब संबंधित पक्ष डीएनए टेस्ट से इनकार कर रहे हैं तो ऐसा टेस्ट उनकी निजता का उल्लंघन होगा।
इस आदेश को याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाइकोर्ट में चुनौती दी।
हाइकोर्ट ने साफ किया कि यहां विवाद पितृत्व का नहीं बल्कि मातृत्व का है, क्योंकि महिला ने यह नहीं नकारा कि वह याचिकाकर्ता के पिता की पत्नी थी बल्कि सिर्फ यह कहा कि याचिकाकर्ता उसकी बेटी नहीं है।
जस्टिस बिपिन गुप्ता ने कहा,
“जब कोई महिला अपने विवाह से इनकार नहीं कर रही लेकिन किसी बच्चे को अपना मानने से इनकार कर रही है तो यह पितृत्व जांच का नहीं बल्कि मातृत्व निर्धारण का मामला है। समाज में आमतौर पर पुरुष पितृत्व से इनकार करता है लेकिन मां का बच्चे से इनकार करना अत्यंत दुर्लभ स्थिति है।”
कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम और नए भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA), 2023 का हवाला देते हुए कहा कि इनमें बच्चे के पितृत्व को लेकर तो अनुमान की व्यवस्था है लेकिन मातृत्व को लेकर कानून पूरी तरह मौन है। ऐसे में विज्ञान की मदद लेना ही एकमात्र रास्ता बचता है।
निजता के तर्क पर कोर्ट ने कहा कि किसी को जबरन DNA टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता लेकिन यदि कोई व्यक्ति टेस्ट कराने से इनकार करता है तो अदालत भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 और BSA की धारा 119 के तहत प्रतिकूल अनुमान लगा सकती है।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए राजस्थान हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि कथित मां का DNA टेस्ट कराया जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि महिला DNA टेस्ट कराने से इनकार करती है तो इसका लाभ याचिकाकर्ता को दिया जाएगा।

