BNSS की धारा 180 के तहत गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार करे UP Police: हाईकोर्ट
Amir Ahmad
17 Sept 2026 2:00 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी को निर्देश दिया कि BNSS की धारा 180 के तहत दर्ज किए जाने वाले सभी गवाहों के बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार किया जाए। कोर्ट ने कहा कि इससे आपराधिक जांच अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने में मदद मिलेगी और जमानत सहित अन्य न्यायिक कार्यवाही में भी अदालत के लिए यह रिकॉर्ड उपयोगी होगा।
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने दहेज से जुड़े मामले में आरोपी महिला की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष मौजूद विवेचक ने स्वीकार किया कि उसने प्रथम सूचनाकर्ता का BNSS की धारा 180 के तहत बयान दर्ज करते समय उसकी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की थी।
कोर्ट द्वारा 21 जुलाई 2025 और 4 अगस्त 2026 को डीजीपी की ओर से जारी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग संबंधी परिपत्रों का हवाला दिए जाने पर विवेचक ने बिना शर्त माफी मांगी। हाईकोर्ट ने कहा कि उसके सामने ऐसे कई मामले आए हैं, जिनमें DGP के परिपत्रों में उपलब्ध विकल्प के बावजूद विवेचकों ने बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की।
कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में विवेचक इस डर से रिकॉर्डिंग नहीं करते कि उन पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि उन्होंने BNSS की धारा 180 के तहत गवाहों के बयान खुद लिखे हैं और FIR की सामग्री को ही बयान के रूप में दर्ज किया। हाईकोर्ट ने कहा कि इस विकल्प का कई विवेचकों ने व्यापक रूप से दुरुपयोग किया।
कोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 180(3) और BNSS नियमावली, 2024 के नियम 20(1) के तहत विवेचक को ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से गवाह का बयान दर्ज करने की अनुमति है। डीजीपी के परिपत्र संख्या 24/2025 में दुष्कर्म पीड़िता के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य की गई, जबकि BNSS की धारा 180 के तहत अन्य बयानों की रिकॉर्डिंग को वैकल्पिक रखा गया।
इसी पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट ने DGP को निर्देश दिया कि BNSS की धारा 180 के तहत दर्ज होने वाले सभी बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार किया जाए। कोर्ट ने कहा कि इससे जांच अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष होगी तथा जमानत और अन्य न्यायिक कार्यवाही में अदालत को भी मदद मिलेगी।
हाईकोर्ट ने DGP को यह भी निर्देश दिया कि सभी विवेचकों को संबंधित दिशानिर्देशों की जानकारी दी जाए ताकि वास्तविक दोषी को न्याय के कटघरे तक पहुंचाया जा सके और गलत या त्रुटिपूर्ण जांच के कारण निर्दोष व्यक्ति को उत्पीड़न का सामना न करना पड़े।
अदालत ने आपराधिक जांच के उद्देश्य पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। BNSS और उत्तर प्रदेश पुलिस विनियमों के तहत विवेचक के कर्तव्यों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि विवेचक केवल लिपिक की भूमिका निभाने वाला अधिकारी नहीं है। उसे तथ्यों का निरीक्षण और उनसे निष्कर्ष निकालना होता है तथा उसका दायित्व सत्य का पता लगाना है न कि केवल किसी आरोपी के खिलाफ दोषसिद्धि सुनिश्चित करना।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राज्य उत्तर प्रदेश बनाम भगवंत किशोर जोशी और विनय त्यागी बनाम इरशाद अली मामलों में दिए गए फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जांच में साक्ष्य एकत्र करना और उसके आधार पर राय बनाना शामिल है। निष्पक्ष और उचित जांच पक्षपात से मुक्त, ईमानदार, न्यायसंगत और कानून के अनुरूप होनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि जांच का उद्देश्य संबंधित अपराध के बारे में सामग्री एकत्र करना है उसे गढ़ना नहीं। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कई मामलों में विवेचक स्वयं प्रथम सूचनाकर्ताओं या गवाहों को आरोपी के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री बताते या सुझाते पाए गए हैं। कोर्ट ने इस तरह की प्रक्रिया को पहले भी अनुचित ठहराया है।
जस्टिस देशवाल ने अपने पूर्व के आदेश आतिश उर्फ कृष्णकांत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का उल्लेख किया। इस आदेश के बाद DGP ने एक परिपत्र जारी कर पुलिसकर्मियों को गवाहों को आरोपी के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री सुझाने से रोकने और केवल स्पष्टीकरण से जुड़े सवाल पूछने का निर्देश दिया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच का उद्देश्य सच्चाई सामने लाना है न कि आरोपी के खिलाफ पूर्वाग्रह के साथ साक्ष्य जुटाना। यदि कोई आरोपी अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए विवेचक के सामने कोई साक्ष्य पेश करता है तो विवेचक को उसका भी सावधानीपूर्वक परीक्षण करना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि दहेज मांग, दहेज मृत्यु, POCSO Act और SC/ST Act जैसे कुछ मामलों में ऐसे उदाहरण सामने आएं, जहां ऐसे लोगों को भी आरोपी बना दिया जाता है, जिनकी घटना में कोई भूमिका नहीं होती। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवेचक का दायित्व निष्पक्ष तरीके से साक्ष्य जुटाकर वास्तविक दोषी को सक्षम अदालत के समक्ष लाना है और आपराधिक कार्यवाही का इस्तेमाल निर्दोष व्यक्तियों को परेशान करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने जांच की प्रक्रिया को लेकर कई अन्य निर्देश भी दिए। इनमें घटना स्थल पर जल्द पहुंचना, सूचनाकर्ता और गवाहों के बयान शीघ्र दर्ज करना, जहां संभव हो वहां ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए ई-साक्ष्य ऐप का इस्तेमाल करना और ऐसी रिकॉर्डिंग अदालत के समक्ष उपलब्ध कराना शामिल है। कोर्ट ने स्वतंत्र गवाहों के बयान दर्ज करने और दुष्कर्म व यौन अपराधों से जुड़े मामलों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने को भी कहा।
इसके अलावा विवेचकों को अश्लील वीडियो से जुड़े मामलों में मोबाइल और फोरेंसिक साक्ष्य जुटाने, जरूरत के अनुसार कॉल डिटेल रिकॉर्ड प्राप्त करने, आवश्यक मामलों में पहचान परेड कराने और कानून के अनुसार संपत्ति की पहचान करने के निर्देश दिए गए।
यह मामला मृतका की सास चंद्रकांता की जमानत याचिका से संबंधित था। उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 85, 80(2), 352, 115(2) और 351(3) तथा दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत मामला दर्ज किया गया।
कोर्ट ने FIR और BNSS की धारा 180 के तहत दर्ज बयान के बीच अंतर पाया। अदालत ने यह भी कहा कि आवेदिका के खिलाफ आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे तथा मृतका की मौत से पहले उसके साथ दहेज उत्पीड़न किए जाने का पर्याप्त प्रथमदृष्टया सामग्री उपलब्ध नहीं थी। आवेदिका का कोई आपराधिक इतिहास भी नहीं था और वह 18 मई 2026 से जेल में थी।
मामले की परिस्थितियों, आरोपों की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य, आरोपी की भूमिका, महिला होने की स्थिति और अन्य तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने चंद्रकांता को जमानत दी। कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति अनुपालन के लिए उत्तर प्रदेश के DGP को भेजने का भी निर्देश दिया।


