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आपत्ति या क्रॉस अपील के अभाव में हाईकोर्ट निचली अदालत के फ़ैसले के दायरे के बाहर जाकर अपील पर आदेश नहीं दे सकता : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
18 Dec 2018 6:03 AM GMT
आपत्ति या क्रॉस अपील के अभाव में हाईकोर्ट निचली अदालत के फ़ैसले के दायरे के बाहर जाकर अपील पर आदेश नहीं दे सकता : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी प्रतिवादी ने अगर कोई अपील दाख़िल की है और अगर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की गई है या कोई क्रॉस अपील नहीं है तो हाईकोर्ट इस अपील को ख़ारिज करते हुए निचली अदालत के फ़ैसले के दायरे के आगे नहीं जा सकता।

मूल प्रतिवादी की अपील में ज़्यादा से ज़्यादा हाईकोर्ट इस अपील को ख़ारिज कर सकता है और फ़ैसले को सही ठहरा सकता है। यह बात न्यायमूर्ति एके सीकरी, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एमआर शाह की पीठ ने अखिल भारतवर्षीय मरवारी अग्रवाल जातीय कोष बनाम बृजलाल टिबरेवाल मामले में कही।

निचली अदालत ने वादी द्वारा दायर मामले में प्रतिवादी को सिर्फ़ यह निर्देश दिया था कि वह इस मामले में विवादित भवन और उसकी ज़मीन जो कि 1009.70 वर्ग फुट थी, उसे एक दस्तावेज़ के माध्यम से उस सोसाइटी के नाम पर कर दे। पर इसे फ़ैसले को ख़ारिज करते हुए हाईकोर्ट ने प्रतिवादी को कहा था कि वह 2700 वर्ग फुट ज़मीन के स्वामित्व का क़ानूनी हस्तांतरण के लिए Deed of Conveyance तैयार करे।

पीठ ने कहा, “प्रतिवादी को लेकर जो फ़ैसला निचली अदालत ने सुनाया है, प्रथम अपीली अदालत उसे इससे बुरी हालत में नहीं डाल सकता विशेषकर उस स्थिति में जबकि मूल वादी ने कोई क्रॉस अपील या आपत्ति नहीं की है…इस तरह हाईकोर्ट ने जो यह आदेश दिया है वह निचली अदालत के बाहर जा रहा है और अदालत में यह टिक नहीं सकता…एक बार जब हाईकोर्ट ने मूल प्रतिवादी की अपील ख़ारिज कर दी है तो उस स्थिति में मूल प्रतिवादी की अपील पर हाईकोर्ट ऐसा आदेश जारी नहीं कर सकता जो निचली अदालत के फ़ैसले की सीमा के बाहर जाता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह आदेश देकर हाईकोर्ट ने अपील की सीमा के बाहर जाकर आदेश दिया है और ऐसा करके उसने अपने न्यायिक अधिकारक्षेत्र का अतिक्रम किया है।”

इस मामले में एक अन्य मामला यह था कि क्या हाईकोर्ट को ऐसा आदेश देना चाहिए था। पीठ ने कहा कि  “Note for speaking to the Minutes” को पुनर्विचार याचिका के बराबर नहीं माना जा सकता।


 
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