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राफेल डील की स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कीं [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
14 Dec 2018 4:13 PM GMT
राफेल डील की स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कीं [निर्णय पढ़ें]
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 2015 की राफेल डील की स्वतंत्र जांच की मांग करने वाली याचिकाओं को ये कहते हुए खारिज कर दिया कि मूल्य निर्धारण, खरीद प्रक्रिया और भारतीय ऑफसेट पार्टनर के चयन में कोई अनियमितता नहीं मिली है।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एस के कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत धारणा अदालत को हस्तक्षेप में प्रभावित नहीं कर सकती। पीठ ने स्पष्ट किया कि रक्षा खरीद के संबंध में न्यायिक समीक्षा की सीमा व्यक्तिगत तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के लिए निर्धारित की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रक्रिया को लेकर कोर्ट संतुष्ट हैं और संदेह की कोई वजह नहीं है। कोर्ट के लिए यह सही नहीं है कि वह एक अपीलीय प्राधिकारी बने और सभी पहलुओं की जांच करे। कोर्ट ने साफ कहा कि कुछ भी ऐसा नहीं मिला जिससे लगे कि कोई व्यावसायिक पक्षपात हुआ हो। पीठ ने कहा कि ऑफसेट पार्टनर के विकल्प में दखल देने की भी कोई वजह नहीं है।

पीठ ने कहा कि लड़ाकू विमानों की जरूरत है और देश लड़ाकू विमानों के बगैर नहीं रह सकता है। चीफ जस्टिस ने फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकार को 126 विमानों की खरीद के लिए मजबूर नहीं कर सकते और कोर्ट के लिए यह उचित नहीं होगा कि वह केस के हर पहलू की जांच करे। उन्होंने कहा कि कीमतों की तुलना करना कोर्ट का काम नहीं है। खरीद की प्रक्रिया से संतुष्टि व्यक्त करते हुए पीठ ने कहा कि 126 जेट के संबंध में पहले का सौदा नहीं हो रहा था। पीठ ने यह भी कहा कि भारतीय ऑफसेट पार्टनर की पसंद भी विक्रेता की है जिसमें भारत संघ के पास कोई भूमिका नहीं है और वहां ऐसा लगता है कि आईओपी के चयन में कोई वाणिज्यिक पूर्वाग्रह नहीं हुआ है।

14 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने फ्रांस से 36 राफेल विमान खरीद की अदालत की निगरानी में जांच की मांग वाली याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था।

इस दौरान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस के एम जोसेफ ने केंद्र सरकार पर सौदे और ऑफसेट पार्टनर के चुने जाने पर कई बड़े सवाल उठाए।  सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि वायु सेना को कौन से लड़ाकू विमान मिलें और उनमें कौन से हथियार लगें ये विशेषज्ञों का काम है। कोर्ट राफेल सौदे का न्यायिक परीक्षण नहीं कर सकता। हालांकि उन्होंने माना कि इसके लिए फ्रांस सरकार ने कोई संप्रभु गारंटी नहीं दी है लेकिन सरकार को लैटर ऑफ कंफर्ट दिया गया है। AG ने ये भी कहा कि राफेल की कीमत व विशेषताओं पर सार्वजनिक चर्चा नहीं हो सकती क्योंकि ये राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ- साथ फ्रांस सरकार से करार का भी उल्लंघन है। इससे दुश्मन देशों को फायदा पहुंचेगा। उन्होंने कहा कि करगिल के वक्त अगर राफेल होता तो देश को कम नुकसान होता।

इससे पहले वकील प्रशांत भूषण, जो अपनी और भाजपा के दो नेताओं पूर्व मंत्री यशवंत सिन्हा और अरूण शौरी की ओर से पेश हुए,  ने आरोप लगाया कि सरकार गोपनीयता के प्रावधान की आड़ लेकर राफेल विमानों की कीमतों का खुलासा नहीं कर रही है। प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार ने ऑफसेट प्रावधान को 5 अगस्त 2015 को बदल दिया और डसॉल्ट को अफसेट पार्टनर चुनने का अधिकार दे दिया और बाद में यह कहने लगी कि हमें नहीं पता कि ऑफसेट पार्टनर कैसे चयनित हुआ, पुराने प्रावधान में यह पार्टनर सरकार की मर्जी से चुना जाता था।

प्रशांत भूषण ने कहा, कानून मंत्रालय ने सप्लाई की गारंटी न होने पर आपत्ति की थी। सरकार ने टेंडर निकालने के बजाय अंतर सरकार अग्रीमेंट (IGA) क्यों किया।याचिकाकर्ता आप नेता संजय सिंह के वकील ने कहा, सरकार ने पुरानी डील रद्द क्यों की।

वहीं अरूण शौरी ने कहा कि उस वक्त के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को भी 2015 की डील का पता नहीं था।

चौथे याचिकाकर्ता वकील एम एल शर्मा ने कहा कि ये सौदा एक गंभीर फ्रॉड है और इसकी जांच होनी चाहिए।

वहीं सुप्रीम कोर्ट ने वायु सेना के अफसरों को भी तलब किया और उनसे लड़ाकू विमानों की विशेषताओं पर जानकारी हासिल की।

अफसरों ने बताया कि 1985 से लेकर 2018 तक वायु सेना के बेड़े में कोई चौथी या पांचवी पीढ़ी का लड़ाकू विमान शामिल नहीं हुआ है। केंद्र सरकार ने  राफेल विमान की खरीद प्रक्रिया में उठाए गए कदमों के विवरण संबंधी दस्तावेज याचिकाकर्ताओं को सौंपे थे। सरकार ने विमान की कीमतों का ब्योरा सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंपा था।


 
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