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यहां तक कि मृत रेप पीड़ित की भी पहचान छिपाई जाए, सुप्रीम कोर्ट ने रेप व यौन हमले के पीड़ितों की पहचान उजागर करने पर प्रतिबंध लगाया [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
12 Dec 2018 9:50 AM GMT
यहां तक कि मृत रेप पीड़ित की भी पहचान छिपाई जाए, सुप्रीम कोर्ट ने रेप व यौन हमले के पीड़ितों की पहचान उजागर करने पर प्रतिबंध लगाया [निर्णय पढ़ें]
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रेप व यौन हमले के पीड़ितों  की पहचान सार्वजनिक करने और उनके साथ होने वाले सामाजिक भेदभाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए गाइडलाइन जारी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी पीड़ित की मौत भी हो चुकी है तो भी उसकी गरिमा बनी रहती है और उसकी पहचान उजागर नहीं की जा सकती।

जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने मंगलवार को ये फैसला सुनाया। जस्टिस गुप्ता ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि पीडितों की पहचान किसी कीमत पर उजागर ना हो। मीडिया ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग कर सकता है।ये उसका अधिकार और दायित्व है। लेकिन इसकी रिपोर्टिंग सनसनीखेज बनाने के लिए नहीं की जा सकती क्योंकि इससे मीडिया की विश्वसनीयता में बढ़ावा नहीं होता। इसके जरिए मीडिया में टीआरपी बढाने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। ऐसे मामलों में किसी भी तरीके से पीडित या उसके परिवार की पहचान नहीं कर सकते। मीडिया पीडितों का इंटरव्यू नहीं कर सकता लेकिन पीडिता चाहे तो वो इंटरव्यू दे सकती है। सोशल मीडिया या किसी भी प्लेटफार्म पर पहचान नहीं दिखा सकते।यौन मामलों व POCSO मामलों की FIR सार्वजनिक नहीं होगी और अपलोड नहीं होगी। सारे दस्तावेज कोर्ट में सीलकवर में होंगे और इनमें नाम- पता नहीं होगा। मृतक और मानसिक रूप से कमजोर पीड़ितों के मामले में भी कोर्ट की अनुमति के बिना पहचान उजागर नहीं कर सकते    अगर कोर्ट को लगे कि पहचान जरूरी है तो वो पहचान उजागर कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेप पीड़िताओं को सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, यह बहुत दुखद है।सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र-राज्य सरकारों और संघ शासित प्रदेशों को रेप पीड़िताओं के कल्याण और पुनर्वास के लिए  निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक जिले में रेप पीड़िताओं के लिए एक वन स्टॉप सेंटर बनना चाहिए। यहां रेप से संबंधित मुद्दों का समाधान होना चाहिए और पीड़िताओं के पुनर्वास के लिए व्यवस्था होनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा, 'यह बहुत दुखद है कि समाज में रेप पीड़िताओं के साथ आरोपी की तरह व्यवहार किया जाता है। उन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। इस मानसिकता में बदलाव होना ही चाहिए।'


 
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