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CPIL ने भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के संशोधनों को दी चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांगा [याचिका पढ़े]

LiveLaw News Network
26 Nov 2018 12:30 PM GMT
CPIL ने भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के संशोधनों को दी चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांगा [याचिका पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने सेंटर फॉर पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन ( CPIL)  द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी किया है जिसमें भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में दो संशोधनों को चुनौती दी गई है।

याचिका में कहा गया है कि केंद्र ने ये संशोधन कर कानून को हल्का किया है।

सोमवार को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई वाली पीठ ने छह हफ्ते में केंद्र सरकार को जवाब देने को कहा है। संगठन का प्रतिनिधित्व वकील प्रशांत भूषण ने किया।

याचिका  में अधिनियम की धारा 17 ए (1) को चुनौती दी गई है जिसमें भ्रष्टाचार के अपराधों की जांच के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता बताई गई है।

याचिका में दावा किया गया है कि यह संशोधन केंद्र द्वारा तीसरा प्रयास है जबकि इस तरह के नियम को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दो बार असंवैधानिक करार दिया जा चुका है।

याचिका में कहा गया है कि इसी तरह के सरकारी आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1998) मामले में रद्द कर दिया गया था। इस फैसले को बाईपास करने के लिए, दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम (DPSE  अधिनियम) की धारा 6 ए के रूप में केन्द्रीय सतर्कता अधिनियम में वैधानिक संशोधन के माध्यम से इसी सरंक्षण को फिर से लाया गया। हालांकि संविधान पीठ ने अपने फैसले में इसे भी संविधान के विपरीत घोषित किया।

याचिका में कहा गया कि DPSE अधिनियम की धारा 6 ए में संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के स्तर के केंद्र सरकार के सरकारी कर्मचारियों की PoC  अधिनियम से संबंधित अपराधों की जांच / छानबीन करने के लिए केंद्र सरकार से पूर्व मंजूरी का प्रावधान किया गया। बाद में संशोधन कर इसमें सेवारत या सेवानिवृत्त,  सभी स्तरों पर सार्वजनिक कर्मचारियों को सरंक्षण प्रदान किया गया। ऐसा इसलिए किया गया कि कनिष्ठ अधिकारियों और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच वर्गीकरण को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया था।

याचिका में भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा धारा 13 (1) (डी) (ii) (आपराधिक दुर्व्यवहार) को हटाने को भी चुनौती दी गई है। इसके तहत पहले किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा स्थिति के दुरुपयोग के परिणामस्वरूप किसी भी व्यक्ति (स्वयं सहित) के लिए मूल्यवान या आर्थिक लाभ प्राप्त करना  आपराधिक दुर्व्यवहार के अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त था। रिश्वत या जांच साबित करने की कोई जरूरत नहीं थी।


 
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