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न तो माँ-बाप और न ही कोई अन्य किसी बालिग़ लड़का और लड़की के साथ रहने में कोई हस्तक्षेप कर सकता है : इलाहाबाद हाईकोर्ट [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
21 Nov 2018 6:58 AM GMT
न तो माँ-बाप और न ही कोई अन्य किसी बालिग़ लड़का और लड़की के साथ रहने में कोई हस्तक्षेप कर सकता है : इलाहाबाद हाईकोर्ट [आर्डर पढ़े]
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि अगर लड़का और लड़की बालिग़ हैं और वे अपनी इच्छा से साथ रह रहे हैं तो उनके माँ-बाप सहित किसी को भी उनके साथ रहने में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है।

न्यायमूर्ति कौशल जयेन्द्र ठाकेर एक जोड़े की याचिका पर ग़ौर करते हुए यह बात कही। इन जोड़ों ने कोर्ट में एक याचिका दायर कर उनके माँ-बाप और अन्य लोगों को उनके वैवाहिक जीवन में दख़ल नहीं देने के बारे में निर्देश देने के लिए कोर्ट से अपील की थी। साथ ही इन लोगों ने अपनी सुरक्षा और स्वतंत्रता की गुहार लगाई थी।

इन लोगों ने कोर्ट से कहा कि वे दोनों बालिग़ हैं वे उन्होंने अपनी मर्ज़ी से शादी की है और अब वे एक पति-पत्नी की तरह रह रहे हैं। इन लोगों ने कहा कि उन्हें इस बात की आशंका है कि उनके सगे संबंधी उनपर हमले कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर के कई सारे फ़ैसलों का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने एक से अधिक इस तरह के मामलों में अपने फ़ैसले में इस बात को स्थापित कर चुका है कि अगर कोई युवक युवती बालिग़ हैं और वे अपनी मर्ज़ी से साथ रह रहे हैं तो उनके माँ-बाप सहित कोई भी उनकी ज़िंदगी में दख़ल नहीं दे सकता।”

पीठ ने कहा कि ये युवक-युवती अपनी मर्ज़ी से साथ रहने के लिए स्वतंत्र हैं और किसी को भी इनके शांतिपूर्ण जीवन में दख़ल देने की इजाज़त नहीं दी जाएगी। कोर्ट ने पुलिस को हिदायत दी कि ये जोड़े सुरक्षा की माँग करते हैं तो वह इन लोगों को सुरक्षा प्रदान करे।

कोर्ट ने हालाँकि, स्पष्ट किया कि उसने इन दोनों की कथित शादी पर कोई टिप्पणी नहीं की है और यह आदेश उनकी शादी की वैधता पर कोई फ़ैसला नहीं है और न ही उनकी शादी की वैधता के बारे में वह कोई प्रमाणपत्र जारी नहीं कर रहा है।

इस वर्ष के शुरू में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में कहा था कि जीवन साथी चुनने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और किसी बालिग़ को शादी करने के लिए परिवार, समुदाय, या कुनबे से इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं है।


 
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