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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बलात्कार के आरोपी ‘बाबा’ को जमानत देने से इनकार किया; कहा, समाज किसी व्यक्ति में जितना ज्यादा विश्वास जताता है उसकी ज़िम्मेदारी उतनी ही बड़ी होती है [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
9 Nov 2018 3:24 PM GMT
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बलात्कार के आरोपी ‘बाबा’ को जमानत देने से इनकार किया; कहा, समाज किसी व्यक्ति में जितना ज्यादा विश्वास जताता है उसकी ज़िम्मेदारी उतनी ही बड़ी होती है [आर्डर पढ़े]
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 “हमारे समाज ने गुरुओं में काफी विश्वास जताया है और लोग उन पर भगवान की तरह ही विश्वास करते हैं और आम तौर पर भक्त इन गुरुओं के प्रति खुद को बिना किसी शर्त के समर्पित कर देते हैं और उनके आदेशों को एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह मानते हैं”

बलात्कार के मामले में आरोपी एक बाबा  की जमानत याचिका खारिज करते हुए हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा कि अपने को पवित्र और आध्यात्मिक व्यक्ति बताते हुए अगर कोई व्यक्ति अपराध करता है तो वह अपराध ज्यादा गंभीर होता है क्योंकि इस तरह का कृत्य समाज के विश्वास को हिला देता है।

न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर ने आनंद गोपाल की जमानत याचिका खारिज करते हुए यह बात कही। गोपाल पर उस महिला से बलात्कार करने का आरोप है जो उस बाबा के आश्रम में सत्संग के लिए आई थी।

अपने आदेश मेंन्यायाधीश ने कहा : “हमारे समाज का धार्मिक गुरुओं में जबरदस्त विश्वास है और लोग उनको ईश्वर के बराबर मानते हैं और उनके आदेशों को एक बच्चे की तरह पालन करते हैं। खुद को पवित्र और आध्यात्मिक व्यक्ति मानने का नाटक करने वाले व्यक्ति का अपराध गैर-धार्मिक व्यक्ति के अपराध से  ज्यादा गंभीर होता है विशेषकर तब अगर उसका कोई कृत्य समाज के विश्वास को हिला देता है। समाज में उच्चस्थ कोई व्यक्ति जब विश्वास को तोड़ता है तो समाज पर इसका ज्यादा असर पड़ता है। किसी व्यक्ति में समाज जितना विश्वास व्यक्त करता है उसकी ज़िम्मेदारी भी उतनी ही अधिक होती है”।

अदालत ने सत्र अदालत के उस आदेश को कायम रखा जिसमें इस बाबा को जमानत देने से इंकार कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि अदालत को समाज की जायज भावनाओं का खयाल रखना होता है और उसको समाज के हित की रक्षा के प्रति सचेत होना चाहिए। अदालत ने कहा कि इसमें एक महिला के साथ जो हुआ है उससे पूरे समाज के विश्वास को तोड़ा गया है। अगर इस व्यक्ति को अभी जमानत दे दी गई तो इसका भी समाज पर बुरा असर पड़ेगा।

पीठ ने कहा, “याचिकाकर्ता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता का अधिकार हैलेकिन व्यक्तिगत और सामाजिक हित के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है”।


 
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