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अगर सबूत है तो बलात्कार के आरोपी को सिर्फ इसलिए बरी नहीं किया जा सकता क्योंकि गवाह मुकर गया और कठघड़े में पीड़िता ने उसकी पहचान नहीं की : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
1 Oct 2018 2:53 PM GMT
अगर सबूत है तो बलात्कार के आरोपी को सिर्फ इसलिए बरी नहीं किया जा सकता क्योंकि गवाह मुकर गया और कठघड़े में पीड़िता ने उसकी पहचान नहीं की : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में बलात्कार के एक आरोपी को सुनाई गई सजा को सही बताया जबकि बलात्कार पीड़िता आरोपी की अदालत में पहचान करने में विफल रही थी. न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, नवीन सिन्हा और केएम जोसफ की पीठ ने अपराध होने के समय पीड़िता की उम्र और घटना के समय तथा अन्य तथ्यों के बारे में गलत जानकारी देने के के लिए हालांकि पीड़िता को सजा नहीं सुनाई.

पृष्ठभूमि

हेमुदन ननभा गढ़वी को 9 की एक का यौन उत्पीडन किया. इस लडकी ने पहचान परेड में आरोपी की पहचान की पर सुनवाई के दौरान इस बात से इनकार किया की उसका यौन उत्पीड़न हुआ था. उसने आरोपी की पहचान भी नहीं की. हाईकोर्ट ने आरोपी को यह कहते हुए सजा सुनाई कि उसने पीड़िता को अपने पक्ष में कर लिया है. पर उसके खिलाफ काफी सबूत पाए गए हैं.

सुप्रीम कोर्ट में अपील पर हुई सुनवाई में पीठ ने कहा :”...अमूमन कटघड़े में होने वाली पहचान परेड को तरजीह दिया जाता है क्योंकि यह पहले दिए गए बयान की पुष्टि करने वाला होता है. पर इसे आम नियम नहीं कहा जा सकता. अगर अन्य साक्ष्य अपराध की पुष्टि करते हैं और ये उपलब्ध हैं, तो उस स्थिति में पहचान परेड महत्त्वपूर्ण हो जाता है और इस पर सम्मिलित रूप से विचार किया जा सकता है.”

पीड़ित और आरोपी दोनों में से किसी को भी आपराधिक सुनवाई को बाधित करने की अनुमति नहीं

पीठ ने कहा कि जो सबूत उपलब्ध हैं वह आरोपी द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप को साबित करते हैं. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर सिर्फ इस आधार पर आरोपी को छोड़ दिया जाए कि पीड़िता अपने बयान से मुकर गई है, तो यह न्याय के साथ खिलवाड़ होगा. कोर्ट ने कहा, “आपराधिक सुनवाई सत्य की खोज होती है...न तो आरोपी और न ही पीड़िता को ही झूठ बोलकर आपराधिक सुनवाई को विकृत करने की इजाजत दी जा सकती है और उन्हें अदालत को  एक ऐसे मंच में तब्दील करने की अनुमति नहीं हो सकती जहां अनर्गल बातें कही जा सकती हैं. आपराधिक मामलों में न्याय दिलाना एक गंभीर बात है और अभियोजन पक्ष के प्रधान गवाह को मुकरने की इजाजत देकर इसे हास्यास्पद नहीं बनने दिया जा सकता है.”

कोर्ट ने अंत में कहा, “यह मामला अभियोजन को दण्डित करने का सटीक मामला है...पर इस बात पर गौर करते हुए की पीड़िता की उम्र घटना के समय सिर्फ 9 साल थी और यह घटना 14 साल पहले हुई, उसकी अब शादी हो गई होगी और अपनी नई जिंदगी में वह रच-बस गई होगी, और अगर उसे अब सजा दी जाती है, जो की हम वैसे देना चाहते थे, तो उसके जीवन में सब कुछ उलट-पुलट जाएगा.”


 
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