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महिला ने कहा, वैवाहिक अधिकारों की बहाली संबंधी आदेश को मानने के लिए वह बाध्य नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने अकेले छोड़ दिये जाने की उसकी याचिका खारिज की [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
28 Sep 2018 5:11 AM GMT
महिला ने कहा, वैवाहिक अधिकारों की बहाली संबंधी आदेश को मानने के लिए वह बाध्य नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने अकेले छोड़ दिये जाने की उसकी याचिका खारिज की [आर्डर पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने एक पत्नी की याचिका को खारिज कर दिया जिसने निजता पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के एक फैसले पर भरोसा करते हुए कहा था कि उसे पूरा हक है कि उसे अकेले छोड़ दिया जाए और उस पर वैवाहिक अधिकारों की बहाली से संबन्धित आदेश को पूरा करने के लिए दवाब नहीं डाला जा सकता।

वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफाडे ने केएस पुत्तुस्वामी एवं अन्य बनाम भारत संघ मामले में न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ के फैसले को उद्धृत किया।

दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश XXI, नियम 32 और 33 के प्रावधानों के संदर्भ में विवाद का मुद्दा यह था कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली के परिणामस्वरूप सम्पत्तियों को कुर्क किया जा सकता है या नहीं।

महिला की याचिका को “अपरिपक्व” बताते हुए न्यायमूर्ति यूयू ललित और मोहन एम शांतनागौदर की पीठ ने इसे खारिज कर दिया और कहा, “हमने इस याचिका को पढ़ा है। ...याचिकाकर्ता के पति ने वैवाहिक अधिकारों को बहाल किए जाने के लिए आवेदन दिया है। हमारी राय में, यह मामला इस समय असामयिक है। इसलिए हम इस याचिका पर गौर नहीं करेंगे”।

निजता के बारे में आए कोर्ट के फैसले को इस बारे में उद्धृत किया गया। वकील ने कहा, “किसी व्यक्ति की निजता उसकी गरिमा का आवश्यक हिस्सा है...एक अंतर्निहित वैल्यू के रूप में मानवीय गरिमा एक हकदारी है या संविधान के द्वारा अपने आप में संरक्षित हित है...स्वतन्त्रता का अर्थ व्यापक है और निजता इसका एक हिस्सा है... हर स्वतन्त्रता का निजी रूप से उपभोग नहीं किया जा सकता... लेकिन अन्य स्वतन्त्रता को निजी दायरे में हासिल किया जा सकता है...”।


 
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