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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अगर मजिस्ट्रेट के आदेश पर पुलिस हिरासत दी गई है तो बंदी प्रत्यक्षीकरण का आदेश जारी नहीं किया जा सकता [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
6 Sep 2018 7:45 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अगर मजिस्ट्रेट के आदेश पर पुलिस हिरासत दी गई है तो बंदी प्रत्यक्षीकरण का आदेश जारी नहीं किया जा सकता [निर्णय पढ़ें]
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यह गैर-कानूनी रूप से लगातार हिरासत में रखने का मामला नहीं था बल्कि संबंधित व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के आदेश पर न्यायिक हिरासत में रखा गया था और उसी दौरान आपराधिक जांच के क्रम में उसे पुलिस हिरासत में सौंपा गया था।”

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कहा है कि अगर किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के आदेश पर आपराधिक मामले की जांच के क्रम में पुलिस हिरासत में भेजा गया है तो उस स्थिति में बंदी प्रत्यक्षीकरण का आदेश जारी नहीं किया जा सकता।

महाराष्ट्र ने हाईकोर्ट के उस आदेश की आलोचना की थी जिसमें एक महिला की याचिका को स्वीकार कर लिया गया था जिसके पति को मजिस्ट्रेट ने पुलिस हिरासत में भेजा था। हाईकोर्ट ने इस मामले (महाराष्ट्र राज्य बनाम तसनीम रिजवान सिद्दीकी) में बहुत ही तीखी प्रतिक्रया की थी जिसे बाद में रिकॉर्ड से निकाल दिया गया।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने सौरभ कुमार वाया अपने पिटा बनाम जेलर, कोनेइला जेल और मनुभाई रतिलाल बनाम गुजरात राज्य  मामलों में आए फैसलों का जिक्र करते हुए कहा, “वर्त्तमान मामले में  महिला के पति रिजवान आलम सिद्दीकी मजिस्ट्रे के आदेश पर पुलिस हिरासत में था ।मजिस्ट्रेट के उपरोक्त आदेश को चुनौती देने के बदले बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई...यह कोई लगातार गैर-कानूनी हिरासत का मामला नहीं है बल्कि संबंधित व्यक्ति मजिस्ट्रेट के आदेश पर आपराधिक जांच के सिलसिले में पुलिस हिरासत में था”।

पीठ ने कहा की मजिस्ट्रेट के आदेश को किसी भी तरह की चुनौती के अभाव में हाईकोर्ट को इस मामले में गिरफ्तारी की मेरिट पर कोई विचार नहीं व्यक्त करना चाहिए था...पीठ ने पुलिस उपायुक्त के खिलाफ की गई कुछ टिप्पणियों को भी रिकॉर्ड से निकाले जाने का आदेश दिया।

अपील स्वीकार करते हुए पीठ ने कहा, “हमारी राय में पुलिस उपायुक्त की और से दी गई इस दलील पर हाईकोर्ट को इतना हंगामा नहीं करना चाहिए था की प्रतिवादी के पति को कोर्ट का आदेश मिलने पर रिहा किया जा सकता है। जैसा की ऊपर कहा गया है, डीसीपी के पास दलील देने के अलावा और कोई चारा नहीं था। क्योंकि वह आरोपी को जो न्यायिक आदेश के तहत पुलिस हिरासत में था, स्वैच्छिक रूप से रिहा नहीं कर सकता था।”


 
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