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सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में SC/ST कोटा संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन : वरिष्ठ वकील शांति भूषण ने संविधान पीठ से कहा

LiveLaw News Network
23 Aug 2018 1:42 PM GMT
सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में SC/ST कोटा संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन : वरिष्ठ वकील शांति भूषण ने संविधान पीठ से कहा
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सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में SC/ST के लिए कोटा अनिवार्य करने को अनुमति नहीं दी जा सकती और ये संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करेगा। पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और वरिष्ठ वकील शांति भूषण ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया।

भूषण ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​की संविधान पीठ के समक्ष  इस तरह के कोटा के खिलाफ 2006 के नागराज फैसले पर पुनर्विचार की मांग करने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान यह दावा किया।

अक्टूबर 2006 में नागराज बनाम भारत संघ के मामले में पांच जजों की संविधान बेंच ने इस मुद्दे पर निष्कर्ष निकाला कि राज्य नौकरी में पदोन्नति के मामले में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण करने के लिए बाध्य नहीं है। हालांकि अगर वे अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करना चाहते हैं और इस तरह का प्रावधान करना चाहते हैं तो राज्य को वर्ग के पिछड़ेपन और सार्वजनिक रोजगार में उस वर्ग के प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता दिखाने वाला मात्रात्मक डेटा एकत्र करना होगा।

भूषण ने नागराज के फैसले को न्यायसंगत ठहराते हुए तर्क दिया कि क्या SC/ST के लिए सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण विभिन्न कैडरों या सेवाओं में उनके प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता के डेटा के बिना प्रदान किया जा सकता है ? ये इस अदालत द्वारा तय किया जाने वाला संक्षिप्त सवाल है। नियुक्तियों के लिए अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का प्रारंभिक स्तर पदोन्नति के हर स्तर पर बढ़ाया नहीं जा सकता।

भूषण ने तर्क दिया कि एक ही कैडर के भीतर कोई और भेदभाव अपरिहार्य है क्योंकि समानता के बीच योग्यता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संविधान एक ही कैडर के भीतर कर्मचारियों के इस तरह के भेदभाव की अनुमति नहीं देता क्योंकि अवसर की समानता संविधान की मूलभूत विशेषता है।

वरिष्ठ वकील ने कहा कि अनुच्छेद 16 (4) के तहत विचार किए गए 'नागरिकों के वर्ग' को आरक्षण प्रदान करने के लिए सकारात्मक कार्रवाई पदोन्नति पर लागू नहीं होगी, जो 'वर्ग' से संबंधित नहीं है बल्कि केवल एक कैडर या व्यक्तियों के साथ है।

एक उदाहरण देते हुए उन्होंने उदाहरण दिया कि चीफ इंजीनियर के एक समूह के बीच चीफ इंजीनियर के स्तर पर इंजीनियर-इन-चीफ के पद के लिए SC/ST के लिए कोटा नहीं दिया जा सकता, उन्हें पिछड़ा वर्ग के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।

सीजेआई के एक प्रश्न के लिए कि क्या क्रीमी लेयर की अवधारणा SC/ST  पर लागू होगी और क्या इसे पदोन्नति में लागू किया जा सकता है, वरिष्ठ वकील ने कहा कि क्रीमी लेयर

कैडर से दूसरे कैडर तक पदोन्नति के लिए आवेदन करेगी। उन्होंने कहा कि SC/ST  को उच्च सीढ़ी पर चढ़ने के लिए आसान कदम प्रदान करना उचित नहीं होगा जब एक ही कैडर में हर कोई बराबर है। इसी तरह सिविल सेवाओं में वरिष्ठ स्तर के पदों के लिए उच्च पद पर कोटा प्रदान करना पिछड़ापन और समानता की अवधारणा का सामना करेगा।

अदालत द्वारा तय किया जाने वाला सवाल यह है कि "क्या यह कैडर अभी भी पिछड़ा वर्ग के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है, अगर उत्तर 'नहीं' है तो पदोन्नति में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के लिए कोई भी कोटा नहीं हो सकता। पदोन्नति में शुरुआती कोटा और नियुक्ति के चरण में कोटा के बीच भेद बताते हुए भूषण ने कहा, "हम पूरी तरह से समुदाय के पिछड़ेपन से निपट रहे हैं। लेकिन जब हम एक कैडर से निपटते हैं तो हम एक समुदाय के पिछड़ेपन से नहीं बल्कि कैडर के भीतर व्यक्तियों से निपट रहे हैं।"

'नागराज' के फैसले पर पुनर्विचार के लिए केंद्र की याचिका का विरोध करते हुए भूषण ने कहा कि यह वोट बैंक राजनीति है और इस मुद्दे को राजनीतिक बनाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पदोन्नति में कोटा अनुच्छेद 16 (4) के तहत संरक्षित नहीं है, जहां 'क्रीमी लेयर' की अवधारणा आ जाएगी।

वहीं वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने भूषण का समर्थन करते हुए कहा कि आज SC/ST  की स्थिति का विस्तार कभी नहीं होने का कारण  कुछ भी नहीं बल्कि चुनावी राजनीति है। यह पिछड़े वर्ग के नागरिकों के वर्ग में समानता और क्रीमी लेयर की अवधारणा पर शासन करने का प्रयास  है।

धवन ने तर्क दिया कि नागराज के फैसले का मूल जोर निष्पक्षता, तर्कसंगतता और समुदाय के विभिन्न वर्गों के हितों को संतुलित करना था। पदोन्नति में कोटा प्रदान करने से  भेदभाव होगा जो संविधान की मूलभूत विशेषता का उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा कि कोटा का उपयोग एकाधिकार बनाने या अनावश्यक रूप से या अवैध रूप से अन्य कर्मचारियों के वैध हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं किया जा सकता है।

इससे पहले वरिष्ठ वकील दिनेश द्विवेदी, इंदिरा जयसिंह और अन्य ने केंद्र के तर्कों का समर्थन किया और कहा कि SC/ST  कर्मचारियों के पिछड़ेपन की जांच करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि 1992 में इंदिरा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि पिछड़ापन SC/ST  पर लागू नहीं होता क्योंकि उन्हें पिछड़ा माना जाता है। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के लिए पिछड़ेपन की धारणा होनी चाहिए और 2006 के फैसले में पदोन्नति में SC/ST को कोटा प्रदान करने के लिए शर्तें निर्धारित नहीं की जानी चाहिए थी। 29 अगस्त को ये सुनवाई जारी रहेगी।

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